कहां ले जाएगी उथल-पुथल?
चीन में व्याप्त मंदी (स्लोडाउन) ने पूरी दुनिया के शेयर बाजार में अफरा-तफरी मचा रखी है। बुधवार और वीरवार को चीन का शेयर बाजार बुरी तरह से क्रेश कर गया और वह भी नए साल के सातवें दिन में ही। इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी और इससे पूरी दुनिया का चिंतितं होना स्वभाविक है। वीरवार को शंघाई एक्सचेंज में खुलते ही सभी अग्रणी शेयर पलक झपते ही क्रेश कर गए और मात्र 29 मिनट में ट्रेडिंग निलंबित करनी पडी। यही हाल बुधवार को था। एक सप्ताह में चीन का बेंचमार्क सीएसआई 300 इंडेक्स 12 फीसदी गिर चुका था। शुक्रवार को स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही और चीनी शेयर्स में दो फीसदी सुधार आया। नौ दिनों में पहली बार चीन ने अपनी मुद्रा को ऊंचा रखकर यह संदेश देने की कोशिश की कि युवान अभी नियंत्रण में है। मगर मार्केट एक्सपर्ट्स अभी भी यह बात समझ नहीं पा रहे हैं कि चीन को साल के शुरु में ही सर्किट ब्रेकर लगाने की जरुरत क्यों पडी। अंमूमन, बेंचमार्क इंडेक्स में अगर पिछले दिन की तुलना में लेवल-वन के दौरान 7 फीसदी, लेवल-2 में 13 फीसदी और लेवल 3 में 20 फीसदी की गिरावट आती है, तभी मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर लगाया जाता है। शेयर बाजार में यह अति की स्थिति मानी जाती है। इस स्थिति में बाजार में अफरा-तफरी रोकने के लिए कुछ देर के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है और अगर गिरावट 7 फीसदी से ज्यादा है तो पूरे दिन के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है। सोमवार और वीरवार को चीनी बाजार में गिरावट 7 फीसदी से कम थी। षुक्रवार को बाजार संभल गया। शुक्रवार को शंघाई स्टॉक मार्केट में तेजी आने और शेयरों में दो फीसदी सुधार से निवेशक कुछ आश्वश्त हुए हैं मगर खतरा अभी टला नहीं है। चीन के स्टॉक मार्केट्स में पिछले कुछ समय से भारी उथल-पुथल मची हुई है और अगर नए साल की शुरुआत ही मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर से हो, तो निवेशकों का भरोसा टूटना स्वभाविक है। बाजार में एक दिन की तेजी और मजबूत युवान के तब तक कोई मायने नहीं जब तक यह बरकरार न रहे। थोडी राहत वाली बात यह है कि कमोडिटी मार्केट में भी काफी देर बाद सुधार आया। वीरवार को 12 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने के बाद शुक्रवार को तेल की कीमतों में उछाल आया। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी अस्थाई है और तेल की कीमतें अभी और गिर सकती हैं। अमेरिकी इंवेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन साच्स का आकलन है कि तेल इस साल 20 डालर प्रति बैलर तक गिर सकता है। शुक्रवार को तेल की कीमत 34.28 डॉलर बैरल थी। अब सवाल यह है कि स्टॉक और कमोडिटी मार्केट्स में एक दिन की तेजी क्या आने वाले अच्छे दिन के संकेत हैं। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और जिस तरह एक जमाने में अमेरिका की छींक पूरी दुनिया को सुनाई देती थी, ठीक उसी तरह अब चीनी इकॉनमी की आहट पूरी दुनिया में सुनाई देती है। भारतीय शेयर बाजार भी इससे अछूता नही हैं। चीन के स्लोडाउन से मई 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी भी रुक गई है। वीरवार को सेंसेक्स पहली बार 25, 000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे खिसक गया था हालांकि शुक्रवार को सेंसक्स में लगभग 83 अंकों का सुधार आया। मगर सेंसेक्स अभी भी 25,000 के स्तर से नीचे है। चीन के स्लोडाउन के फलस्वरुप अगस्त 2015 में सेंसेक्स 1100 अंकों की बडी गिरावट भी दर्ज कर चुका है। तब एक ही दिन में निवेशकों के 7 लाख करोड रु डूब गए थे। अब तक सेंसेक्स 2000 अकों से ज्यादा टूट चुका है। बहरहाल, चीन की मंदी से पूरी दुनिया चिंतित है। मंदी ने पिछल महीने अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में मामूली वृद्धि का असर भी निष्क्रिय कर दिया है। चीन की ग्रोथ में भी गिरावट आई है। ग्रोथ के मामले में भारत चीन को पीछे छोड चुका है। वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन है कि 2016 न केवल जलवायु परिवर्तन ,बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी प्रतिकूल परिणामों सामने आ सकते हैं। स्टॉक मार्केटस में इस साल भारी उथल-पुथल के आसार हैं।
