शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

चार दिन की चांदनी,,,,



एक लोकप्रिय जुमला है,“ चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात“। यह जुमला भारत में सुरक्षा प्रबंधों को लेकर एकदम मौजूं होता है। गणतंत्र दिवस पर इस बार राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश  में सुरक्षा का इस कद्र तंगडा बंदोबस्त किया गया था कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। भारी सुरक्षा प्रबंधों को देखकर ऐसा लगता था कि आतंकी जैसे हमला करने ही वाले हैं और खुफिया एजेंसियों को इस बारे वे पहले ही आगाह कर चुके हैं। गणतंत्र दिवस और स्वत्रंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर सुरक्षा के तगडे इंतजाम किए जाना देश  की जरुरत है और ऐसा काफी पहले से होता रहा है। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री समेत देश  की अति वशिष्ट  हस्तियां और विदेशी  मेहमान राष्ट्रीय समारोहों में शरीक होते हैं, इसलिए सुरक्षा का तगडा इंतजाम किया जाता है। बस अंतर इतना है कि पिछले कुछ समय से भारत में फैलाए जा रहे पाकिस्तान प्रायोजित आंतक के कारण अब सुरक्षा और ज्यादा कडी कर दी गई है। मगर सवाल यह है कि सुरक्षा के इंतजाम खास समारोहों तक ही सीमित क्यों हैं? और   अति विषिश्ठ हस्तियों की ही सुरक्षा क्यों? आम आदमी की सुरक्षा क्यों नही़?  बडे तो बडे बच्चे भी इस सच्चाई को जानते हैं कि आतंकी और देशद्रोही हमले करने से पहले न तो किसी को कानो-कान खबर लगने देंगे और नही ही वे इतने नासमझ है कि महत्वपूर्ण  आयोजनों के समय कडी सुरक्षा व्यवस्था के बीच आतंकी हमले करने का दुस्साहस करेंगें। 1984 से पठानकोट हमले तक कुल मिलाकर अब तक  65 बडे आतंकी हमले हो चुके हैं और इनमें 1926 लोग मारे जा चुके हैं मगर 15 अगस्त, 2004 में असम के धमेजा स्कूल हमले को छोडकर आज तक कोई भी आतंकी हमला महत्वपूर्ण आयोजन के दौरान नहीं हुआ है। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि संसद पर हुए हमले को छोडकर आतंकियों ने ऐसे जगहों पर हमले किए जहां सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम नहीं थे। संसद पर हमले का मकसद भारत सरकार को यह जताना था कि आतंकी कहीं भी हमला कर सकते हैं। हर बार सुरक्षा एजेंसियां  राष्ट्रीय समारोहों पर भारी बंदोबस्त की  सफलता  पर  अक्सर इतराती रहती हैं। इस बार गणतंत्र दिवस पर फुलप्रूफ सुरक्षा प्रबंधों पर भी सरकार और सुरक्षा एजेंसियां काफी इतरा रहीं हैं मगर सच यह है कि देश  की सुरक्षा एजेंसियां आम आदमी की रक्षा करने में न तो संजीदा है और न ही वे इस बात की चिंता करती हैं। सुरक्षा एजेंसियों का ज्यादातर समय और फोर्स  अति वशिष्ठ  हस्तियों की सुरक्षा में ही लग जाता   हैं। आंकडे बताते हैं कि देश  के हर वीवीआईपी की सुरक्षा के लिए कम-से-कम तीन सुरक्षाकर्मी है जबकि 761 आम आदमियों के लिए मात्र  एक पुलिसकर्मी है। पंजाब में पुलिस सिर्फ  वीवीआईपी की सुरक्षा तक ही सीमित होकर रह गई है। इस राज्य में हर वीवीआईपी के लिए पांच पुलिसकर्मी हैं। अति  वशिष्ठ व्यक्तियों के लिए सुरक्षा प्रबंधों का आलम यह है कि सरकार के अपने मानदंडों से लगभग 16, 000 अधिक पुलिसकर्मी भद्र लोगों की सेवा में तैनात किए गए हैं।  इन आंकडों से पता चलता है कि देश  में आतंकी हमलों से आम आदमी कितना महफूज हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी सरकार से इस बात की जवाब तलबी कर चुका है कि मुकेश  अंबानी  जैैसे रईस के लिए सरकारी सुरक्षा व्यवस्था क्यों मुहैया कराई जा रही है जबकि वे  अपनी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करने में पूरी तरह से समर्थ  हैं। सरकार ने मुकेश  अंबानी के लिए “जेड“ सिक्योरिटी कवर मुहैया करा रखा है। यहां तक कि श्रद्धा चिट फंड स्केम के आरोपी मातंग सिंह को भी “जेड“ सुरक्षा कवच दिया गया है। बात आतंकी हमले को लेकर हो या सामान्य स्थिति की, सुरक्षा को लेकर सरकार की धारणा अति वशिष्ठ लोगों  तक ही सीमित है। इसीलिए, जब कभी 26/11 जैसा आतंकी हमला होता है, न तो खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक लगती है और न ही सुरक्षा एजेंसियां निर्दोष लोगों को बचा पाती हैं।