बुधवार, 8 जून 2016

No Chance For India To Get Into NSG

   
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मौदी की तीन दिवसीय अमेरिका यात्रा के ऐन वक्त पर चीन ने भारत की  न्युक्लियर  सप्लायर्स गु्रप  (एनएसजी) में एंट्री पर फिर अडंगा अडा दिया है। भारत एनएसजी में एंट्री पाने के लिए दुनिया भर में समर्थन जुटा रहा है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी अचानक स्विट्जरलैंड पहुंचे और एनएसजी पर इस देश  का समर्थन हासिल करने में कामयाब रहे।  स्विट्जरलैंड  और आस्ट्रिया अब तक भारत को एनएसजी में   शामिल करने के खिलाफ रहे हैं।  स्विट्जरलैंड का समर्थन जुटाने के बाद भारत को अमेरिकी के सहयोग से चीन को मनाने की उम्मीद थी मगर अमेरिका फिर काइंया बिजनेसमैन निकला।  बीजिंग में चल रहे अमेरीकी-चीनी स्ट्रेटेजिक एंड इकनॉमिक डायलॉग के दौरान ओबामा के नुमाइदों ने चीन से बहुत कुछ ले लिया सिवा भारत के लिए एनएसजी में चीनी समर्थन। जैसी अपेक्षा थी, चीन ने इस बार भी अपने अनन्य मित्र पाकिस्तान की ही भाषा  बोली। पाकिस्तान को इन दिनों भारत के “दौरे“ पड रहे हैं। प्रधानमंत्री जब कभी विदेशी  यात्रा पर जाते हैं, पाकिस्तान के हाथ-पांव फूल जाते हैं। भारत का  न्युक्लियर सप्लायर्स  ग्रुप  में शरीक होने से पाकिस्तान कि गहरा आघात लगना स्वभाविक है। भारत के अलावा पाकिस्तान ने भी परमाणु अप्रसार संधि (न्युक्लियर  नॉन-प्रोलिफेरशन  ट्रीटी -एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसी बिला पर चीन भारत का एनएसजी में मुखर विरोध कर रहा है। पाकिस्तान, भारत को एनएसजी में नहीं आने देने के लिए हर जगह हाथ-पांव मार रहा है। यहां तक कि इस साल मई में जैसे ही भारत ने  न्युक्लियर  सप्लायर्स  ग्रुप  की सदस्यता का फॉर्म  भरा, एक सप्ताह बाद पाकिस्तान ने भी वैसा ही किया। मुमकिन है चीन ने उसे ऐसा करने के लिए उकसाया हो। चीन पहले ही यह बात स्पष्ट  कर चुका है कि  न्युक्लियर  सप्लायर्स ग्रुप  में एंट्री के लिए “पिक एंड चूज“ की नीति नहीं अपनाई जानी चाहिए। इस बात पर चीन 48 देशों  के न्युक्लियर  सप्लायर्स से मांग कर चुका है कि ग्रुप  को  परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करने वालों देशों  की एंट्री पर अपनी नीति स्पश्ट करनी चाहिए।  यानी अगर   परमाणु अप्रसार संधि  पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है, तो पाकिस्तान  समेत अन्य देशों  को भी एंट्री दी जानी चाहिए। चीन एनएसजी का महत्वपूर्ण  सदस्य है। चीन का तर्क  है कि  युक्लियर  सप्लायर्स  गु्रप   परमाणु अप्रसार संधि का अहम हिस्सा है और अगर इस मामले में ढील दी जाती है, तो एनपीटी का मूल मकसद ही पिट जाएगा।  परमाणु अप्रसार संधि का हिस्सा नहीं होने के बावजूद अमेरिका और उसके मित्र देश  भारत की एनएसजी में एंट्री की इस बिला पर पैरवी कर रहे हैं कि उसका (भारत) परमाणू अप्रसार पर साफ-सुथरा रिकार्ड है। भारत-यूएस सिविल न्युक्लियर संधि के कारण भी अमेरिका भारत की एसएसजी में लाने की हरसंभव कोशिश  कर रहा है। इसी मकसद से राष्ट्रपति  बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीन दिवसीय अमेरिकी यात्रा के ऐन वक्त पर बीजिंग में चीन से अहम मुद्दों पर वार्ता  आयोजित करवाई है। यह बात दीगर है कि फिलहाल विदेश  मंत्री जॉन कैरी एवं खजाना मंत्री जैक ल्यू अभी तक चीन को मना नहीं पाए है। सच कहा जाए तो चीन मानेगा भी नहीं। भारत की तुलना में चीन अपनी कूटनीति में पाकिस्तान को कहीं ज्यादा तरजीह देता है और इसी वजह चीन भारत का विरोध कर रहा है। इस मामले में भारत का अपना पक्ष भी कमजोर है और इसी वजह चीन को भारत विरोध का हथकंडा मिला हुआ है। परमाणु अप्रसार संधि पर  हस्ताक्षर नहीं करके भारत ने एनएसजी की सदस्यता के लिए खुद अपना दावा कमजोर किया है। लेट-लतीफी संस्कृति भारत में सर चढ कर बोलती है। बुश  प्रशासन के समय अमेरिका के साथ ऐतहासिक परमाणु संधि के बावजूद आज तक भारत किसी भी अमेरिकी कंपनी को परमाणु बिजली घर बनाने का काम नहीं दे पाया। कुछ स्थानीय कानून आडे आ रहे थे, अब इस बाधा को भी दूर कर लिया गया है। बहरहाल, भारत का फिलहाल एनएसजी में एंट्री लेने का सपना अधूरा ही रह सकता है। ओबामा का कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है। हैलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति  चुनी गई तो उम्मीद बाकी है मगर डोनाल्ड ट्रंप का भारत के प्रति कम-से-कम ओबामा जैसा रवैया तो होने से रहा।