शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

“आतंक“ पीडित पाकिस्तानी

                               “आतंक“ पीडित पाकिस्तानी

 तालिबान ने उत्तर-पश्चिम  पाकिस्तान में  यूनिवर्सिटी पर हमला करके नवाज शरीफ सरकार और सेना को फिर जता दिया है कि आतंक का कोई दीन-ईमान नहीं होता। और न ही आतंकियों को “गुड“ और “बैड“ में बांटा जा सकता है। जेहादी सिर्फ  आतंकी होता है और वह सिर्फ हिंसा फैलाना जानता है।  आतंकी इंसानियत के सबसे बडी दुश्मन  हैं और उनके मददगार आतंकियों से भी बडे हैवान। आतंकियों ने पाकिस्तान को यह भी जता दिया है कि वे जब और जहां चाहे हमला कर सकते हॅै और सैन्य कार्रवाई तालिबानी आतंक को रोक नहीं सकती।  पेशावर  आर्मी स्कूल हमले के लगभग एक साल बाद ताजा हमले ने पाकिस्तान की आतंक-विरोधी रणनीति की भी पोल खोल दी है। पाकिस्तान आर्मी लंबे समय से तालिबान और  आतंकियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर रही है। तालिबानी आतंकियों ने  बुधवार को खैबर पख्तूनख्वाह में  बाचा खान यूनिवर्सिटी में घुसकर तीस छात्रों को गोलियों से भून डाला। हमले में 50 से ज्यादा को गंभीर रुप से जख्मी हो गए। हमले के समय मुशा यरा सुनने के लिए 3000 छात्र और लगभग 600  शायर यूनिवर्सिटी में उपस्थित थे। आतंकी सुबह यूनिवर्सिटी में दाखिल हुए और आते ही छात्रों और प्रोफसरों पर अंधाधुंध फायरिंग  शुरु कर दी।  बाचा खाना पाकिस्तान की सबसे बडी यूनिवर्सिटी है और फ्रंटियर गांधी के नाम से विख्यात खान अब्दुल गफ्फार खान (बादशाह खान) के नाम पर खोली गई है। गांधीवादी गफ्फार खान की आजादी में अग्रणी भूमिका रही है। बुधवार को उनकी पुण्य तिथि के उपलक्ष्य में मुशायरा आयोजित किया गया था। हमले के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठन ने बाद में दावा किया कि 2014 में पेशावर  आर्मी स्कूल पर हमले के दौरान मारे गए “आतंकी लडाकों“ का बदला लेने के लिए यह हमला किया गया। 2014 में आतंकियों ने पेशावर स्थित आर्मी स्कूल पर हमले करके 141 से अधिक छात्रों और अध्यापकों को गोलियों से भून डाला था। कहावत है, “ जाके पांव न फटी विवाई, सो क्या जाने पीर पिराई“। पेशावर हमले के लगभग एक साल बाद ताजा हमले से पाकिस्तान सरकार और अवाम सकते में है। पाकिस्तान को अब समझ में आया कि आतंक की आग में किस तरह वह भी भस्म हो सकता है। और पाकिस्तान को इस बात का भी अहसास होना चाहिए कि जेहादी कभी भी “गुड“ नहीं हो सकता। उसक न केवल चेहरा ही विकृत होता है, बल्कि मंसूबे भी। अपने निहित स्वार्थी हितों की खातिर पाकिस्तान जेहादियों में गुड ( पाकिस्तान के लिए भारत में आतंक फैलाने वाले) और बैड (सुरक्षा एजेंसियों पर हमला करने वाले) तलाशता रहा है। स्कूली और यूनिवर्सिटी के छात्रों को निशाना बनाकर पाकिस्तानी आतंकी सरकार और अवाम पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहते हैं। ताजा हमले ने पाकिस्तान सरकार के इस दावे की कलई खोल दी है कि सेना ने जेहाद्दी उग्रवाद की कमर तोड दी है। सच यह है कि सेना आतंकियों के ठिकानों पर बमों और टैंकों से हमला तो कर सकती है मगर उनके स्थानीय नेटवर्क को तहस-नहस नहीं कर सकती। और जब तक जेहादियों का स्थानीय लोगों में फैला नेटवर्क  नहीं टूटता, तब तक सैन्य कार्रवाई से आतंकियों को नेस्तनाबूद नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में पाकिस्तान को अपनी मौजूदा सेना आधारित आतंक विरोधी (काउंटरटेररिज्म स्ट्रेटेजी) रणनीति पर फिर से गौर करने की जरुरत  है।  काउंटरटेररिज्म ऑपरेशन को सेना के हवाले करने की नीति कारगर साबित नहीं हुई है। पाकिस्तान में 1958 से ही सेना बेहद ताकतवर है और जैसे-जैसे सेना का दखल बढता गया स्थानीय सिविल प्रशासन नकारा होता गया। 2008 में सैनिक  शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के पदच्युत होने के बाद  यद्यपि पाकिस्तान में चुनी हुई लोकप्रिय सरकार है मगर अभी भी सेना का प्रशासन में खासा दखल है और माना जाता है कि सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता।  पाकिस्तान के मित्र देशों  को उसे समझाने की जरुरत है कि बंदूक की नोक पर विद्रोह को दबाया नहीं जा सकता। अलबत्ता इससे यह और ज्यादा भडकता है। अमन-चैन सुनिश्चित  करने के लिए सरकार को भी  शांति और धैर्य से काम करना पडता है। पाकिस्तान को अब तो समझ जाना चाहिए कि पडोसी के घर आग लगाकर उसकी लौ में वह खुद भी भस्म हो सकता है।