सोमवार, 13 जून 2016

Why Are We So Cruel Towards Animals?



बिहार में  अढाई सौ से भी अधिक नीलगायों की हत्या को लेकर केद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी  की चिंता वाजिब है। मेनका ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश   जावेडकर को चिठ्ठी लिखकर इस बात पर गहरा खेद जताया है कि उनके मंत्रालय को जानवरों को मारने की मानो जैसे हवस सी है। घोर एनिमल्स  प्रेमी केन्द्रीय मंत्री को इस बात का भी दुख है कि बिहार में लगभग 250 नीलगायों की हत्या आजादी के बाद का सबसे बडा संहार है  और यह कृत्य गौ माता“ की रक्षा करने को प्रतिबध भाजपा सरकार की देख-रेख में हुआ है।  बिहार सरकार को इतने बडे पैमाने पर “नीलगायों“ की हत्या करने की अनुमति चुटकियों में दे दी गई मानो जैसे संबंधित मंत्रालय को इस बात से कोई सरोकार न हो कि सरकार रक्षक होती है, भक्षक नहीं।   बिहार सरकार ने “नीलगाय“ को नुकसानदेह जानवर घोषित  कर रखा है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश  जावेडकर के  इस स्पष्टीकरण   में कोई वजन  नहीं है क्योंकि बिहार सरकार ने नीलगायों का संहार करने की अनुमति  मांगी थी, उनके मंत्रालय ने बगैर टोका-टोकी के फौरन दे दी। जंगलो में आग लगने की वजह से जंगली जानवर आहार की तलाश  में खेतों और खलिहानों की ओर आकर्षित  होते हैं। गर्मियों में अक्सर जंगलों में भीषण आग लग जाती है। जंगलों को आग से बचाना सरकार की जिम्मेदारी है। मेनका ने पर्यावरण मंत्रालय की इस कार्रवाई पर भी अफसोस जताया है कि जंगली जानवरों को मारने में यह मंत्रालय भी न केवल शामिल है, बल्कि लीड रोल में है। यह बात भी चिंताजनक है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय राज्यों से पूछ रहा है कि किस जानवर को मारा जाए, किसे नहीं। मंत्रालय बंगाल में हाथियों को मारने की सलाह दे रहा है। गोवा में मोर मारे जा रहे हैं। मंत्रालय नीलगायों को मारने की खुली अनुमति दे रहा है । और-तो-और हिमाचल में हिंदुओं के “हनुमान“ बंदरों को मारने के निर्देश  जारी किए गए हैं। इन सब बातों से न केवल मेनका गांधी, बल्कि अन्य पशु -प्रेमी भी बेहद आहत हैं। सरकार का काम जानवरों को मारना नहीं, अलबत्ता उनका संरक्षण करना है।   नीलगाय झुंडों में आकर फसलें चटकर जाती हैं, इसलिए किसान उन्हें नापंसद करते हैं। मगर फसलों को गाय जैसे अन्य दुधारु पशु  भी नुकसान पहुंचाते हैं। तो क्या उनका भी संहार कर दिया जाए?   समकालीन भारत में नीलगाय भले ही गौमाता जैसी पूज्यनीय न हो मगर वैदिक काल में इसे पूज्यनीय माना जाता था और उसकी पूजा की जाती थी। मुगल काल में जब तत्कालीन शासकों द्वारा नीलगायों का  शिकार किए जाता,  हिन्दू उनकी रक्षा किए करते थे। बहरहाल, देश  का कानून साफ-साफ कहता है कि देश  के हर नागरिक को जानवरों के प्रति स्नेह रखना चाहिए, क्रुरता नहीं। संविधान के अनुच्छेदे 51(ए) में यह व्यवस्था है। भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों  में  शुमार है , जहा पशु -पक्षियों के संरक्षण के लिए आला दर्जे का कानून है। जंगली अथवा आवारा पशु  को मारना अथवा उसे नुकसान पहुंचाना भी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा (सेक्शन ) 428 तथा 429 के तहत दंडनीय अपराध है। पालतु पशु  अथवा पक्षी को मरने के लिए त्यागना भी दंडनीय अपराध है। कुत्तो को उनकी पंसदीदा जगह से अन्यत्र ले जाना भी अपराध है। और-तो-और पालतु पशु -पक्षी को भूखे-प्यासे रखना अथवा उसे लंबे समय तक कैद रखना भी पीसी एक्ट 1960 की धारा 11(1)(एच) के तहत दंडनीय अपराध है। बंदर, भालु, शेर जैसे जानवरों को प्रशिक्षित करके उनका मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करना भी प्रतिबंधित है। पशु  बलि भी प्रतिबंधित है। पशु -पक्षी संरक्षण के वास्ते और भी कई कानून है। पर इतना सब होने के बावजूद देश  में कानून की धज्जियां उडाने की रिवायत है। ताजा प्रकरण में सरकार खुद नीलगाय का संहार करके कानून का मजाक उडा रही है। एक ओर देश  में खूंखार टाइगर को बचाने के लिए विशेष  प्रयास किए जाते है, तो दूसरी ओर नीलगाय का संहार किया जाता है। यह कहां का इंसाफ है? सरकार को यह बताने की जरुरत नहीं है कि जानवरों को मारना अगर कानूनन अपराध है, तो बिहार में नीलगायों का संहार करने के लिए राज्य से ज्यादा केद्र सरकार अपराधी है। देश  केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी का आभारी है कि उन्होंने एक ज्वलंत समस्या को उठाया है। इसका सर्वमान्य हल निकाला जाना चाहिए।