क्रिकेट फिर बनेगी जेंटलमैन गेम
देश मे अगर किसी समृद्धतम स्पोर्टस संस्था में अविलंब क्रांतिकारी बदलाव की जरुरत है, तो वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) है। बीसीसीआई दुनिया की सबसे धनी स्पोर्टस बॉडी है और इसलिए सियासी नेता और रसूखदार हस्तियां इस पर कब्जा जमाने की फिराक में रहती हैं। यहां तक कि जिन लोगों को खुद क्रिकेट का ”कखग” नहीं मालूम, अब तक वे ही दुनिया की इस समृद्धतम संस्था को चलाते रहे हैं। एक जमाना था जब क्रिकेट को जेंटलमैन गेम माना जाता था जिसमें स्लेजिंग, बॉडीलाइन बाउलिंग, एक्सेसिव अपीलिंग के लिए कोई जगह नहीं होती थी, मैच फिक्सिंग तो दीगर रहा। खिलाडी पूरी संजीदगी से नियमों का पालन करते। मगर समय के साथ-साथ पैसा और शोहरत ने इस जेंटलमैन गेम को धन बटोरने का जरिया बना दिया। सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग ने क्रिकेट को सटोरियों की गेम भी बना दिया है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में तो हद ही हो गई। आईपीएल के खिलाडी मैच फिक्सिंग में लिप्त पाए गए, प्रेम में मदहोश कुछ खिलाडियों ने नियमों को तोडने में कोई कसर नहीं छोडी और पूरा आईपीएल विवादों में उलझ कर रहा गया। मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोपों में चैन्नई सुपर किंग और राजस्थान रायल टीमों को आईपीएल से बाहर होना पडा। मई 2013 में दिल्ली पुलिस ने आईपीएल के चार खिलाडियों को मैच फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया । चैन्नई सुपर किंग के सीईओ और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यपन को मई 2013 में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। और इस समिति ने आईपीएल तत्कालीन सीईओ सुंदर राजन की भूमिका को ही संदिग्ध पाया था। मुदगल समिति की सिफारिशॉ के बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएषन सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गई और अदालत से बीसीसीआई की कार्यशैली को पारदर्शी एवं और ज्यादा क्रिकेट फ्रेंडली बनाने की गुहार लगाई। बिहार क्रिकेट एसोसिशन की याचिका पर गौर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था। सोमवार को समिति ने सर्वोच्च न्यायाल को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने बीसीसीआई को पेशेवर बनाने, सियासी नेताओं को इससे अलग रखने, क्रिकेट को फिर जेंटलमैन गेम बनाने, खिलाडियों के हितों की रक्षा करने और बीसीसीआई को निहित स्वार्थों के टकराव से मुक्त रखने के सुझाव दिए हैं। लोढा समिति की सिफारिषों में सबसे अहम बात आडिट को लेकर है। समिति की सिफारिश है कि बीसीसीआई का ऑडिट सीएजी से करवाया जाए। अभी बीसीसीआई का ऑडिट प्राइवेट आडिटर्स करते है़ं। पूरी दुनिया जानती है कि इस तरह के ऑडिट की उतनी विश्वसनीयता नहीं है जितनी संवैधानिक संस्था सीएजी के ऑडिट की होती है। समिति ने क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध करने की जो सिफारिश की है, उस पर विवाद हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय लोढा समिति की सिफारिशॉ पर क्या निर्णय लेता है, यह देखना अभी बाकी है मगर इतना तय है कि बीसीसीआई को इन सिफारिशों पर देर-सबेर अमल करना ही होगा। अगर अगर बीसीसीआई ने ऐसा नहीं किया तो बिहार क्रिकेट एसोसिएशन लोढा समिति की सिफारिशों पर अमल करवाने के लिए फिर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाएगी। बीसीसीआई के लिए बेहतर यही होगा कि वह स्वेच्छा से अविलंब लोढा समिति की सिफारिशॉ को अक्षरश लागू करे। ऐसा करने से बीसीसीआई की विश्वसनीयता बढेगी। मगर मिलियन डॉलर सवाल यह है कि क्या बीसीसीआई आसानी से लोढा समिति की सिफारिशे लागू कर पाएगी। इस समय बीसीसीआई में राजनेताओं का दबदबा है और यही हालात विभिन्न राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशनों का है। राजनेता बदलाव लाने में सबसे पीछे रहते हैं। भारत में क्रिकेट का जनून है और अगर बीसीसीआई अभी भी नहीं सुधरा तो कभी नहीं सुधरेगा। वैसे भारत मे हर छोटे-बडे क्रांतिकारी बदलाव को लाने में न्यायपालिका की अग्रणी भूमिका रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीसीसीआई मे क्रांतिकारी बदलाव लाने भी न्यायपालिका ही पहल करेगी।
