सोमवार, 6 जून 2016

गुलबर्ग फैसला

 नैसर्गिक न्याय को लेकर एक पुरानी कहावत है, “जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड“। भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर यह कहावत अक्सर सौ फीसदी चरितार्थ होती है। अधिकतर अदालती मामले इतने लंबे खींच जाते हैं कि न्याय मिलने तक पीडित या तो मरणासन्न हो जाता है, या स्वर्ग सिधार जाता है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के तहत पहले ट्रायल कोर्ट की सुनवाई, फिर सेशन कोर्ट की, बाद में हाई कोर्ट और अन्तोगत्वा सुप्रीम कोर्ट । प्रत्येक  अदालत में पांच-सात साल का समय लगना आम बात है। इस प्रकिया में पीडित का दम घुट जाता है। गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के चर्चित गुलबर्ग सोसाइटी मामले में भी लगभग 14 साल बाद ट्रायल कोर्ट  का फैसला आया है। इस दौरान करीब आधा दर्जन आरोपी स्वर्ग सिधार चुके हैं। इस मामले में सुनवाई सितंबर 2015 को ही पूरी हो गई थी मगर सुप्रींम कोर्ट  के निर्देश  पर फैसला सुरक्षित रखा गया । मामले की निगरानी कर रही सुप्रीम कोर्ट  ने विशेष  अदालत को इस मामले का फैसला 31मई, 2016 तक सुरक्षित रखने को कहा था। इसलिए करीब नौ माह बाद  फैसला सुनाया गया है। न्यायाधीश  पीबी देसाई की विशेष  अदालत ने 24 लोगों को गुलबर्ग  सोसायटी कांड में दोषी  पाया है। इनमंे भाजपा का पार्शद और एक पुलिस इंस्पेक्टर भी षामिल है। अदालत ने सबूतों के अभाव में  36 आरोपियों को बरी कर दिया है। पहले छह जून को सजा सुनाई जानी थी, अब 9 जून को सुनाई जाएगी । फैसले का रोचक पहलू यह है विशेष  अदालत ने आरोपियों पर से आपराधिक षडयंत्र (क्रिमिनल कंसपिरेसी) का मामला (अईपीसी की धारा 120-बी) निरस्त कर दिया है। अदालत ने व्यवस्था दी है कि गुलबर्ग  सोसायटी हमला पूर्व  नियोजित नहीं था।  गुलबर्ग   सोसायटी मामला देश  में ही नहीं, विदेशों  में भी सुर्खियों में उछाला जाता रहा है। इसकी प्रमुख वजह थी कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या। 27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोदरा में साबरमती एक्सप्रैस कोच में भीड ने आग लगा दी थी। इस हादसे में अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवक जिदा जल गए थे।  इस हादसे के प्रतिक्रियावषश  पूरे गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे फूट गए और 1200 लोग मारे गए थे। मृतकों में अधिकतर अल्पसंख्यक थे। अहमदाबाद की गुलबर्ग मूलतः मुसलमानों की रिहायषी सोसायटी थी।  गोदरा कांड से क्रुध भीड ने इस सोसायटी में आग लगा दी और इस हादसे में  69 लोग मारे गए थे। यह हादसा इतना वीभत्स था कि इसमें जिंदा जले 30 लोगों के शव अवशेष  आज तक नहीं मिल पाएं हैं और उन्हें मरा हुआ मान लिया गया है। गुलबर्ग हत्या कांड में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री का नाम भी आया था मगर 2010 में एसआईटी की रिपोर्ट में मोदी को क्लीन चिट दे दी गई थी। बहरहाल, गुलबर्ग  सोसायटी मामले में अदालत ने सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया है। न्यायपालिका भावनाओं में नहीं बहती, अलबत्ता सबूतों पर फैसला सुनाती है। और सबूत जुटाना जांच एजेंसी (पुलिस) का काम है। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि भारत  की पुलिस वही करती है, जो सरकार उसे करने को कहती है। गुजरात में भगवा पार्टी का सिक्का चलता है और  2002 में भी यही स्थिति थी। भारत में आज भी बाबा-आदम के जमान का पुलिस एक्ट है और आपराधिक मामलों की जांच फिरंगियों द्वारा बनाए गए इंडियन पुलिस एक्ट 1860 के अनुसार की जाती है। फिरंगियों ने “गुलाम भारतीयों“ पर नकेल डालने के लिए यह एक्ट बनाया था ताकि पुलिस वही करे जो उसे करने के लिए कहा जाए। यह सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है। आजाद भारत के “ स्वदेशी  शासकों” के राजनीतिक हितों के लिए यही एक्ट  माफिक बैठता है। और जब तक देश  में आपाराधिक मामलों की जांच व्यवस्था को निष्पक्ष  नहीं किया जाता, बेबस और बेसहारा आम आदमी के लिए फिरंगी मानसिकता वाली व्यवस्था से न्याय मिलने की बहुत कम उम्मीद है। बहरहाल, गोदरा और गुलबर्ग सोसायटी जैसे अमानवीय हादसों की जितनी भर्त्सना की जाए, उतनी कम है। इस तरह के हादसे केवलमात्र देश  की अखंडता और एकता पर प्रहार करते हैं।