एक जमाने में पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन ने अततः यूरोपियन यूनियन छोडकर ”एकला चलो” का मार्ग चुना है। द्धितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के देशों ने महाद्धीप के समग्र विकास के लिए मिलकर आगे बढने का संकल्प लिया था। ब्रिटेन के ईयू छोडने के फैसले से इस संकल्प (यूरोपियन प्रोजेक्ट ऑफ ग्रेटर यूनिटी) को गहरा धक्का लगा है। फ्रांस के राष्ट्रपति की यह टिप्पणी काबिलेगौर है कि ब्रिटेन के बगैर यूरोप पहले जैसा नहीं रहेगा। ब्रिटेन के इस ऐतिहासिक फैसले के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं और मुल्क को अपने इस फैसले का भारी खमियाजा भुगतना पड सकता है। जनमत संग्रह के नतीजे आते ही ब्रिटेन की राजनीति में भूचाल आ गया। प्रधानमंत्री डेविड कमरुन ने इस्तीफा दे दिया है। वैकल्पिक “प्रधानमंत्री (शेडो प्राइम मिनिस्टर) लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन के खिलाफ प्रचंड बगावत खडी हो गई है और अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। आरोप है कि लेबर पार्टी के पचास फीसदी से ज्यादा समर्थकों ने पार्टी के तय स्टैंड के खिलाफ वोटिंग की है। लेबर पार्टी के नेताओं का कहना है कि जेरेमी कॉर्बिन ने पूरी गंभीरता से जनमत संग्रह को लेकर प्रचार नहीं किया। ब्रिटेन के ईयू को छोडने के फैसले से देश की अखंडता भी खतरे में पड गई है। ब्रिटेन के अभिन्न हिस्सा स्कॉटलैंड की तीन-चौथाई जनता ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने के पक्ष में फतवा दिया है़। नतीजे आने के फौरन बाद स्कॉटलैंड में भी ब्रिटेन से अलग होने के लिए जनमत संग्रह की मांग उठी और अब भडक सकती है। ब्रिटेन ने दुनिया भर की स्टॉक मार्केट में भी भारी हलचल मचा दी है। ब्रिटेन की मुद्रा पाउंड शुक्रवार को दस फीसदी से भी अधिक लुढक गई । तीस साल में ऐसा पहली बार हुआ है। लॉयड्स और बार्कलेज जैसे षीर्श बैंको के शेयर 30 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट के साथ बंद हुए। सत्र के शुरु में ही शीर्ष बैंकों को 130 अरब डॉलर का फटका लगा। प्रधानमंत्री केमरुन के इस्तीफे से चांसलर जॉर्ज ओसबोर्न के भविष्य पर भी तलवार लटक गई है। इस नाजुक मौके पर इस तरह की अनिश्चितता ब्रिटेन के हित में नहीं है। जापान की स्टॉक मार्केट में खुलते ही अफरा-तफरा मच गई और ट्रेडिंग को निलंबति करना पडा। थॉमस कुक ने ऑनलाइन करंसी सेल्स बंद कर दी है और अपनी सभी शाखाओं में एक हजार पाउंड से ज्यादा की खरीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया है। जनमत संग्रह के नतीजे आने के बाद यूरो की मांग सातवें आसमान को छूने लग पडी है। भारतीय स्टॉक मार्केट में भी ब्रिटेन के ईयू एक्जिट का प्रतिकूल प्रभाव पडा है। सत्र के शुरुआत में सेंसेक्स 1091 अंक लुढकने के बाद कुछ संभला और 604. 51 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। आरबीआई के दखल से डॉलर के मुकाबले रुपया पाउंड की तरह बहुत ज्यादा नहीं गिरा और अंत में 1.06 फीसदी गिरावट के साथ प्रति डॉलर 67.96 पर बंद हुआ। ब्रिटेन की देखा-देखी यूरोप के अन्य देश भी यूरोपियन यूनियन से अलग होने की मांग कर सकते हैं। फ्रांस में नेशनल पार्टी की नेता मरीन ली पेन ने सरकार से ईयू को लेकर जनमत संग्रह की आवाज बुलंद की है। पिछले सप्ताह पेन ने वियना में साफ-साफ कहा था कि फ्रांस के पास ईयू छोडने के हजार कारण है। नीदरलैंड के एंटी-इमीग्रेशन नेता ग्रीट वाइल्डर्स ने भी ब्रिटेन की तरह जनमत संग्रह की मांग की है। इस तरह की मांग उठने से स्पष्ट है कि यूरोपियन यूनियन बिखराव की ओर जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने का “डोमिनो इफेक्ट“ हो सकता है। यूरोपियन यूनियन के समक्ष अब सबसे बडी चुनौती है कि कैसे एक नए यूरोप का निर्माण किया जाए और “एकीकृत यूरोप“ को संभाल कर रखा जाए। एक झटके में ईयू को लगभग 16 फीसदी आर्थिक आउटपुट का नुकसान उठाना पडेगा। ब्रिटेन के समक्ष अब तरह-तरह की चुनौतियां है। ब्रिटेन को पूरी आर्थिक-व्यापारिक समझौते नए सिरे से करने पडेगे। अब वह व्यापार बैरियर मुक्त एकल यूरोपियन मार्केट का हिस्सा नहीं रहेगा। ब्रिटेन को विभिन्न देशों से नई व्यापार और वाणिज्य संधियां करनी पडेगी। सब कुछ इतना आसान नहीं है। एकता का पुल बनाने में सालों लग जाते हैं। इसे ढहाने में जरा भी समय नहीं लगता मगर इससे जो व्यापक क्षति होती है, उसकी आसानी से भरपाई नहीं की जा सकती।
सोमवार, 27 जून 2016
एकता तार-तार
