सोमवार, 20 जून 2016

महंगाई का दानव

                          महंगाई का दानव

दाल-सब्जी की कीमतें आसमान छूने के बाद अततः मोदी सरकार की निद्रा टूटी और पिछले  बुधवार को कुछ औपचारिक फैसले लेकर दालों की कीमतों पर नियंत्रण पाने के लिए फौरी उपायों की घोषणा की गई। दालों की कीमतें तो अर्से से आसमान छू रही है और गरीब तो क्या निम्न मध्यम वर्ग  के बजट से भी बाहर हो गई है। मौसमी सब्जियां भी सस्ती होने की बजाय महंगी ही होती जा रहीं हैं। कभी टमाटर तो कभी प्याज रुला रहा है। देश  के लॉमेकर्स को तो जैसे सत्ता में आते ही जमीनी सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रह जाता है। सरकार की ओर से उन्हें मोटी तनख्वाह, भत्ते और हर तरह की सुविधाएं मिलती है। उन्हें आयकर भी नहीं देना पडता। वातानुकुलित बंगलों में रहते भला आम आदमी की बदहाल जीवन का  कैेसे पता चल सकता है। मंगलवार को जब थोक मुद्रा-स्फीति के आंकडे आए, तब कहीं जाकर सरकार चेती। आंकडों में बताया गया है कि खाद्य वस्तुओं के दाम बढने से मई में थोक मुद्रा-स्फीति में  0.79 फीसदी का इजाफा हुआ और यह उछल कर इक्कीस माह के उच्च स्तर 5.78 फीसदी को छू रही है। मई में खाद्य वस्तुओं के दामों में  7.88 फीसदी का इजाफा हुआ। सबसे ज्यादा मई में सब्जियो के दाम 12.9 बढे और दूध-अंडे के दाम भी लगभग चार पफीसदी  बढे हैं। दालों की मुद्रास्फीति में 35.56 फीसदी वृद्धि हो रही है।  इन आंकडों के बाद सरकार को होश  आया कि दालों की कीमतें घटाने के लिए कुछ करना चाहिए। आनन-फानन में सरकार ने अरहर और उडद दाल की अधिकतम कीमत 120 रु कर दी। राज्यों के सरकारी बिक्रय केद्रों से अरहर और उडद इस भाव पर बिकेंगी। मगर बाकी दालें बाजार में उसी महंगे दामों पर बिका करेंगी। सरकार हर दाल को सस्ते दाम पर नहीं बेच सकती। बाजार में इस समय अधिकतर दालें दौ सौ रु किलो के परचून भाव में बेची जा रही है। हर आदमी सरकारी दुकान से दालें खरीदने से रहा। सरकारी दुकानों पर दो दालें कम दाम से बिकने पर भारत जैसे विशाल देश  में महंगाई पर लगाम लगाई जा सके, इस पर संदेह हो रहा है।  बाजार भाव सरकार की मर्जी से नहीं चलते और निजी दुकानदार घाटे वाले भाव पर दालें नहीं बेचेगा। इस मामले में जीवन रक्षक और इस तरह की दवाओं की मिसाल ली जा सकती है। सरकार जैसे ही दवाओं के दाम कम कर देती हैं, वे बाजार से गायब हो जाती है और उनकी जगह फिर महंगी वैकल्पिक दवाएं बाजार में आ जाती हैं। सरकार चुपचाप तमाशबीन बनी रहती है। पूंजीवादी और खुले बाजार का यही दस्तूर है। दाल-सब्जियों के मामले में भी यही हो रहा है। भारत दुनिया में दालों की पैदावार करने वाला सबसे बडा देश  है। हर साल, लगभग 18.5 मिलियन टन दालों का उत्पादन किया जाता है जबकि खपत लगभग  22 मिलियन टन की होती है। इस तरह, भारत को हर साल औसतन  3.5 मिलियन टन दालों का आयात करना पडता है। यह सिलसिला सालों से चल रहा है। अनुमान है कि पिछले कुछ महीनों से दाम आसमान छूने के कारण दालों की मांग में खासी गिरावट आई है। पिछले दो साल से लगातार सूखे के कारण दालो की पैदावार में कुछ गिरावट आई है मगर इतनी भी नहीं कि दालों के दाम आसमान को छूनेे लगे। विशेषज्ञों का आकलन है कि दालों की जमाखोरी और कालाबाजारी दालों के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि के प्रमुख कारण है। कांग्रेस समेत विपक्ष  का यह भी आरोप  है कि भाजपा सरकार के आते ही जमाखोरी और कालाबाजारी बढ जाती है क्योंकि अधिकतर व्यापारी पार्टी के कट्टर समर्थक हैं। एक जमाने में भाजपा की पूर्वज जनसंघ को “व्यापारियों “ की पार्टी माना जाता था। बहरहाल, दालों की कीमतों में गिरावट के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। दालों की मांग उतरोत्तर बढती जा रही है। इंडियन इंस्टीटयुट ऑफ  पल्सिस रिसर्च  के विजिन डाक्युमेंट अनुसार 2030 भारत में दालों की खपत बढ़कर  32 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी और अगर तब तक इसी अनुपात में दालों की पैदावार नहीं बढती है तो कीमतों पर नियंत्रण पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। इसका एकमात्र विकल्प उच्च उपज वाली फसल है। सरकार को इस विकल्प पर जोर-शोर   से काम करना चाहिए।