पॉलीथिन प्रतिबंध को संजीदगी से लागू करने में पंजाब और हरियाणा काफी पीछे है जबकि पडोसी हिमाचल प्रदेष इस मामले में पूरे देश में अग्रणी है। हिमाचल प्रदेश ने पहली बार जनवरी 1999 में ही रिसाइक्लिड प्लास्टिक से बने रंगीन पॉलीथिन कैरी बैग्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। अक्टूबर 2009 से हिमाचल प्रदेश में पॉलीथिन का प्रयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है और तब से यह पहाडी राज्य देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है, जहां पॉलीथिन के प्रतिबंध को कडाई से लागू किया जा रहा है। दुर्भाग्यवश , पंजाब और हरियाणा इस प्रतिबंध को सख्ती से लागू नहीं कर पाया है। यह बात बेहद शर्मनाक है कि पॉलीथीन के प्रतिबंध को सख्ती से लागू करवाने के लिए भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को दखल देना पडे। पॉलीथिन पर प्रतिबंध के लिए पंजाब में 2005 को कानून बना दिया गया था मगर राज्य सरकार इसे हिमाचल की तरह लागू नहीं पर पाई। हरियाणा में 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसी लाल ने पॉलिथिन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था मगर इस पर संजीदगी से अमल नहीं हो पाया। हरियाणा में 2010 से पॉलीथिन कैरी बैग्स के उत्पादन, वितरण और इस्तेमाल पर प्रतिबंध है मगर इसके बावजूद राज्य में धडल्ले से पॉलिथिन बैग्स का उत्पादन, वितरण और इस्तेमाल हो रहा है। इसी स्थिति के कारण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को पंजाब और हरियाणा को नोटिस तक जारी करना पडा है। पूरी दुनिया में इस समय रिसाइकिल्ड प्लास्टिक के इस्तेमाल के खिलाफ जबरदस्त मुहिम जारी है। चीन, जर्मनी, इटली, जापान, दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, दक्षिण कोरिया समेत 25 देश प्लास्टिक के इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित कर चुके हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश के अलावा, पश्चिम बंगाल, पंजाब, राज्स्थान, गोवा, हरियाणा, उतराखंड और दिल्ली में पॉलिथीन और प्लास्टिक बैग्स पर प्रतिबंध तो है मगर हिमाचल प्रदेश की तरह इस का कडाई से पालन नहीं हो रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञो के अनुसार 30 माइक्रोन से कम वजन वाला प्लास्टिक बैग 300 साल तक भी आसानी से गलता नहीं है और इस कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी- कार्बन, कलोरीन और फ्लोरीन) का उत्सर्जन होता है। हवा में इसके मिश्रण से प्रदूषण बढता है। अनुमान है कि 1950 से पृथ्वी पर जमा हुए करोडो टन प्लास्टिक को गलते-गलते हजारों साल लग सकते हैं मगर तब तक प्रदूषण के कारण सांस लेना भी दुर्भर हो जाएगा। ताजा अध्ययन ने साफ कर दिया है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए कार्बन डायक्साइड नहीं, बल्कि सीएफसी प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। प्लास्टिक के कारण ही 1999 में बांग्लादेश की राजधानी ढाका का सीवरेज सिस्टम बोल गया था। इस घटना से सीख लेते हुए बांग्ला देश सरकार ने 2002 में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। 2002 में ही आयरलैंड ने प्लास्टिक बैग्स के इस्तेमाल को रोकने के लिए सुपरमार्केट प्लास्टिक बैग्स पर 15 यूरो-सेंट का शुल्क लगा दिया। आयरलैंड के इस कदम से देश में प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल 90 फीसदी तक गिर गया। 2003 में दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने भी पतले पॉलीथिन बैग्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। चीन में 2008 में पूरे देश में मुफ्त में प्लास्टिक बैग्स देना बंद कर दिया गया। सरकार ने इसके प्रयोग पर शुल्क लगा दिया और 0.025 एमएम से कम वजन के पॉलीथिन बैग्स को प्रतिबंधित कर दिया गया। यूरोप के अधिकतर देशों में प्लास्टिक बैग्स के निर्माण में कौनसा प्लास्टिक प्रयोग किया गया है, यह बताना कानूनन अनिवार्य है। इसका मकसद रिसाइक्लिड प्लास्टिक के प्रयोग को रोकना है। अमेरिका में प्लास्टिक के प्रयोग से हर साल 75 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। इसी तरह प्लास्टिक से निर्मित चीजों के प्रयोग से दुनिया की अमूल्य समुद्र जलीय संपदा को हर साल 13 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। भारत को भी प्लास्टिक के अंधाधुध प्रयोग से भारी नुकसान हो रहा है। इस पर पूरे देश में अविलंब प्रतिबंध लगना चाहिए। अगर चीन ऐसा कर सकता है तो भारत क्यों नहीं। हर बात के लिए अदालत अथवा प्राधिकरण को ही क्यों दखल देना पडता है ?
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