67 वर्षीय भारतीय गणतंत्र
मंगलवार को भारतीय गणतंत्र 67 साल का हो जाएगा। फिरंगी शासन से आजाद होने के लगभग दो साल बाद 26 जनवरी, 1950 को भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक गणतंत्र बना। संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए संप्रभुता, समाजवादी, धर्भनिरपेक्षता एवं लोकतांत्रिक गणतंत्र का रास्ता चुना और यही हमारे स्वत्रंत्रता सेनानियों और वीर पुरुशों का सपना भी था। संविधान में हर देशवासी के लिए समानता, न्यायप्रिय व्यवस्था, स्वत्रंत्रता और एक जैसी बिरादरी (फ्रेर्टनिटी) सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा था। और इस व्यवस्था को लागू करना समकालीन सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। 66 साल इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय होता है। मगर 66 साल का लेखा-जोखा हमें काफी निराश करता है। 66 साल में अगर देशवासियों को अपने गणतंत्र दिवस पर आतंक से डर-डर कर रहना पडे, लोगों को पीने के लिए शु द्ध पेयजल, बेहतर स्वास्थ्य और स्तरीय शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना पडे, बुद्धिजीवियों को भी सहिष्णुता का सबक सीखना पडे, पूंजीपतियों का शोषण सहना पडे और धर्म के नाम पर राजनीति करनी पडे तो ऐसे गणतंत्र की कामयाबी पर शक-शुबह होना स्वभाविक है। मात्र 66 साल में ही भारत समाजवादी बनते-बनते पूंजीवादी व्यवस्था का गुलाम हो गया है। उदारीकरण की आड में समूचे समाजवादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया गया है। नतीजतन, आज भारत सरकार इतनी समृद्ध नहीं है, जितने मुकेश अंबानी जैसे पूंजीपति हैं। सरकार को अपने कर्मचारियों को नए वेतनमान लागू करने के लिए सौ बार सोचना पडता है मगर बडे औद्योगिक घराने अपने कर्मचारियों को मुंहमांगा वेतन और भत्ते देते हैं। पूंजीपति इतने समृद्ध हैं कि अपनी पत्नी को सुविधा सपन्न 250 करोड की कीमत का हवाई जहाज बतौर गिफ्ट देने में समर्थ हैं मगर आम आदमी एक साडी देने की औकात भी न रखता है । असमानता इतनी कि देश के समृद्धतम नागरिक मुकेश अंबानी मुंबई में 1500 अरब रु के आलीशान भवन में रहते हैं मगर गरीब को उसी शहर में सिर छिपाने तक की जगह भी नसीब नहीं है। न्याय व्यवस्था इतनी महंगी कि साधन सपन्न को अदालत में बचाने के लिए वकीलों की फौज पेश हो जाती है मगर आम आदमी एक अदद वकील की फीस भी बमुश्किल चुकाने की हैसियत रखता है। निसंदेह, 66 साल में देश ने आर्थिक तरक्की की है मगर आम आदमी को इसकी भारी कीमत चुकानी पडी है। आम आदमी के पास तसल्लीबख्श गुजारा करने के लिए भी पैसा नहीं है मगर धन्ना सेठों के पास इतना पैसा कि देश के बैंक भी कम पड गए । 66 साल में भारत में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था बखूबी फली-फूली है और देश से टैक्स चुराकर पूंजीपतियों और कर चोरों ने अथाह धन विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है। सत्तारूढ दल भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के दौरान बार-बार इस बात का खुलासा किया था कि विदेशी बैंकों में भारत के पूंजीपतियों का इतना काला धन जमा है कि इसे स्वदेश लाने पर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रु जमा हो सकते हैं। ये आंकडे बढा-चढा कर पेश किए गए हों, मगर इस बात में अक्षरश: सच्चाई है कि विदेशी बैंकों में भारत का अथाह काला धन जमा है। असमान आर्थिक उन्नति और खुशाहली से कोई भी गणतंत्र स्वस्थ नहीं बन सकता और न ही समग्र सामाजिक समृद्धि के बगैर आर्थिक तरक्की के कोई मायने रह जाते हैं। जिस गणतंत्र में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न करने दिया जाए, उनकी सरेआम अस्मत लूट ली जाए, उनसे हर क्षेत्र में भेदभाव किया जाए, गरीबों को बंधुआ बनाकर रखा जाए, कानून का हर मुकाम पर अपमान किया जाए, ऐसा गणतंत्र किस काम का? इतना सब होने पर भी हमें भविष्य के प्रति आशावादी होना चाहिए । युवा भारत की सोच और कार्यशैली मौजूदा पीढी से एकदम भिन्न हैं। और यही हमारी अमूल्य संपत्ति है। 2030 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश बन जाएगा और उसके पास दुनिया में मानव उर्जा का सबसे बडा भंडार होगा। युवा वर्ग ही भारतीय गणतंत्र को रुढिवादी, संकीर्णता और साम्प्रदायिक के जहर से मुक्त करके इसे सफलता के उच्च पायेदान पर ले जा सकता है।






