शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

The Challenges Before Us in New Year

                                                     सुस्वागतम 2016

 2015 को अलविदा और नव वर्ष  2016 का लख-लख सुस्वागतम। गुजरे साल की खट्टी-मीठी यादों को संजोए, नव वर्ष 2016 को अधिकाधिक खुशगवार बनाने के लिए हमें नए संकल्प लेने हैं और नए प्रकल्पों को संजीदगी से लागू करना है।   2016 में गुजरे साल की अपेक्षा और ज्यादा चुनौतियां हैं। पूरी  दुनिया  इस समय तबाही की कगार पर है। हर मुल्क को न्यूक्लियर पॉवर बनने की सनक सवार है। इससे समूचा विश्व  न्यूक्लियर युद्ध के मुहाने पर खडा है। किसी सनकी  शासक के हाथ अगर  न्यूक्लियर पॉवर आ गई तो पलक झपते ही तबाही का मंजर बिछ सकता है। अल कायदा, तालिबान, लश्कर  जैसे खूंखार आतंकी संगठनों को पीछे छोडते हुए अब सीरिया और इराक के बडे क्षेत्र पर कब्जा जमाए आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) ने पूरी दुनिया में दहशत फैला रखी है।  आईएसआईएस की दहशत का आलम यह है कि बेल्जियम की राजधानी बु्रसेल्स में स्थानीय प्रशासन ने आतंकी हमले के डर से नए साल का जश्न  तक रद्द कर दिया। पेरिस के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का कडा पहरा है। इस बार फ्रांस की राजधानी में नए साल के आगमन पर पटाखे नहीं फोडे गए । पेरिस अभी भी 13 नवंबर के आतंकी हमलों से सहमा हुआ है। इन श्रृंखलाबद्ध हमलों में 130 लोग मारे गए थे। रुस की राजधानी मास्को के रेड स्कॉवयर को  इस बार नए साल के  जश्न के लिए बंद रखा  गया  । जर्मनी की राजधानी बर्लिन में क्रिसमस के दिन से ब्रांडेनबर्ग गेट बंद है और नए साल के आयोजन के लिए भी बंद थे । ऐसा पहली बार हुआ  है। यूरोप के अन्य देशों और अमेरिका में भी नए साल के  आगमन  पर  तगडे सुरक्षा बंदोबस्त किए गए । आतंकी हमले की आशंका के माहौल में नए साल के जश्न  में इस बार वह जोश  नहीं था  जो अक्सर हुआ करता था। जब नए साल का आगाज ही भय और आतंक के माहौल से हो रहा है, तो अनुमान लगाया जा सकता है वर्ष  2016 कैसा होगा।  कुल मिलाकर स्थिति यह है कि दुनिया को अपनी सैन्य, आर्थिक और बौद्धिक ताकत की धोंस जमाने वाले अमेरिका और उसके मित्र यूरोपियन देश  इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा से डरे और सहमे हुए है। न्यूक्लियर पॉवर   होते हुए भी यूरोप और अमेरिका आईएस और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूद नहीं कर पाए हैं। 2015 में आतंकी घटनाएं जिस तरह पूरी दुनिया को दहलाती रहीं, 2016 में आतंक का चेहरा और ज्यादा वीभत्स हो सकता है। अगर आतंक 2016 में दुनिया के लिए सबसे बडा खतरा है तो   जलवायु परिवर्तन इससे भी बडा है। आतंक से निपटा जा सकता है और इसका तोड भी है मगर प्राकृतिक कहर का कोई तोड नहीं है। इग्लैंड के कई क्षेत्र इन दिनों बाढग्रस्त हैं। यॉर्क शहर बाढ के पानी में पूरी तरह डूब चुका है। मिडिल-वेस्ट  अमेरिका में मूसलाधार पानी बरस रहा है। 24 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और कई क्षेत्र जलमग्न हो चुके हैं। दक्षिण अमेरिका में भी तूफान और बारिश  ने तबाही मचा रखी है। पिछले सप्ताह दक्षिण अमेरिकी देश  उरूग्वे, पराग्वे, ब्राजील और अर्जेटीना में भारी बारिश  से एक लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पडा। इसी माह तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई में प्रलंयंकारी बारिश  ने भारी तबाही मचाई और दो सप्ताह से भी ज्यादा समय तक सरकार भी बाढग्रस्त हो गई। वर्ष  2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा और मौसम विज्ञानियों का आकलन है 2016 उससे भी अधिक गर्म रहेगा। आतंक और जलवायु परिवर्तन के वैश्विक  खतरों के अलावा  आंतरिक खतरें  भी कम  नहीं  हैं । भारत दुनिया का तेजी से उभरता विकासशील  देश  है और  इस साल ग्रोथ में वह चीन को भी पीछे छोड देंगे। तथापि असहिष्णुता  और सांप्रयिकता दो ऐसे जहर हैं जो देश की अखंडता पर प्रहार  कर  रहें  है। नए साल को खुशगवार बनाने के लिए हमें “जियो और जीने दो“ पर चलना होगा।  प्रकृति के साथ मिल जुलकर आगे बढना  समय की मांग है ।