Posted on 8:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
एक जमाने में पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन ने अततः यूरोपियन यूनियन छोडकर ”एकला चलो” का मार्ग चुना है। द्धितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के देशों ने महाद्धीप के समग्र विकास के लिए मिलकर आगे बढने का संकल्प लिया था। ब्रिटेन के ईयू छोडने के फैसले से इस संकल्प (यूरोपियन प्रोजेक्ट ऑफ ग्रेटर यूनिटी) को गहरा धक्का लगा है। फ्रांस के राष्ट्रपति की यह टिप्पणी काबिलेगौर है कि ब्रिटेन के बगैर यूरोप पहले जैसा नहीं रहेगा। ब्रिटेन के इस ऐतिहासिक फैसले के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं और मुल्क को अपने इस फैसले का भारी खमियाजा भुगतना पड सकता है। जनमत संग्रह के नतीजे आते ही ब्रिटेन की राजनीति में भूचाल आ गया। प्रधानमंत्री डेविड कमरुन ने इस्तीफा दे दिया है। वैकल्पिक “प्रधानमंत्री (शेडो प्राइम मिनिस्टर) लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन के खिलाफ प्रचंड बगावत खडी हो गई है और अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। आरोप है कि लेबर पार्टी के पचास फीसदी से ज्यादा समर्थकों ने पार्टी के तय स्टैंड के खिलाफ वोटिंग की है। लेबर पार्टी के नेताओं का कहना है कि जेरेमी कॉर्बिन ने पूरी गंभीरता से जनमत संग्रह को लेकर प्रचार नहीं किया। ब्रिटेन के ईयू को छोडने के फैसले से देश की अखंडता भी खतरे में पड गई है। ब्रिटेन के अभिन्न हिस्सा स्कॉटलैंड की तीन-चौथाई जनता ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने के पक्ष में फतवा दिया है़। नतीजे आने के फौरन बाद स्कॉटलैंड में भी ब्रिटेन से अलग होने के लिए जनमत संग्रह की मांग उठी और अब भडक सकती है। ब्रिटेन ने दुनिया भर की स्टॉक मार्केट में भी भारी हलचल मचा दी है। ब्रिटेन की मुद्रा पाउंड शुक्रवार को दस फीसदी से भी अधिक लुढक गई । तीस साल में ऐसा पहली बार हुआ है। लॉयड्स और बार्कलेज जैसे षीर्श बैंको के शेयर 30 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट के साथ बंद हुए। सत्र के शुरु में ही शीर्ष बैंकों को 130 अरब डॉलर का फटका लगा। प्रधानमंत्री केमरुन के इस्तीफे से चांसलर जॉर्ज ओसबोर्न के भविष्य पर भी तलवार लटक गई है। इस नाजुक मौके पर इस तरह की अनिश्चितता ब्रिटेन के हित में नहीं है। जापान की स्टॉक मार्केट में खुलते ही अफरा-तफरा मच गई और ट्रेडिंग को निलंबति करना पडा। थॉमस कुक ने ऑनलाइन करंसी सेल्स बंद कर दी है और अपनी सभी शाखाओं में एक हजार पाउंड से ज्यादा की खरीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया है। जनमत संग्रह के नतीजे आने के बाद यूरो की मांग सातवें आसमान को छूने लग पडी है। भारतीय स्टॉक मार्केट में भी ब्रिटेन के ईयू एक्जिट का प्रतिकूल प्रभाव पडा है। सत्र के शुरुआत में सेंसेक्स 1091 अंक लुढकने के बाद कुछ संभला और 604. 51 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। आरबीआई के दखल से डॉलर के मुकाबले रुपया पाउंड की तरह बहुत ज्यादा नहीं गिरा और अंत में 1.06 फीसदी गिरावट के साथ प्रति डॉलर 67.96 पर बंद हुआ। ब्रिटेन की देखा-देखी यूरोप के अन्य देश भी यूरोपियन यूनियन से अलग होने की मांग कर सकते हैं। फ्रांस में नेशनल पार्टी की नेता मरीन ली पेन ने सरकार से ईयू को लेकर जनमत संग्रह की आवाज बुलंद की है। पिछले सप्ताह पेन ने वियना में साफ-साफ कहा था कि फ्रांस के पास ईयू छोडने के हजार कारण है। नीदरलैंड के एंटी-इमीग्रेशन नेता ग्रीट वाइल्डर्स ने भी ब्रिटेन की तरह जनमत संग्रह की मांग की है। इस तरह की मांग उठने से स्पष्ट है कि यूरोपियन यूनियन बिखराव की ओर जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने का “डोमिनो इफेक्ट“ हो सकता है। यूरोपियन यूनियन के समक्ष अब सबसे बडी चुनौती है कि कैसे एक नए यूरोप का निर्माण किया जाए और “एकीकृत यूरोप“ को संभाल कर रखा जाए। एक झटके में ईयू को लगभग 16 फीसदी आर्थिक आउटपुट का नुकसान उठाना पडेगा। ब्रिटेन के समक्ष अब तरह-तरह की चुनौतियां है। ब्रिटेन को पूरी आर्थिक-व्यापारिक समझौते नए सिरे से करने पडेगे। अब वह व्यापार बैरियर मुक्त एकल यूरोपियन मार्केट का हिस्सा नहीं रहेगा। ब्रिटेन को विभिन्न देशों से नई व्यापार और वाणिज्य संधियां करनी पडेगी। सब कुछ इतना आसान नहीं है। एकता का पुल बनाने में सालों लग जाते हैं। इसे ढहाने में जरा भी समय नहीं लगता मगर इससे जो व्यापक क्षति होती है, उसकी आसानी से भरपाई नहीं की जा सकती।






