शनिवार, 16 जनवरी 2016

प्रतिभा का पलायन

                                   प्रतिभा का पलायन

दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था भारत से प्रतिभा का लगातार पलायन (ब्रेन-डेन) देश  की सबसे बडी त्रासदी है। इससे बडी त्रासदी और कुछ हो ही नहीं सकती। ब्रेन-ड्रेन से देश  की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पडता है। ब्रेन-ड्रेन से भारत को कितना नुकसान हुआ है, इसका आकलन लगाना कठिन  है मगर अमेरिका और यूरोप को समृद्ध करने में भारतीय प्रतिभाओं का अच्छा-खासा योगदान रहा  है। ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2003 से 2013 के दौरान एक दशक में अमेरिका में काम कर रहे वैज्ञानिकं-इंजीनियरों में  57 फीसदी एशिया मूल के हैं। इतना ही नहीं एशिया मूल के 29 लाख  60 हजार वैज्ञानिकं-इंजीनियरों मेंसे साढे नौ लाख भारतीय मूल के हैं। अमेरिका के अक्कौंटिबिलिटी ऑफिस (जीओए) की रिपोर्ट  के अनुसार 2000-2009 के दौरान अमेरिका में एच-1  बी वीजा पाने वाले  हाइली स्किल्ड  वर्कर्स  मेंसे 47 फीसदी भारतीय मूल के थे। 2004 में अमेरिका आए 71,290 विषेशज्ञ डाक्टर्स ( फिजिसियंस) मेंसे 62 फीसदी भारतीय थे और इसी साल 32 फीसदी इंडियन फिजिसियंस इग्लैंड चले गए थे। इग्लैंड के  हाईली स्क्लिड माग्ररेंट प्रोग्राम के तहत 40 फीसदी से ज्यादा भारतीय हैं।  अमेरिका में कार्यरत 70 फीसदी डाक्टर भारतीय मूल के हैं। दुनिया की सबसे बडी स्पेस साइंस एजेंसी “नासा“ में काम कर रहे 40 फीसदी वैज्ञानिक भारतीय मूल के हैं। आस्ट्रेलिया में रोजगार की तलाश  में आने वाले प्रवासियों में 50 फीसदी भारतीय होते हैं। भारत के पास हाईली स्क्लिड प्रतिभाओं का विशाल  खजाना है। इसीलिए, भारत   विकसित देशॉ  और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को हाईली स्क्ल्डि वर्कर्स  सप्लाई करने वाला सबसे बडा देश  है। 2026 तक आबादी में भारत चीन को भी पीछे छोड देगा। 2020 तक  82 करोड युवाओं की आबादी के साथ भारत के पास दुनिया की सबसे ज्यादा युवा शक्ति होगी। भारत में हर साल 35 लाख स्नातक और स्नातकोत्तर प्रतिभाएं तैयार हो रही हैं।  इन आंकडों से यही निष्कर्ष   निकलता है कि भारत से प्रतिभा का जबरदस्त पलायन हो रहा है। यही वजह है कि देश  के देहातों और दूर-सदूर क्षेत्रों में डाक्टरों की भारी कमी है। उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना अच्छी बात है मगर स्वदेश  में उच्च अध्ययन करके सिर्फ  पैसा कमाने और बेहतर -सुख-सुविधाओं के मोह में विदेश  जाना “देशद्रोह“ जैसा है। जिस देश  और समाज ने आपको लाड-प्यार से पाल-पोस कर काबिल इंसान बनाया है, उसकी सेवा की बजाय  मोह-माया की खातिर उसे छोड दिया जाए, यह भी कोई  इंसानियत है?  अब सवाल यह है कि प्रतिभा के पलायन, विशेषतय डाक्टर्स और वैज्ञानियों  को , कैसे रोका जाए, जिनकी सेवाएं की देश  को हमेशा  जरुरत रहती है? नीति आयोग का आकलन है कि भारत में स्वास्थय सेवाएं और बेहतर बनाने के लिए कम-से-कम 6 लाख डाक्टरों की अविलंब जरुरत है और देश  में मौजूदा मेडिकल कालेजों की क्षमता भी इसे पूरा नहीं कर स्कती। डाक्टरों की कमी के कारण पिछले तीन दशकों से देश  में स्वास्थय सेवाओं का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। भारत के पास इस समय 9.36 लाख डाक्टर और लगभग 16.75 लाख नर्से हैं। विभिन्न मेडिकल कालेजों से हर साल 50,000 डाक्टर बाहर आ रहे हैं।  मगर इन मेंसे 40 फीसदी से ज्यादा बाहर चले जाते हैं। देश  जनमानस को समग्र स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में अभी भी काफी पीछे है।  विश्व स्वास्थय  संगठन (डब्लयूएचओ) के मानदंडों के अनुसार एक हजार की आबादी के लिए कम-से-कम एक डाक्टर तो होना ही चाहिए। भारत में 1700 लोगों के लिए भी बमुश्किल  एक डाक्टर है। विदेशॉ  में पैसा और बेहतर सुविधाएं ही प्रतिभा पलायन के लिए अकेले जिम्मेदार नहीं है। प्रशासनिक सेवाओं का राजनीतिकरण, भाई-भतीजावाद, पक्षपात और भ्रष्ट्र  तंत्र प्रतिभा को कहीं ज्यादा पलायन के लिए विवश  करता है। मोदी सरकार को इसे रोकना होगा।