देश मे अगर किसी समृद्धतम स्पोर्टस संस्था में अविलंब क्रांतिकारी बदलाव की जरुरत है, तो वह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) है। बीसीसीआई दुनिया की सबसे धनी स्पोर्टस बॉडी है और इसलिए सियासी नेता और रसूखदार हस्तियां इस पर कब्जा जमाने की फिराक में रहती हैं। यहां तक कि जिन लोगों को खुद क्रिकेट का ”कखग” नहीं मालूम, अब तक वे ही दुनिया की इस समृद्धतम संस्था को चलाते रहे हैं। एक जमाना था जब क्रिकेट को जेंटलमैन गेम माना जाता था जिसमें स्लेजिंग, बॉडीलाइन बाउलिंग, एक्सेसिव अपीलिंग के लिए कोई जगह नहीं होती थी, मैच फिक्सिंग तो दीगर रहा। खिलाडी पूरी संजीदगी से नियमों का पालन करते। मगर समय के साथ-साथ पैसा और शोहरत ने इस जेंटलमैन गेम को धन बटोरने का जरिया बना दिया। सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग ने क्रिकेट को सटोरियों की गेम भी बना दिया है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में तो हद ही हो गई। आईपीएल के खिलाडी मैच फिक्सिंग में लिप्त पाए गए, प्रेम में मदहोश कुछ खिलाडियों ने नियमों को तोडने में कोई कसर नहीं छोडी और पूरा आईपीएल विवादों में उलझ कर रहा गया। मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोपों में चैन्नई सुपर किंग और राजस्थान रायल टीमों को आईपीएल से बाहर होना पडा। मई 2013 में दिल्ली पुलिस ने आईपीएल के चार खिलाडियों को मैच फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया । चैन्नई सुपर किंग के सीईओ और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यपन को मई 2013 में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। और इस समिति ने आईपीएल तत्कालीन सीईओ सुंदर राजन की भूमिका को ही संदिग्ध पाया था। मुदगल समिति की सिफारिशॉ के बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएषन सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गई और अदालत से बीसीसीआई की कार्यशैली को पारदर्शी एवं और ज्यादा क्रिकेट फ्रेंडली बनाने की गुहार लगाई। बिहार क्रिकेट एसोसिशन की याचिका पर गौर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था। सोमवार को समिति ने सर्वोच्च न्यायाल को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने बीसीसीआई को पेशेवर बनाने, सियासी नेताओं को इससे अलग रखने, क्रिकेट को फिर जेंटलमैन गेम बनाने, खिलाडियों के हितों की रक्षा करने और बीसीसीआई को निहित स्वार्थों के टकराव से मुक्त रखने के सुझाव दिए हैं। लोढा समिति की सिफारिषों में सबसे अहम बात आडिट को लेकर है। समिति की सिफारिश है कि बीसीसीआई का ऑडिट सीएजी से करवाया जाए। अभी बीसीसीआई का ऑडिट प्राइवेट आडिटर्स करते है़ं। पूरी दुनिया जानती है कि इस तरह के ऑडिट की उतनी विश्वसनीयता नहीं है जितनी संवैधानिक संस्था सीएजी के ऑडिट की होती है। समिति ने क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध करने की जो सिफारिश की है, उस पर विवाद हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय लोढा समिति की सिफारिशॉ पर क्या निर्णय लेता है, यह देखना अभी बाकी है मगर इतना तय है कि बीसीसीआई को इन सिफारिशों पर देर-सबेर अमल करना ही होगा। अगर अगर बीसीसीआई ने ऐसा नहीं किया तो बिहार क्रिकेट एसोसिएशन लोढा समिति की सिफारिशों पर अमल करवाने के लिए फिर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाएगी। बीसीसीआई के लिए बेहतर यही होगा कि वह स्वेच्छा से अविलंब लोढा समिति की सिफारिशॉ को अक्षरश लागू करे। ऐसा करने से बीसीसीआई की विश्वसनीयता बढेगी। मगर मिलियन डॉलर सवाल यह है कि क्या बीसीसीआई आसानी से लोढा समिति की सिफारिशे लागू कर पाएगी। इस समय बीसीसीआई में राजनेताओं का दबदबा है और यही हालात विभिन्न राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशनों का है। राजनेता बदलाव लाने में सबसे पीछे रहते हैं। भारत में क्रिकेट का जनून है और अगर बीसीसीआई अभी भी नहीं सुधरा तो कभी नहीं सुधरेगा। वैसे भारत मे हर छोटे-बडे क्रांतिकारी बदलाव को लाने में न्यायपालिका की अग्रणी भूमिका रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीसीसीआई मे क्रांतिकारी बदलाव लाने भी न्यायपालिका ही पहल करेगी।






