वाहनों से फैल रहे प्रदूषण को रोकना समकालीन मानव प्रजाति की सबसे बडी चुनौती है। पूरी दुनिया इस कडवी सच्चाई को जानती है कि अगर प्रदूषण पर जल्द काबू नहीं पा लिया गया तो यह मानव को ही निगल जाएगा। पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर भी पूरे जगत में प्रदूषण को रोकने का संकल्प दोहराया गया। इसी चिंता के चलते मोदी सरकार ने पर्यावरण फ्रेंडली नई वाहन नीति तैयार की है। इस नीति का मूल मकसद प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सडकों पर से हटा कर पर्यावरण फ्रेंडली वाहनं को प्रोत्साहित करना है। प्रस्तावित नीति के तहत एक दशक और इससे अधिक पुराने वाहनों को बदल दिया जाएगा। दस साल और इससे ज्यादा पुराने वाहन नए वाहनों की अपेक्षा 10 से 12 गुना ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। जाहिर है कोई भी प्रशासन इस स्थिति को सहन नहीं करेगा। इस बात के मद्देनजर सरकार दस साल और इससे पुराने वाहनों को प्रतिबंधित करने जा रही है। अनुमान है ऐसा करने से देश भर में लगभग पौने तीन लाख वाहनों को सडकों पर से हटा लिया जाएगा। सरकार पुराने वाहनों की जगह नए वाहनो के लिए कीमत में दस फीसदी का प्रोत्साहन देगी। पुराने वाहनों के कबाड से देश को करीब 11,500 करोड का इस्पात मिलेगा। इससे सरकार पर इस्पात आयात करने का बोझ कम होगा। केन्द्र और राज्यों की सरकारों के अधिकांश वाहन पुराने और खटारा हो चुके हैं। इन वाहनों के हटाने से भी सरकार को कबाड इस्पात मिलेगा। देश को इस्पात का कम आयात करना पडेगा और विदेशी मुद्रा की वचत होगी। यानी “आम तो आम, गुठलियों के भी दाम“। नई वाहन नीति से देश को चौतरफा फायदा गोगा। प्रदूषण कम होगा, इस्पात का आयात घटेगा और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। फिर ऐसी जनहित वाली नीति पर तुरंत अमल क्यों नहीं? मोदी सरकार को फौरन नई वाहन नीति को लागू कर देना चाहिए। सरकार के हर काम के विरोध का आदी विपक्ष कुछ अडंगे अडा सकता है, मगर जनता सब जानती है। तथापि कहते हैं“ कहना आसान है मगर करना मुश्किल “। लालफीताशाही और नकारा एवं करप्ट प्रशासन के बलबूते बडी से बडी और महत्वाकांक्षी योजना का अब तक जो हश्र होता रहा है, उसका ख्याल करते हुए प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को पूरी तरह से सडक पर से हटा लिया जाएगा, इस पर भी शक है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह ही राज्यों को इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि उनके पास किस शहर में कितना प्रदूषण है और प्रदूषण फैलाने वाले कितने वाहन है, इसकी भी पुख्ता जानकारी नहीं है। इस मामले में लाल-नीली बत्ती का दुरुपयोग, सीट बेल्ट और हेलमेट की अनिवार्यता और वाहनों पर काले शीशे लगाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की मिसाल ली जा सकती है। दो-एक माह देश भर में इन निर्देशों का संजीदगी से पालन करवाया गया मगर तदुपरांत सब कुछ भूल-भुला दिया गया। सडक दुर्घटनाओं पर हाल ही में जारी आंकडों के अनुसार सडक दुर्घटनाओं में 70 फीसदी चालक शराब पीकर गाडी चलाते हुए सीट बेल्ट नहीं लगाने से मारे जाते है और देश में 60 फीसदी से ज्यादा चालक सीट बेल्ट नहीं लगाते। दो-पहिया वाहनों से जुडी सडक दुर्घटनाओं में अस्सी फीसदी मौतें हेलमेट न पहनने के कारण होती हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हेलमेट पहनना और सीट बेल्ट लगाना अनिवार्य कर रखा है। कोई भी ऐरा-गैरा वाहन पर लाल-पीली-नीली बत्ती लगाकर घुम सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी प्रतिबंध लागा रखा है। यही हाल काले शीशे वाले वाहनों का है। यही देश की सबसे बडी त्रासदी है। कायदे-कनून को तोडना हमारी फितरत है और भरष्ट तंत्र इसे रोकने के बजाए इसे बढाता है। सरकार को नई वाहन नीति लागू करते समय इन सब बातों का ख्याल रखना होगा। प्रदूषण की विकराल समस्या से जूझने के लिए समर्पित और कुशल तंत्र की जरुरत है। सवाल यह है कि सरकार कहां से लाएगी ऐसा तंत्र जो वई वाहन नीति को अक्षरशः लागू करे़ ?
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