राजनीतिक शून्यता
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के आकस्मिक निधन से राज्य में एक तरह से राजनीतिक शून्यता घर कर गई है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में राज्यपाल शासन लागू करना पडा है हालांकि सतारूढ गठबंधन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारत जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल है। मुख्यमंत्री पीडीपी का ही होगा और दिवंगत मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती इस पद को संभालेगी, यह बात तय है। मगर महबूबा मुफ्ती अभी पदभार ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है। रविवार को चार दिनी राजकीय शोक के समापन पर महबूबा के पदभार संभालने की उम्मीद थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और न ही इस बात के संकेत दिए कि वे कब मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करेगी ? महबूबा मुफ्ती अपने पिता के निधन से बेहद शोक संतप्त है और वे तुरंत उनका वारिस बनने के लिए तैयार भी नहीं है। इससे राज्य में अनिश्चितता व्याप्त हो गई है। रविवार को पीडीपी विधायकों को संबोधित करते हुए वे फूट-फूट कर रो दीं। उन्होंने पार्टी विधायकों से काफी कुछ कहा सिवा इसके कि अगली सरकार का गठन कब होगा। इससे पार्टी के साथ-साथ गठबंधन भाजपा का चिंतित होना स्वभाविक है। रविवार को एक अन्य घटनाक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी महबूबा से संवेदना व्यक्त करने श्रीनगर पहुंची। इससे राजनीतिक अटकलें लगनी शुरु हो गई हैं। दरअसल, गठबंधन सहयोगी पीडीपी और भाजपा के राजनीतिक दर्शन में जमीन आसमान का अंतर है। पीडीपी जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों से सार्थक वार्ता और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की पक्षधर है, भाजपा इस बात की घुर विरोधी है। पीडीपी संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत राज्य की स्वायतत्ता को हर हाल में संरक्षित रखने के लिए वचनबद्ध है । इसके विपरीत भाजपा अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के पीछे पडी हुई है। भाजपा के प्रातींय नेता जब-तब इस मुद्दे को उछालते रहते हैं और इस पर पीडीपी की खासी फजीहत हो रही है। भाजपा के वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता सुब्रमण्यम स्वामी रविवार को एक न्यूज चैनल पर कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की पैरवी कर रहे थे। भाजपा के मुस्लिम विरोधी तेवर भी पीडीपी को खासी दुविधा में डाले हुए है। पीडीपी ने राज्य में सता पाने के लिए भले ही भाजपा को गले लगा लिया हो, मगर जमीनी सच्चाई यह है कि दोनों गठबंधन सहयोगी एक-दूसरे से विचारधारा में ही नहीं, नीतिगत कार्यक्रमों में कोसों दूर हैं। संभवतय, यही बात महबूबा मुफ्ती को परेशान कर रही है। पीडीपी के अधिकांश विधायक और सांसद भी भाजपा के साथ गठबंधन के मुखर विरोधी हैं और सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध करते रहते हैं। रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के श्रीनगर दौरे के कई मायने निकाले जा रहे हैं। महबूबा द्वारा पदभार ग्रहण नहीं करने के भी यह मतलब निकाले जा रहे हैं कि वे सभी विकल्पों को खुले रखे हुए हैं। भाजपा की जगह कांग्रेस से गठबंधन एक विकल्प हो सकता है। पीडीपी 2002 से 2008 तक कांग्रेस के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर में सरकार चला चुकी है। 2002 से 2005 तक मुफ्ती मोहम्मद सईद इस गठबंधन के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। तब केन्द्र में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार थी। इस बार केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार है। इस स्थिति में भाजपा से गठबंधन तोडना पीडीपी के लिए आसान नहीं होगा। केन्द्र से मिल रही उदार वित्तीय सहायता बंद हो जाएगी और राज्य पाई-पाई के लिए तरस सकता है। महबूबा के पास विकल्प तो हैं मगर व्यावहारिकता और राज्य की आर्थिक जरुरतें उन्हें भाजपा से गठबंधन तोडने की अनुमति नहीं देती। जाहिर है उनके समक्ष कई चुनौतियां हैं और अब उनका मार्गदर्शन करने के लिए उनके राजनीतिक गुरु पिता नहीं हैं। मुफ्ती सुलझे हुए राजनीतिज्ञ थे और समय के प्रवाह के साथ चलना बखूबी जानते थे। न केवल महबूबा को, बल्कि जम्मू-कश्मीर भी उनकी कमी लंबे समय तक अखरती रहेगी।
जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के आकस्मिक निधन से राज्य में एक तरह से राजनीतिक शून्यता घर कर गई है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में राज्यपाल शासन लागू करना पडा है हालांकि सतारूढ गठबंधन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारत जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत हासिल है। मुख्यमंत्री पीडीपी का ही होगा और दिवंगत मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती इस पद को संभालेगी, यह बात तय है। मगर महबूबा मुफ्ती अभी पदभार ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है। रविवार को चार दिनी राजकीय शोक के समापन पर महबूबा के पदभार संभालने की उम्मीद थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और न ही इस बात के संकेत दिए कि वे कब मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करेगी ? महबूबा मुफ्ती अपने पिता के निधन से बेहद शोक संतप्त है और वे तुरंत उनका वारिस बनने के लिए तैयार भी नहीं है। इससे राज्य में अनिश्चितता व्याप्त हो गई है। रविवार को पीडीपी विधायकों को संबोधित करते हुए वे फूट-फूट कर रो दीं। उन्होंने पार्टी विधायकों से काफी कुछ कहा सिवा इसके कि अगली सरकार का गठन कब होगा। इससे पार्टी के साथ-साथ गठबंधन भाजपा का चिंतित होना स्वभाविक है। रविवार को एक अन्य घटनाक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी महबूबा से संवेदना व्यक्त करने श्रीनगर पहुंची। इससे राजनीतिक अटकलें लगनी शुरु हो गई हैं। दरअसल, गठबंधन सहयोगी पीडीपी और भाजपा के राजनीतिक दर्शन में जमीन आसमान का अंतर है। पीडीपी जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों से सार्थक वार्ता और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की पक्षधर है, भाजपा इस बात की घुर विरोधी है। पीडीपी संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत राज्य की स्वायतत्ता को हर हाल में संरक्षित रखने के लिए वचनबद्ध है । इसके विपरीत भाजपा अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के पीछे पडी हुई है। भाजपा के प्रातींय नेता जब-तब इस मुद्दे को उछालते रहते हैं और इस पर पीडीपी की खासी फजीहत हो रही है। भाजपा के वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता सुब्रमण्यम स्वामी रविवार को एक न्यूज चैनल पर कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की पैरवी कर रहे थे। भाजपा के मुस्लिम विरोधी तेवर भी पीडीपी को खासी दुविधा में डाले हुए है। पीडीपी ने राज्य में सता पाने के लिए भले ही भाजपा को गले लगा लिया हो, मगर जमीनी सच्चाई यह है कि दोनों गठबंधन सहयोगी एक-दूसरे से विचारधारा में ही नहीं, नीतिगत कार्यक्रमों में कोसों दूर हैं। संभवतय, यही बात महबूबा मुफ्ती को परेशान कर रही है। पीडीपी के अधिकांश विधायक और सांसद भी भाजपा के साथ गठबंधन के मुखर विरोधी हैं और सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध करते रहते हैं। रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के श्रीनगर दौरे के कई मायने निकाले जा रहे हैं। महबूबा द्वारा पदभार ग्रहण नहीं करने के भी यह मतलब निकाले जा रहे हैं कि वे सभी विकल्पों को खुले रखे हुए हैं। भाजपा की जगह कांग्रेस से गठबंधन एक विकल्प हो सकता है। पीडीपी 2002 से 2008 तक कांग्रेस के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर में सरकार चला चुकी है। 2002 से 2005 तक मुफ्ती मोहम्मद सईद इस गठबंधन के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। तब केन्द्र में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार थी। इस बार केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार है। इस स्थिति में भाजपा से गठबंधन तोडना पीडीपी के लिए आसान नहीं होगा। केन्द्र से मिल रही उदार वित्तीय सहायता बंद हो जाएगी और राज्य पाई-पाई के लिए तरस सकता है। महबूबा के पास विकल्प तो हैं मगर व्यावहारिकता और राज्य की आर्थिक जरुरतें उन्हें भाजपा से गठबंधन तोडने की अनुमति नहीं देती। जाहिर है उनके समक्ष कई चुनौतियां हैं और अब उनका मार्गदर्शन करने के लिए उनके राजनीतिक गुरु पिता नहीं हैं। मुफ्ती सुलझे हुए राजनीतिज्ञ थे और समय के प्रवाह के साथ चलना बखूबी जानते थे। न केवल महबूबा को, बल्कि जम्मू-कश्मीर भी उनकी कमी लंबे समय तक अखरती रहेगी।






