“आया राम, गया राम“ की राजनीति
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में दल-बदल से सरकार के अल्पमत में आने के बाद राजनीतिक अस्थिरता के चलते राष्ट्र्पति शासन लगाए जाने से कांग्रेस का तिलमिला स्वभाविक है। कहते हैं " जैसी बिजाई , वैसी कटाई" । दो-तिहाई बहुमत से चुने जाने के बावजूद राज्य में सरकार का गिरना और संवैधानिक संकट उत्पन्न होना साफ -साफ बताता है कि अरुणाचल प्रदेश में आज भी दल-बदल का रोग लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है। कांग्रेस ने 2014 में पांच विधायकों का दल-बदल करवाकर जो फसल बोई थी , अब वही काट रही है । 60 सदस्यीय विधानसभा के लिए 2014 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 42 सीटें जीती थीं। बाद में पीपीए के पांच विधायक भी कांग्रेस में ही शामिल हो गए थे। इससे कांग्रेस के पास दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत था मगर फिर भी दो साल से भी कम समय में सरकार गिर गई। दिसंबर 2015 में कांग्रेस के 21 विधायक बागी हो गए और इससे नबाम टूकी सरकार अल्पमत में आ गई। बहुमत के लिए सरकार को 31 विधायकों के समर्थन की जरुरत है मगर कांग्रेस के पास 27 विधायकों का ही समर्थन था। पिछले एक माह से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। बागी विधायकों ने 11 सदस्यीय भाजपा से मिलकर नया मुख्यमंत्री चुनकर और विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करके संवैधानिक संकट खडा कर दिया था। राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने 9 दिसंबर को एकाएक घटनाक्रम में राज्य विधानसभा का सत्र 16 दिसंबर को बुला लिया जबकि पहले इसे सरकार की सिफारिश पर 24 जनवरी को बुलाया गया था। जाहिर है यह सब कांग्रेस सरकार को गिराने की मंशा से किया गया था। इस पर सरकार ने विधानसभा को ही सील कर दिया। बागी विधायकों ने विधानसभा उपाध्यक्ष की अध्यक्षता मे कम्युनिटी हॉल में सत्र आयोजित करके कैलिखो पॉल को नया मुख्यमंत्री चुन लिया पर गुवाहटी उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। उच्च न्यायालय ने राज्यपाल की विधानसभा सत्र को पहले बुलाने की आलोचना करते हुए इसे गैर-संवैधानिक कदम बताया। 14 जनवरी को उच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा दिसंबर में बुलाए गए दो दिन के सत्र को ही अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद राज्यपाल ने 15 मिनट के भीतर रिपोर्ट तैयार करके केन्द्र से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की। गत रविवार को मोदी मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रपति से अरुणाचल प्रदेश में संवैधानिक संकट का हवाला देकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल से वह फाइल भी मांगी है जिसमें 15 मिनट में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की गई थी। इस बात में दो राय नहीं है कि गुवाहटी उच्च न्यायालय की व्यवस्था के बाद राज्य में संवैधानिक संकट खडा हो गया था। कांग्रेस सरकार बनाने की जोड-तोड में लगी हुई थी और 11 सदस्यीय भाजपा 21 दल-बदलू विधायकों के साथ सरकार बनाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। कांग्रेस के दल-बदलुओं के साथ मिलकर सरकार बनाना या इस तरह की सरकार को बाहर से समर्थन देने पर भाजपा की खासी किरकिरी होती। इस स्थिति में कांग्रेस के इन आरोपों को बल मिलता कि मोदी सरकार कांग्रेस सरकारों को अस्थिर करने में लगी हुई है। बहरहाल, 1990 के बाद से अरुणाचल प्रदेश में “आया राम, गया राम“ (दल बदल) की राजनीति का बोलबाला रहा है और राज्य के नेताओं में केन्द्र में सतारूढ दल के साथ जाने की रिवायत रही है। 2003 में भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गेंगांग अपांग ने 34 विधायकों के साथ पार्टी से बगावत करके तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुट मिथी को पदच्युत कर दिया था। अपांग अब भाजपा में है। अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन बेहतर विकल्प है। दल-बदल से बनाई गई सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकती। यह बात बेहद दुखद है कि दल-बदल निरोधी कानून के बावजूद देश में अभी भी “आया राम, गया राम“ का बोलबाला है। अरुणाचल चीन की सीमा से लगता संवेदनशील पहाडी राज्य है और चीन की इस राज्य पर बराबर नजर रहती है। राज्य की सामरिक संवेदनशीलता के मद्देनजर सियासी दलों का कर्तव्य बनता है कि वे दल-बदल को निरुत्साहित करके अरुणाचल में राजनीतिक स्थिरता लाने में मदद करें।
