शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

Let Hill States Like HP, Uttarakhand Implement Odd-even Formula

                                              सम-विषम का खेल 

बच्चों को कुशाग्र बनाने के लिए सम-विषम ( ऑड-ईवन गेम) खेल को बेहतरीन माना जाता है और विभिन्न अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि  भी की है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार अब सम-विषम की कुशाग्रता को प्रदूषण नियंत्रण के लिए  आजमा रही है। देश  की राजधानी दिल्ली में नए साल से वाहनों के लिए सम-विषम योजना लागू की गई है और इसके शुरुआती परिणाम संतोषजनक रहे हैं। इस योजना की सफलता परखने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है जबकि सरकार 15 दिन के समय की मांग कर रही थी। दिल्ली में सम-विषम योजना के लागू होने पर प्रदूषण कम हुआ है या नहीं, एक सप्ताह से भी कम समय में यह आंका नहीं जा सकता। तथापि, दिल्ली के पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने माना है कि इस योजना के लागू होने से मात्र छह दिनों में पेट्रोल और डीजल की खपत में 25 फीसदी की गिरावट आई है। दिल्ली में 400 पेट्रोल-डीजल पंप हैं और प्रत्येक पंप हर माह औसतन 4, 70,000 लीटर पेट्रोल-डीजल बेचा  जाता है। और अगर मौजूदा दर से बिक्री में  गिरावट जारी रही, तो हर फिलिंग स्टेशन की माहवार बिक्री 3,00, 000 लीटर तक आ सकती है। इस तरह देश  की राजधानी में सम-विषम योजना लागू रहने से माहवार 6 करोड 80 लाख लीटर की बचत हो सकती है। निसंदेह, पेट्रोल-डीजल की बिक्री में गिरावट से  सरकार को आबकारी  शुल्क खोना पडेगा, तेल कंपनियों और डीलरों का मुनाफा गिरेगा और इस व्यवसाय से जुडे अन्य कारोबारियों को नुकसान होगा मगर दिल्ली का बडा फायदा होगा।  पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन यह बात भी मनती है कि अगर इस योजना को सख्ती से लागू किया जाए तो पेट्रोल-डीजल की बिक्री में और अधिक गिरावट आ सकती है। सम-विषम योजना का मकसद दिल्ली में डीजल-पेट्रोल की बेइंतहा खपत से बढ रहे प्रदूषण को कम करना है। इस लिहाज से केजरीवाल सरकार की सम-विषम योजना कारगर होती नजर आ रही है। दिल्ली में अगर सम-विषम के साथ साइकिलिंग  वाला  आइडिया भी काम कर जाता है, तो प्रदूषण पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। दिल्ली में इस योजना की सफलता को हिमाचल प्रदेश  और उत्तराखंड जैसे पहाडी राज्यों में अविलंब लागू किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश  की राजधानी  शिमला में इस योजना को तुरंत लागू करने की जरुरत है। शिमला की भौगोलिक संरचना अब और ज्यादा वाहनों के आवागमन की कतई अनुमति नहीं देती।  शिमला में इस समय 80,000 वाहन पंजीकृत हैं मगर मात्र 690 वाहनों के लिए पार्किंग व्यवस्था है। स्थानीय वाहनों के अलावा शिमला में हर रोज औसतन 1000 वाहन बाहर से  आते हैं।  शिमला हिमाचल की राजधानी है, इसलिए लोग-बाग और कर्मचारी सरकारी कामकाज के सिलसिले में राज्य के विभिन्न भागों से  शिमला आते-जाते रहते हैं। शिमला में आए दिन के जाम और ट्रेफिक अव्यवस्था का ख्याल करते हुए उच्च न्यायालय के निर्देश  पर सरकार ने नए वाहनों के पंजीकरण पर रोक लगा दी है। केवल उन्हीं नए वाहनों का पंजीकरण किया जा रहा है, जिनके पास वाहन को पार्क करने की माकूल व्यवस्था है। इसके सुखद परिणाम आए हैं। शिमला के अलावा धर्मशाला और मनाली जैसे पर्यटक स्थलों में भी बढते वाहनों से न केवल समूची ट्रफिक व्यवस्था चरमर्रा गई है बल्कि इससे पहाडों पर भी प्रदूषण का खतरा मंडा रहा है। शिमला के कार्ट रोड स्थित पुराने बस स्टैंड पर वायु में 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पीएम (पार्टिकलस मैटर) पाए गए है जो कि विश्व  मानकों के हिसाब से काफी जहरीले हैं। इसकी तुलना में रिज पर  वायु में 20 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पीएम पाए गए हैं जो कि हानिकारक नहीं है। रिज पर वाहन नहीं चलते, इसलिए यहां प्रदूषण नहीं है। उतराखंड के देहरादून में प्रदूषण बहुत ज्यादा है। मसूरी एव नैनीताल में भी उतरोतर प्रदूषण बढ रहा है। पहाडों में प्रदूषण को रोकने और ट्रेफिक व्यवस्था को सुचारु करने के लिए सम-विषम योजना काफी सहायक हो सकती है।  केजरीवाल सरकार ने सम-विषम योजना को लागू  करके का सुखद पहल तो की है।