चीन में व्याप्त मंदी (स्लोडाउन) ने पूरी दुनिया के शेयर बाजार में अफरा-तफरी मचा रखी है। बुधवार और वीरवार को चीन का शेयर बाजार बुरी तरह से क्रेश कर गया और वह भी नए साल के सातवें दिन में ही। इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी और इससे पूरी दुनिया का चिंतितं होना स्वभाविक है। वीरवार को शंघाई एक्सचेंज में खुलते ही सभी अग्रणी शेयर पलक झपते ही क्रेश कर गए और मात्र 29 मिनट में ट्रेडिंग निलंबित करनी पडी। यही हाल बुधवार को था। एक सप्ताह में चीन का बेंचमार्क सीएसआई 300 इंडेक्स 12 फीसदी गिर चुका था। शुक्रवार को स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही और चीनी शेयर्स में दो फीसदी सुधार आया। नौ दिनों में पहली बार चीन ने अपनी मुद्रा को ऊंचा रखकर यह संदेश देने की कोशिश की कि युवान अभी नियंत्रण में है। मगर मार्केट एक्सपर्ट्स अभी भी यह बात समझ नहीं पा रहे हैं कि चीन को साल के शुरु में ही सर्किट ब्रेकर लगाने की जरुरत क्यों पडी। अंमूमन, बेंचमार्क इंडेक्स में अगर पिछले दिन की तुलना में लेवल-वन के दौरान 7 फीसदी, लेवल-2 में 13 फीसदी और लेवल 3 में 20 फीसदी की गिरावट आती है, तभी मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर लगाया जाता है। शेयर बाजार में यह अति की स्थिति मानी जाती है। इस स्थिति में बाजार में अफरा-तफरी रोकने के लिए कुछ देर के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है और अगर गिरावट 7 फीसदी से ज्यादा है तो पूरे दिन के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है। सोमवार और वीरवार को चीनी बाजार में गिरावट 7 फीसदी से कम थी। षुक्रवार को बाजार संभल गया। शुक्रवार को शंघाई स्टॉक मार्केट में तेजी आने और शेयरों में दो फीसदी सुधार से निवेशक कुछ आश्वश्त हुए हैं मगर खतरा अभी टला नहीं है। चीन के स्टॉक मार्केट्स में पिछले कुछ समय से भारी उथल-पुथल मची हुई है और अगर नए साल की शुरुआत ही मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर से हो, तो निवेशकों का भरोसा टूटना स्वभाविक है। बाजार में एक दिन की तेजी और मजबूत युवान के तब तक कोई मायने नहीं जब तक यह बरकरार न रहे। थोडी राहत वाली बात यह है कि कमोडिटी मार्केट में भी काफी देर बाद सुधार आया। वीरवार को 12 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने के बाद शुक्रवार को तेल की कीमतों में उछाल आया। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी अस्थाई है और तेल की कीमतें अभी और गिर सकती हैं। अमेरिकी इंवेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन साच्स का आकलन है कि तेल इस साल 20 डालर प्रति बैलर तक गिर सकता है। शुक्रवार को तेल की कीमत 34.28 डॉलर बैरल थी। अब सवाल यह है कि स्टॉक और कमोडिटी मार्केट्स में एक दिन की तेजी क्या आने वाले अच्छे दिन के संकेत हैं। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और जिस तरह एक जमाने में अमेरिका की छींक पूरी दुनिया को सुनाई देती थी, ठीक उसी तरह अब चीनी इकॉनमी की आहट पूरी दुनिया में सुनाई देती है। भारतीय शेयर बाजार भी इससे अछूता नही हैं। चीन के स्लोडाउन से मई 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी भी रुक गई है। वीरवार को सेंसेक्स पहली बार 25, 000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे खिसक गया था हालांकि शुक्रवार को सेंसक्स में लगभग 83 अंकों का सुधार आया। मगर सेंसेक्स अभी भी 25,000 के स्तर से नीचे है। चीन के स्लोडाउन के फलस्वरुप अगस्त 2015 में सेंसेक्स 1100 अंकों की बडी गिरावट भी दर्ज कर चुका है। तब एक ही दिन में निवेशकों के 7 लाख करोड रु डूब गए थे। अब तक सेंसेक्स 2000 अकों से ज्यादा टूट चुका है। बहरहाल, चीन की मंदी से पूरी दुनिया चिंतित है। मंदी ने पिछल महीने अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में मामूली वृद्धि का असर भी निष्क्रिय कर दिया है। चीन की ग्रोथ में भी गिरावट आई है। ग्रोथ के मामले में भारत चीन को पीछे छोड चुका है। वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन है कि 2016 न केवल जलवायु परिवर्तन ,बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी प्रतिकूल परिणामों सामने आ सकते हैं। स्टॉक मार्केटस में इस साल भारी उथल-पुथल के आसार हैं।






