पोलुशन फैलाने वाले वाहनों पर नेश नल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती काबिलेतारीफ है। जो पहल केन्द्र और राज्यों को करनी चाहिए, वह न्यायपालिका को करनी पड रही है। उस पर समकालीन सरकारें बात-बात पर अडंगें अडाने से बाज नहीं आतीं। राज्यों को बस अपने राजस्व की पडी है। देश में वाहनों से फैल रहे प्रदूषण से जनमानस की सेहत के साथ जो खिलवाड हो रहा है, उसकी राज्यों को कोई चिंता नहीं है। इसी लापरवाही से आजिज नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 15 शहरों में वाहनों से बढ रहे प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाया है। सोमवार को ग्रीन ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पंजाब समेत सात राज्यों को फटकार लगाते हुए उन्हें आदेश दिए कि अगर वे चौबीस घंटों के भीतर यह नहीं बता पाए कि उनके शहरों में कौनसा सबसे ज्यादा प्रदूषित है, तो ट्रिब्यूनल संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की गिरफ्तारी के आदेश जारी कर देगा। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र , उत्तर प्रदेष, तमिल नाडु, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक राज्यों के 15 शहरों में बढते प्रदूषण पर सुनवाई कर रहा था। इनमें पंजाब के लुधियाना, जालंधर और गुरु नगरी अमृतसर भी शामिल है। सुनवाई के समय किसी भी राज्य के पास किस शहर में डीजल और पेट्रोल के कितने-कितने वाहन है, इसकी कोई जानकारी नहीं थी। राज्यो की इस लापरवाही का यह भी मतलब निकाला जा सकता है कि वे जानबूंझकर जानकारी छिपा रहे हैं। यह बात ट्रिब्यूनल के गले भी नहीं उतरी कि अदालत में प्रदूषण पर सुनवाई चल रही हो और समस्या से पीडित राज्य वांछित जानकारी जुटा बगैर मुंह लटकाए अदालत में हाजिरी लगाएं । इससे पता चलता है कि समकालीन सरकारें विशुद्ध जनहित से जुडे मामलों के प्रति कितनी संजीदा है। वाहनों से बढते प्रदूषण के कारण ग्रीन ट्रिब्यूनल दो हजार सीसी और इससे अधिक पॉवर वाले डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण पीडित राज्यों से जानकारी मांगी थी। ट्रिब्यूनल दिल्ली में डीजल के नए वाहनों के पंजीकरण पर रोक लगा चुका है। इसी संभावना के मद्देनजर केन्द्रीय भारी उद्योग मंत्रालय ने ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर कर रखी है। याचिका में ट्रिब्यूनल को आगाह किया गया है कि डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगाए जाने से उद्योगों को तो तो नुकसान होगा ही, लाखों लोगों का रोजगार भी जाता रहेगा। इससे साफ है कि सरकार को प्रदूषण से हो रहे नुकसान की बजाए उद्योंगों की ज्यादा चिंता है। बढते वाहनों के प्रदूषण से जनमानस और वातावरण का कितना नुकसान हो रहा है, सरकार को इसका संभवतय अंदाजा भी नहीं है। विश्व स्वास्थय सगठन (डब्ल्यूएचओ) की 2014 की रिपोर्ट केे अनुसार वायु प्रदूषण से दुनिया में हर साल 70 लाख से ज्यादा लोग मारे जाते हैं और मृतकों में अधिकतर विकासशील देशों के लोग होते हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण फैलाने में वाहनों का सबसे प्रमुख योगदान रहता है। अमेरिका के सभी ट्रांसपोर्ट सोर्सिस द्वारा जनित पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) एमीशन का दो-तिहाई योगदान डीजल वाहनों अथवा मशीनों का आंका गया है। भारत में यह नब्बे फीसदी से भी ज्यादा है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पंजाब का लुधियाना शहर विश्व के चार सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है। लुधियाना के वायु कणों में प्रदूषण की मात्रा करीब 253 माइक्रोग्राम प्रति क्युबिक मीटर पाई गई है जो कि लोगों की सेहत के लिए अत्याधिक खतरनाक है। डब्लयूएचओ के मानदंड अनुसार वायु में प्रदूषण की मात्रा ज्यादा से ज्यादा 20 माइक्रोग्राम प्रति क्युबिक मीटर होनी चाहिए। गुरु नगरी अमृतसर में प्रदूषण की मात्रा 210 माइक्रोग्राम प्रति क्युबिक मीटर के आसपास है। यह भी बहुत अधिक है। अमृतसर देश के सर्वाधिक नौ शहरों में शुमार है। प्रदूषण का असर दुनिया के नायाब स्वर्ण मंदिर पर भी पडा है। बढते प्रदूषण के कारण स्वर्ण मंदिर के सोने से सुसज्जित गुबंद फीके पड चुके हैं और एसजीपीसी को 1999 में इन्हें फिर से चमकाना पडा था। सच यह है कि इस समय प्रदूषण मानव के लिए सबसे बडा खतरा है। सरकार को इस समस्या से भागने की बजाए इससे युद्ध स्तर पर निपटना चाहिए।
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