कहते हैं समय किसी के वश में नहीं होता है और न ही किसी के साथ चलता है। आज बुरा समय है तो कल अच्छा जरुर आएगा। यही नियति का कालचक्र है। जुम्मा-जुम्मा तीन साल पहले तक जिस नरेन्द्र मोदी को अमेरिकी “सांप्रदायिकता“ के लिए “अछूत“ मानकर वीजा देने से साफ मुकरा करते थे, उसी मोदी को अमेरिका के लॉमेकर्स ने बुधवार को सर-आंखों पर बिठाया। सांसदों में भारतीय प्रधानमंत्री का आँटोग्राफ लेनेे के लिए होड लगी रही। हाउस ऑफ रिपरेजेन्टेटिवस के स्पीकर पॉल रयान ने प्रधानमंत्री मोदी को उनकी अमेरिकी यात्रा के दौरान कांग्रेस को संबोधित करने का खास न्योता दिया था। मोदी अमेरिकी के संयुक्त सदन को संबोधित करने वाले छठे प्रधानमंत्री हैं। उनसे पहले जवाहर लाल नेहरु, राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह भी अमेरिकी लॉमेकर्स को संबोधित कर चुके हैं। 1929-1931 के बाद पहली बार हाउस ऑफ रिपरेजेन्टेटिवस की 247 और सीनेट की 54 सीटों के साथ रिपब्लिकन पार्टी का कांग्रेस में बहुमत है। और इस बहुमत के बूते रिपब्लिकनस ने राष्ट्रपति बराक ओबामा की नींद हरा कर रखी है। बहरहाल्ल, अमेरिकी सांसदों ने प्रधानमंत्री को धैर्य से सुना और उनके हर फिकरे का तालियां बजाकर अभिनंदन किया। अपने खास मेहमान की मेहमानवाजी कैसे की जाए, अमेरिकी यह बात बखूबी जानते हैं। प्रधानमंत्री का संबोधन भी एकदम अमेरिकियों की उदारवादी एवं खुली सोच के माफिक था। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इब्राहिम लिंकन से महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग से भीमराव अम्बेडकर और वाल्ट व्हिटमैन से स्वामी विवेकानंद के आदर्शो का उद्धरण करते हुए भारत और अमेरिका के बीच की समानताओं का ऐसा खाका खींचा कि अमेरिकी लॉमेकर्स भी यह कहते-कहते रह गए “ क्या बात है“। भारत की तरह अमेरिका भी दुनिया का विषालतम लोकतांत्रिक देश है। और दुनिया में बहुत कम ऐसे देश है, जिनसे भारतीय लोकतंत्र की सानी की जा सकती है। अमेरिका उन में से एक है और इसी सच्चाई के मद्देनजर प्रधानमॅत्री अमेरिका से घनिष्टतम संबंध चाहते हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन और अमेरिकी सांसदों की सकारात्मक प्रतिक्रियाएं साफ-साफ कहती हैं कि भारत की तरह अमेरिकी भी दुनिया की दो बडी लोकतांत्रिक ताकतों के बीच हर क्षेत्र में मजबूत और स्थायी सहयोग चाहते हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन का यही लब्बोलुआब भी था। निसंदेह, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के अमेरिका से संबंध और घनिष्ठ हुए हैं। इसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आ रहे हैं। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी ) में भारत को एंट्री दिलाने के लिए अमेरिका एडी-चोटी का जोर लगा रहा है। अमेरिका भारत से हर तरह से सहयोग कर भी रहा है और पाकिस्तान को भारत से संबंध सुधारने की बराबर नसीहत दे रहा है। शीत युद्ध के जमाने में जिस तरह अमेरिका पाकिस्तान क साथ हर मुकाम पर खडा हो जाता था, वही स्थिति आज भारत की है। चीन के कडे विरोध के बावजूद अमेरिका भारत के लिए दुनिया भर में समर्थन जुटा रहा है। इससे पाकिस्तान को खासी तकलीफ हो रही है। अमेरिका से निकटता के कारण ही स्विटजरलैंड और मेक्सिको ने भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स गु्रप (एनएसजी) में एंट्री दिलाने के लिए समर्थन का आश्वाशन दिया है। अमेरिका से मेक्सिको पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी को मेक्सिको के राष्ट्रपति एन्रिके पेन्या नियेतो ने भी एएसजी मामले में भरपूर समर्थन का वायदा किया है। 48 देशों के एनएसजी में अब चीन के अलावा आस्ट्रिया, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, आयरलैंड और टर्की ही भारत की एंट्री का विरोध कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा बेहद सफल रही है। इस यात्रा से भारत का मान और सम्मान बढा है। इसका सबसे बडा प्रमाण पाकिस्तानी अखबारों की चिंता है। पाकिस्तान मीडिया ने मोदी की ताजा यात्रा को सुर्खियों में प्रकाशित करते हुए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस यात्रा का तोड निकालने की सलाह दी है। अगर दुश्मन यात्रा से घबराए तो इसकी सफलता पर शक की कोई गुजाइंश नहीं रह जाती है।
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