गुरुवार, 21 जनवरी 2016

No Lesson Learnt From Malta Tragedy

                                कब तक ?

विदेश  में पैसा कमाने का जनून पंजाब के युवाओं को मौत के आगोश  में धकेल रहा है। पंजाब के लोगों में विदेश  जाने का जनून इस कद्र सवार है कि अगर आप  राह चलते भी किसी पंजाबी को बाहर  जाने का न्यौता दें ,  तो वह  बगैर किसी बात की परवाह किए फौरन अपना सब कुछ बेच-बाच कर आपके के साथ चल पडेगा।  पंजाब के  इस जनून का फायदा उठाकर  लोभी दलालं और कबूतरबाज भोले-भाले युवाओं को आसानी से फांस लेते हैं। हैरानी इस बात की है कि राज्य सरकार ने 19 साल पहले की मालटा त्रासदी से भी कोई सबक नहीं सीखा और अब 25 युआवों को फिर  मौत के आगोश  में जाना पडा है।  25 दिसंबर, 1996 को मालटा में  अप्रवासी से लदी नाव के  भू-मध्य सागर में पलट जाने से पंजाब के 170 लोग डूब कर मारे गए थे। 18-फीट लंबी इस नाव में अप्रवासियो को भेड-बकरियों की तरह ठूंस- ठूंस कर लादा गया था जिस वजह यह पलट गई। और अब इस माह की 10 तारीख को मध्य अमेरिका के पनामा के निकट आप्रवासियों को अवैध तौर पर अमेरिका ले जा रही नाव के डूब जाने से पंजाब के 25 युवाओं की मौत हो गई। वही परिस्थितियां, वही लोग और वैसी ही त्रासदी। 19 साल में कुछ नहीं बदला। मृतकों में अधिकतर 20-22 साल के युवा हैं।  पनामा नाव दुर्घटना में जीवत बचे जालंधर के भोगपुर गांव निवासी ने परिजनों से अपनी सलामती के बारे सूचित किया, तब जाकर  इस त्रासदी का पता चला। इसके बाद  सरकार को होश  आया। और होश  भी क्या आया, कार्रवााई बयानबाजी तक सीमित है। अमेरिका जाने के लिए इन युवाओं द्वारा ट्रैवल एजेंटों को 10 से 25 लाख रु दिए गए और इसके लिए हमेशा  की तरह कई परिवारों को अपनी जमीन तक बेचनी पडी। पिछले कई सालों से यह सिलसिला जारी है। दलाल और कबूतरबाज विदेश  भेजने की आड में फर्जी कागजात बनाकर लोगों को अवैध तरीके से भेजते हैं और अंत में ऐसे लोगों को या तो जेल की सजा काटनी पडती है या मालटा अथवा पनामा जैसी  त्रासदी  का शिकार होना पडता है। राज्य सरकार आज तक इस समस्या का कोई पुख्ता हल नहीं ढूंढ पाई है। सरकार कनूतरबाजों की ठगी रोकने के लिए कितनी संजीदा है, इसका पता इस बात से चलता है कि मालटा त्रासदी के 19 साल बाद भी राज्य सरकार 29 आरोपियों के खिलाफ आज तक चार्जशीट  तक तैयार नहीं कर पाई है। 2012 में राज्य सरकार ने जन दबाव में कबूतरबाजी रोकने के लिए कानून भी बनाया था मगर इस पर आज तक गंभीरता से अमल नहीं हो पाया है। मालटा त्रासदी के आरोपी कबूतरबाज धडल्ले से अपना अवैध कारोबार चला रहे हैं। सरकार की इस उदासीनता से त्रासदी के पीडित परिवारों के जख्म समय के साथ-साथ और गहरे होते जा रहे हैं। राज्य सरकार की ही तरह केन्द्र सरकार को भी कबूतरबाजी को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मीडिया में मामला उछाले जाने पर कुछ समय के लिए मगरमच्छी आंसू बहाकर इतिश्री कर ली जाती है। केन्द्र सरकार 2014 से  इराक में लापता 39 पंजाबी युवाओं का आज तक कोई पता नहीं लगा पाई है। सियासी दलों को मामलों को सुलझाने की बजाय इनमें अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में ज्यादा दिलचस्पी रहती है। मालटा त्रासदी में पंजाब के सभी दलों ने जमकर राजनीतिक रोटियां सेंकी मगर पीडित परिजनों को राहत पहुंचाने में कोई आगे नहीं आया। यही स्थिति पनामा त्रासदी के पीडित परिवारों की है। सतारूढ अकाली दल और विपक्षी दल इस त्रासदी का राजनीतिक लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोडेंगे मगर कबूतरबाजी को रोकने के लिए कुछ नहीं करेगें। इस समस्या का हल मिल-जुल कर निकाला जा सकता है पर समकालीन सियासी दलों को हल निकालने से कहीं ज्यादा निहित राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने की पडी रहती है। आखिर, यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा?