शैतानी पाकिस्तानी फितरत
भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की इस बात में काफी वजन है कि “शैतान सुधर सकता है, पाकिस्तान नहीं“। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के मात्र आठ दिन और दीनानगर हमले के पांच महीने बाद पाकिस्तानी आतंकियों ने पंजाब में फिर हमले की जरुर्रत करके पूरे देश को दहला दिया है। पठानकोट में भारतीय वायु सेना के एयरबेस पर आतंकियों का हमला भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता के सूत्र तोडने की जबरदस्त कोशिश है। प्रधानमंत्री की लाहौर यात्रा के बाद आतंकी हमले की आशंका व्यक्त की जा रही थी। खुफिया एजेंसियां आतंकी हमले को लेकर आगाह भी कर चुकी थी। पिछले चार दशक से पाकिस्तान यही कर रहा है। “मुंह में राम-राम और बगल में छुरी“ की कहावत को चरितार्थ करते हुए पाकिस्तान एक ओर भारत से दोस्ती की पींगे बढाएगा, दूसरी ओर भाडे के टटुओं से भारत की अखंडता पर प्रहार कराएगा। शिमला समझौते से लेकर मोदी की लाहौर यात्रा तक पाकिस्तान की “शैतानी फ़ितरत “ का यही सिला रहा है। पाकिस्तान की कायर सेना जब तीन बार भारत को युद्ध में परास्त नहीं कर पाई, तब उसने आतंक का रास्ता पकडा। बेरोजगार और अशिक्षित युवाओं को इस्लाम के नाम पर मर-मिटने की घुटी पिलाई। उन्हें आतंकी बनाकर हिसा फैलाने के लिए भारत भेजा। पाकिस्तान यह बात भली-भांति जानता है कि मुठठी भर आतंकी भारत में घुसकर सिवा निर्दोष लोगों को मारने और खुद मारे जाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तथापि पाकिस्तान का मकसद भारत को अस्थिर करना है। पाकिस्तान भारत को ताकतवर और खुशाहल बनते देख ही नहीं सकता क्योंकि वह भारत का न तो आर्थिक रुप से और न ही युद्ध में मुकाबला कर सकता है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात इस कद्र उलझे हुए हैं कि वह चाहकर भी भारत के साथ दोस्ती नहीं बढा सकता। सेना का देश की सियासत में जबरदस्त दखल रहा है। जब कभी चुनी हुई सरकार सत्ता में आई पाकिस्तानी सेना ने उसे काम ही नहीं करने दिया और जब-तब तख्ता पलट दिया। सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता। सेना की ही तरह उसकी मददगार कुख्यात आईएसआई भारत की कट्टर विरोधी है। इन हालात में पाकिस्तान के गैर-सैनिक शासक जब कभी भी भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाते है, सेना और आईएसआई उस हाथ को काट देते हैं। इन हालात में भारत को पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। जिस देश की सेना, धार्मिक और सियासी नेताओं को भारत का वजूद फूटी आंख नहीं सुहाता हो, उससे दोस्ती नहीं “मक्कारी“ की ही उम्मीद की जा सकती है। पठानकोट हादसे ने फिर भारत की चौकसी और चाक-चौबंदी पर सवाल खडा कर दिया है। 27 जुलाई, 2015 को पंजाब में गुरदासपुर जिले के दीनानगर पर आतंकी हमले से सबक लेते हुए हमें पूरी तरह से सतर्क रहने की जरुरत थी मगर बार-बार आतंकी हमलो ंके बावजूद लगता है हमें सब कुछ भला देनी की बीमारी है। और दुश्मन यह बात बखूबी जानता है। यही वजह है कि आतंकी आराम से भारत में घुसपैठ कर लेते हैं। तीन दिन तक आतंकी पठानकोट के आसपास घुमते रहे मगर खुफिया एजेेंसियों को भनक तक नहीं लगी। आतकियों ने स्पुरिटेंडट ऑफ़ पुलिस लेवल के अधिकारी को अगुवा कर लिया , पंजाब पुलिस फिर भी नहीं चेती.। चिंताजनक बात यह है कि आतंकी आराम से पठानकोट स्थित वायु सेना के एयरबेस में भी घुसपैठ कर गए जबकि वहां कडा पहरा रहता है। पहली बार भारतीय वायु सेना के एयरबेस में आतंकियों ने दस्तक दी है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। इससे तो यही संकेत मिलते हैं कि भारतीय सेना की सुरक्षा में भी भारी छेद है। पठानकोट आतंकी हमले को लेकर देश में तीखी प्रतिक्रियाएं होना स्वभाविक है। आखिर कब तक हमारे बहादुर जवान पाकिस्तानी कायरतापूर्ण हरकतों की खातिर शहीद होते रहेंगे? भारत को कभी-न-कभी तो माकूल जवाब देना ही होगा। मगर सच्चाई यह भी है कि पडोसी की फितरत शैतानी ही क्यों न हो, उससे बोले बगैर रहा नहीं जा सकता। इस तरह के प्रयास आपसी कटुता को कम करने में सहायक होते हैं। मोदी की लाहौर यात्रा के सूत्र आगे बढने ही चाहिए।
भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की इस बात में काफी वजन है कि “शैतान सुधर सकता है, पाकिस्तान नहीं“। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के मात्र आठ दिन और दीनानगर हमले के पांच महीने बाद पाकिस्तानी आतंकियों ने पंजाब में फिर हमले की जरुर्रत करके पूरे देश को दहला दिया है। पठानकोट में भारतीय वायु सेना के एयरबेस पर आतंकियों का हमला भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता के सूत्र तोडने की जबरदस्त कोशिश है। प्रधानमंत्री की लाहौर यात्रा के बाद आतंकी हमले की आशंका व्यक्त की जा रही थी। खुफिया एजेंसियां आतंकी हमले को लेकर आगाह भी कर चुकी थी। पिछले चार दशक से पाकिस्तान यही कर रहा है। “मुंह में राम-राम और बगल में छुरी“ की कहावत को चरितार्थ करते हुए पाकिस्तान एक ओर भारत से दोस्ती की पींगे बढाएगा, दूसरी ओर भाडे के टटुओं से भारत की अखंडता पर प्रहार कराएगा। शिमला समझौते से लेकर मोदी की लाहौर यात्रा तक पाकिस्तान की “शैतानी फ़ितरत “ का यही सिला रहा है। पाकिस्तान की कायर सेना जब तीन बार भारत को युद्ध में परास्त नहीं कर पाई, तब उसने आतंक का रास्ता पकडा। बेरोजगार और अशिक्षित युवाओं को इस्लाम के नाम पर मर-मिटने की घुटी पिलाई। उन्हें आतंकी बनाकर हिसा फैलाने के लिए भारत भेजा। पाकिस्तान यह बात भली-भांति जानता है कि मुठठी भर आतंकी भारत में घुसकर सिवा निर्दोष लोगों को मारने और खुद मारे जाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तथापि पाकिस्तान का मकसद भारत को अस्थिर करना है। पाकिस्तान भारत को ताकतवर और खुशाहल बनते देख ही नहीं सकता क्योंकि वह भारत का न तो आर्थिक रुप से और न ही युद्ध में मुकाबला कर सकता है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात इस कद्र उलझे हुए हैं कि वह चाहकर भी भारत के साथ दोस्ती नहीं बढा सकता। सेना का देश की सियासत में जबरदस्त दखल रहा है। जब कभी चुनी हुई सरकार सत्ता में आई पाकिस्तानी सेना ने उसे काम ही नहीं करने दिया और जब-तब तख्ता पलट दिया। सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता। सेना की ही तरह उसकी मददगार कुख्यात आईएसआई भारत की कट्टर विरोधी है। इन हालात में पाकिस्तान के गैर-सैनिक शासक जब कभी भी भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाते है, सेना और आईएसआई उस हाथ को काट देते हैं। इन हालात में भारत को पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। जिस देश की सेना, धार्मिक और सियासी नेताओं को भारत का वजूद फूटी आंख नहीं सुहाता हो, उससे दोस्ती नहीं “मक्कारी“ की ही उम्मीद की जा सकती है। पठानकोट हादसे ने फिर भारत की चौकसी और चाक-चौबंदी पर सवाल खडा कर दिया है। 27 जुलाई, 2015 को पंजाब में गुरदासपुर जिले के दीनानगर पर आतंकी हमले से सबक लेते हुए हमें पूरी तरह से सतर्क रहने की जरुरत थी मगर बार-बार आतंकी हमलो ंके बावजूद लगता है हमें सब कुछ भला देनी की बीमारी है। और दुश्मन यह बात बखूबी जानता है। यही वजह है कि आतंकी आराम से भारत में घुसपैठ कर लेते हैं। तीन दिन तक आतंकी पठानकोट के आसपास घुमते रहे मगर खुफिया एजेेंसियों को भनक तक नहीं लगी। आतकियों ने स्पुरिटेंडट ऑफ़ पुलिस लेवल के अधिकारी को अगुवा कर लिया , पंजाब पुलिस फिर भी नहीं चेती.। चिंताजनक बात यह है कि आतंकी आराम से पठानकोट स्थित वायु सेना के एयरबेस में भी घुसपैठ कर गए जबकि वहां कडा पहरा रहता है। पहली बार भारतीय वायु सेना के एयरबेस में आतंकियों ने दस्तक दी है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। इससे तो यही संकेत मिलते हैं कि भारतीय सेना की सुरक्षा में भी भारी छेद है। पठानकोट आतंकी हमले को लेकर देश में तीखी प्रतिक्रियाएं होना स्वभाविक है। आखिर कब तक हमारे बहादुर जवान पाकिस्तानी कायरतापूर्ण हरकतों की खातिर शहीद होते रहेंगे? भारत को कभी-न-कभी तो माकूल जवाब देना ही होगा। मगर सच्चाई यह भी है कि पडोसी की फितरत शैतानी ही क्यों न हो, उससे बोले बगैर रहा नहीं जा सकता। इस तरह के प्रयास आपसी कटुता को कम करने में सहायक होते हैं। मोदी की लाहौर यात्रा के सूत्र आगे बढने ही चाहिए।