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में दल-बदल से सरकार के अल्पमत में आने के बाद राजनीतिक अस्थिरता के चलते राष्ट्र्पति शासन लगाए जाने से कांग्रेस का तिलमिला स्वभाविक है। कहते हैं " जैसी बिजाई , वैसी कटाई" । दो-तिहाई बहुमत से चुने जाने के बावजूद राज्य में सरकार का गिरना और संवैधानिक संकट उत्पन्न होना साफ -साफ बताता है कि अरुणाचल प्रदेश में आज भी दल-बदल का रोग लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है। कांग्रेस ने 2014 में पांच विधायकों का दल-बदल करवाकर जो फसल बोई थी , अब वही काट रही है । 60 सदस्यीय विधानसभा के लिए 2014 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 42 सीटें जीती थीं। बाद में पीपीए के पांच विधायक भी कांग्रेस में ही शामिल हो गए थे। इससे कांग्रेस के पास दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत था मगर फिर भी दो साल से भी कम समय में सरकार गिर गई। दिसंबर 2015 में कांग्रेस के 21 विधायक बागी हो गए और इससे नबाम टूकी सरकार अल्पमत में आ गई। बहुमत के लिए सरकार को 31 विधायकों के समर्थन की जरुरत है मगर कांग्रेस के पास 27 विधायकों का ही समर्थन था। पिछले एक माह से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। बागी विधायकों ने 11 सदस्यीय भाजपा से मिलकर नया मुख्यमंत्री चुनकर और विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करके संवैधानिक संकट खडा कर दिया था। राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने 9 दिसंबर को एकाएक घटनाक्रम में राज्य विधानसभा का सत्र 16 दिसंबर को बुला लिया जबकि पहले इसे सरकार की सिफारिश पर 24 जनवरी को बुलाया गया था। जाहिर है यह सब कांग्रेस सरकार को गिराने की मंशा से किया गया था। इस पर सरकार ने विधानसभा को ही सील कर दिया। बागी विधायकों ने विधानसभा उपाध्यक्ष की अध्यक्षता मे कम्युनिटी हॉल में सत्र आयोजित करके कैलिखो पॉल को नया मुख्यमंत्री चुन लिया पर गुवाहटी उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। उच्च न्यायालय ने राज्यपाल की विधानसभा सत्र को पहले बुलाने की आलोचना करते हुए इसे गैर-संवैधानिक कदम बताया। 14 जनवरी को उच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा दिसंबर में बुलाए गए दो दिन के सत्र को ही अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद राज्यपाल ने 15 मिनट के भीतर रिपोर्ट तैयार करके केन्द्र से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की। गत रविवार को मोदी मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रपति से अरुणाचल प्रदेश में संवैधानिक संकट का हवाला देकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल से वह फाइल भी मांगी है जिसमें 15 मिनट में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की गई थी। इस बात में दो राय नहीं है कि गुवाहटी उच्च न्यायालय की व्यवस्था के बाद राज्य में संवैधानिक संकट खडा हो गया था। कांग्रेस सरकार बनाने की जोड-तोड में लगी हुई थी और 11 सदस्यीय भाजपा 21 दल-बदलू विधायकों के साथ सरकार बनाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। कांग्रेस के दल-बदलुओं के साथ मिलकर सरकार बनाना या इस तरह की सरकार को बाहर से समर्थन देने पर भाजपा की खासी किरकिरी होती। इस स्थिति में कांग्रेस के इन आरोपों को बल मिलता कि मोदी सरकार कांग्रेस सरकारों को अस्थिर करने में लगी हुई है। बहरहाल, 1990 के बाद से अरुणाचल प्रदेश में “आया राम, गया राम“ (दल बदल) की राजनीति का बोलबाला रहा है और राज्य के नेताओं में केन्द्र में सतारूढ दल के साथ जाने की रिवायत रही है। 2003 में भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गेंगांग अपांग ने 34 विधायकों के साथ पार्टी से बगावत करके तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुट मिथी को पदच्युत कर दिया था। अपांग अब भाजपा में है। अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन बेहतर विकल्प है। दल-बदल से बनाई गई सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकती। यह बात बेहद दुखद है कि दल-बदल निरोधी कानून के बावजूद देश में अभी भी “आया राम, गया राम“ का बोलबाला है। अरुणाचल चीन की सीमा से लगता संवेदनशील पहाडी राज्य है और चीन की इस राज्य पर बराबर नजर रहती है। राज्य की सामरिक संवेदनशीलता के मद्देनजर सियासी दलों का कर्तव्य बनता है कि वे दल-बदल को निरुत्साहित करके अरुणाचल में राजनीतिक स्थिरता लाने में मदद करें।






