शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

Big Relief to Farmers

                                                          किसानों को बडी राहत

मोदी सरकार की ताजा फसल बीमा योजना कर्ज में डूबे और प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह टूट चुके किसान के लिए बहुत बडी राहत है।  दो साल  से किसानों को लगातार बेमौसमी बारिश  अथवा सूखे का प्रकोप झेलना पड रहा है। पिछले साल बेमौसमी बारिश  और ओलावृष्टि  से रबी की फसल करीब-करीब पूरी तरह नष्ट  हो गई थी। फिर बरसात में कम पानी बरसने से खरीफ की फसल सूख गई और इस बार भी सर्दी में गर्म मौसम ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। इन हालात में नई फसल बीमा योजना किसानों के लिए आशा  की नई किरण साबित हो सकती है। मौजूदा बीमा योजनाए किसानों को ज्यादा राहत नहीं दे सकी हैं। केन्द्र सरकार ने बुधवार को लोहडी (उत्तर भारत का त्योहार) , पोंगल (दक्षिण भारत)  एवं बीहू (पूर्वोतर का त्योहार)  के दिन किसानों को “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना“ की सौगात दी । नई फसल बीमा योजना अगले वित्तीय साल से लागू होगी। इस बीमा योजना के तहत किसानों को खरीफ की फसल के लिए कुल बीमा राशि  का 2 फीसदी, रबी की फसल के लिए 1.5 फीसदी और तिलहन, कपास जैसी कमर्शियल  फसल के लिए 5 फीसदी का प्रीमियम अदा करना होगा।   प्रत्येक सीजन में केवल एक ही प्रीमियम लिया जाएगा।  बाकी का प्रीमियम केन्द्र और संबंधित राज्य की सरकार चुकता करेगी। प्रीमियम की कोई अधिकतम सीमा भी निर्धारित नहीं की गई है। किसानों को बगैर किसी कटौती के बीमा की पूरी रकम की अदायगी की जाएगी। फसल के नुकसान का आकलन भी आधुनिक तौर-तरीकों से किया जाएगा। प्राकृतिक आपदा में बाढ, ओलावृष्टि   और फसलोत्तर (पोस्ट-हार्वेस्ट) नुकसान को भी  शामिल किया गया है। इससे किसानों को खासी राहत मिली है। पिछले कुछ समय से ओलावृष्टि   से भी रबी की फसल को खासा नुकसान हो रहा था। केन्द्र सरकार को  “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना“ लागू करने के लिए 8,000 करोड का अतिरिक्त खर्चा वहन करना पडेगा। लंबे समय से यह सुझाव दिया जा रहा था कि किसानों को सब्सिडी अथवा ऋण माफी जैसी योजना की बजाय निश्चित (अस्सुरेड़)  सिंचाई सुविधाएं और कारगर फसल बीमा योजना का लाभ दिया जाना चाहिए। निश्चित  सिंचाई सुविधाएं मिलने से किसानों को मौसमी बारिश  पर निर्भर नहीं रहना पडेगा। देश  में अभी भी लगभग 54 फीसदी क्रॉप एरिया  निश्चित  सिंचाई से वंचित है। देष में क्योंकि 70 फीसदी बारिश  जून से सितंबर के मध्य होती है, इसलिए अक्टूबर से मई के बीच बोई जानी फसल बगैर निश्चित  सिंचाई सुविधा के अभाव में अक्सर सूख जाती है। सिंचाई सुविधाएं नहीं होने से महाराष्ट्र  का विदर्भ क्षेत्र कई सालों से सूखे की चपेट में है। साल-दर-साल फसल बर्बाद होने से पीडित किसान   आत्महत्या करने पर विवश  हो रहे हैं। देश  में किसानों द्वारा आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले भी विदर्भ  में ही सामने आए हैं। फसल बीमा योजना के लागू होने से किसानों द्वारा आत्महत्याओं के मामले कम हो सकते हैं बशर्ते इस योजना पर मुस्तैदी से अमल हो। अक्सर यह देखा गया है को बीमा कंपनियां मुनाफे के लिए बीमा राशि  देने में या तो अनावश्यक  विलंब करती हैं या औपचारिकताओं की कमी की आड में दावे खारिज कर देती हैं । फसल बीमा योजाना में नुकसान आकलन की प्रकिया में भी हेर-फेर की गुजाइंश  हो सकती है और “भ्रष्ट  “ लोग इसका फायदा उठाकर किसानों का शोषण  कर सकते हैं।  एआईसी (एग्रीकल्चर इंसोरेंस कंपनी ऑफ इंडिया)  के माध्यम से लागू की जा रही मौजूदा ऊंचे प्रीमियर वाली राष्ट्रीय  कृषि  बीमा योजना और संशोधित कृषि  बीमा योजना ज्यादा कारगर साबित नहीं हो पाई है हालांकि इन बीमा योजनाओं के तहत क्लेम सरकार तय करती है। नई योजना में सरकार इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गई है। नई योजना के तहत बीमा राशि  के क्लेम का 25 फीसदी  सीधे बीमाकर्ता (इंसुरेड) के खाते में जमा किए जाने के प्रावधान से किसानों का शोषण  कम हो सकता है।  एक राज्य में केवल एक बीमा कंपनी के जिम्मे इस योजना लागू करने का प्रावधान मुनाफा कमाने वाली बीमा कंपनियों को इससे दूर रख सकता है।  बहरहाल, लगातार प्राकृतिक आपदा से बेहाल किसान को फौरी नहीं, स्थाई राहत की जरुरत है। और अगर इस बार भी उसे माकूल राहत नहीं मिली तो उसका फसल बीमा योजना से भरोसा ही उठ जाएगा।