शनिवार, 23 जनवरी 2016

यूनिवर्सिटीज को राजनीति का अखाडा न बनाएं

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (एससीयू) में दलित छात्र की आत्महत्या पर तगडी राजनीति हो रही है।  छात्र रोहित वेमूला चकवर्ती की खुदकुशी  के लिए जिम्मेदार मूल कारणों  को पीछे छोडकर राजनीतिक दल दलित बनाम गैर दलित की आड में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पर निशाना साधे हुए हैं। इस समय हैदराबाद यूनिवर्सिटी पूरी तरह से राजनीति का अखाडा बनी हुई है। हर रोज सियासी नेता हैदराबाद पहुंचकर यूनिवर्सिटी के माहौल को बिगाडने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय से इस्तीफा मांगा जा रहा है।   वीरवार को दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने हैदराबाद पहुंचकर अनशनकारी छात्रों और रोहित वेमूला के परिजनों से मुलाकात कर भाजपा को आडे हाथ लिया। इससे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, माकपा सचिव सीताराम येचुरी, भाकपा नेता डी राजा और सुधाकर रेड्डी समेत कई नेता हैदराबाद का दौरा कर चुके हैं। सात छात्र भूख हडताल पर हैं। सोमवार (25 जनवरी) को  छात्रों की संयुक्त संघर्ष  समिति ने “चलो हैदराबाद यूनिवर्सिटी“ का आहवान किया है। यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे छात्र रोहित वेमूला ने अपने निलबंन से हताश  होकर पिछले सप्ताहं खुदकुशी  कर ली थी। रोहित समेत पीएचडी कर रहे पांच छात्रों को कथित राजनीति करने के लिए 17 दिसंबर को यूनिवर्सिटी से स्थाई तौर पर निलंबित कर दिया गया था। इन सब पर आरोप था कि वे अंबेडकर स्टुडेंटस एसोसिएषन (एएसए) की आड में दलित राजनीति कर रहे हैं। पूरा मामला सियासी लग रहा है। कहते हैं “जिसकी लाठी, उसी की भैंस“। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन है, इसलिए इसमें केन्द्र सरकार का खासा दखल है। अगस्त, 2015 के बाद के घटनाक्रम साफ बता रहे हैं कि भाजपा से संबद्ध अखिल भारतीय परिशद (एवीबीपी) का विरोध करने के लिए ही रोहित और उनके साथियों को निशाना बनाया गया। रोहित वेमूला ने पीएचडी करने के लिए 2012 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दाखिल लिया था। अप्रैल, 2014 से रोहित को सीएसआईआर (काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) से 25,000 रु की फेलोशिप  मिल रही थी।  पिछले साल 5 अगस्त को रोहित और उनके चार साथियों के खिलाफ जांच बिठाई गई और इसके दो दिन बाद रोहित और उनके साथियों ने एवीबीपी  के नेता की पिटाई कर दी। इस घटनाक्रम के बाद से रोहित और उनके साथियों की प्रताडना शुरू  हो गई। यूनिवर्सिटी ने रोहित की फेलोशिप रोक दी । 17 अगस्त को सिकंदराबाद के सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने मानव संसाधन मंत्री को चिठठी लिखकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की । उनकी इस  चिठठी  का असर भी हुआ। सितंबर में रोहित और उनके साथियों को यूनिवर्सिटी से निलंबित कर दिया गया और दिसंबर 17 को इस फैसले पर यूनिवर्सिटी की निर्णायक बॉडी ने भी मुहर लगा दी। इसके बाद रोहित और उनके साथियों को 3 जनवरी को हास्टल खाली करना पडा। पांचों ने कैंपस में तंबू गाडकर अनशन शुरु कर दिया। रोहित आर्थिक तंगी नहीं झेल पाया और हास्टल से बाहर आने के 12 दिन बाद उसने खुदकुशी  कर ली। खुदकुशी  से कुछ दिन पहले रोहित ने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को व्यंग्यात्मक चिठठी लिखकर दलित छात्रों के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन को तभी संभल जाना चाहिए था। पर क्या करते अधिकारियों ने अपनी आंखों पर राजनीतिक पक्षपात की काली पट्टी जो बांध रखी थी। रोहित की मौत के बाद प्रशासन हरकत में आया तो सही मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हर बार यही होता है। प्रशासन “सांप  निकल जाने के बाद लाठियां पीटता  है“ मगर इससे सांप को मारा नहीं जा सकता। यूनिवर्सिटी प्रशासन तट्स्थ होकर अपनी जिम्मेदारी निभाता, तो एक होनहार छात्र और गरीब मां के बुढापे के एकमात्र सहारे को बचाया जा सकता था। इस दुखद घटनाक्रम से यही सीख मिलती है कि यूनिवर्सिटी को राजनीति का अखाडा नहीं बनाया जाना चाहिए।