गुरुवार, 28 सितंबर 2017

सुुस्ती पर चुस्ती

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की जब-तब न केवल विपक्षी दलों द्वारा ही तीखी आलोचना की जा रही है, बल्कि भाजपा के भीतर भी इस को लेकर सुगबुगाहट है। मंगलवार को नई दिल्ली में सपन्न हुई दो-दिवसीय भाजपा की राष्ट्रीय  कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के सांसदों और सीनियर नेताओं  ने अर्थव्यवस्था की सुस्ती और बेरोजगारी पर चिंता जाहिर की । प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन  मैं इन पहलुओं की विस्तार से चर्चा की। सबसे ज्यादा चिंता  आर्थिक सुस्ती को लेकर है। वैसे इस सुस्ती के “भ्रम“ को दूर करने  के लिए मोदी सरकार और भाजपाई  खासे चुस्त हैं। सुस्ती की वजह से रोजगार के अवसर घटे हैं। प्रधानमंत्री ने हर साल एक करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा कर रखा है। सरकार के तीन साल से ज्यादा का समय निकल चुका है मगर हर साल बमुश्किल  2 से 3 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है। लेबर ब्यूरो की रिपोर्ट के मुतबिक अप्रैल से दिसंबर 2016 के दौरान आठ प्रमुख सेक्टर्स मे सिर्फ 2.3 लाख लोगों को रोजगार मिला था। देश  का  आईटी सेक्टर भारी मंदी के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका में  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप की खालिस देसी रोजगार नीति एवं डिजीटाइजेशन के कारण आईटी सेक्टर में रोजगार के अवसर सिकुड रहे हैं। ऑटोमेशन के कारण 2022 तक आईटी सेक्टर में 4, 800,00 जॉबस पर छंटनी का खतरा मंडरा रहा है। रोजगार से जुडी हैड हंटर इंडिया का आकलन है कि अगले तीन साल के दौरान भारत में हर साल दो लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड सकता है। मैककिंसे एंड कंपनी का आकलन है कि आईटी सेक्टर्स की कंपनियों का लगभग 50 फीसदी स्टाफ अगले तीन-चार सालों में अप्रासंगिक हो जाएगा। इन हालात में बेरोजगार युवकों को प्रधानमंत्री से ही आस है।  मगर नोटबंदी के कारण तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्था में व्याप्त सुस्ती अभी भी बरकरार है और 7.1 फीसदी की ग्रोथ 2016-17 की चौथी तिमाही में अब सिमट कर 6.1 फीसदी ही रह गई थी जबकि एक तिमाही पहले यह सात फीसदी थी। अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि अगर 7.1 फीसदी ग्रोथ रेट (2015-16) में रोजगार सृजन मात्र 1. 1 फीसदी के करीब था, तब 6 फीसदी ग्रोथ रेट में दस लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराना नामुमकिन है। ताजा स्थिति से यही निष्कर्ष  निकलता है कि “मोदी सरकार“ ने रोजगार के मामले में लोगों को “मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखाए हैं। भाजपा के वयोवृद्ध नेता एवं पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने मंगलवार को अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर तीखे प्रहार किए। पूर्व वितमंत्री का आरोप है कि जेटली ने  “अर्थव्यवस्था का बेडा गर्क कर दिया है“। अर्थव्यवस्था की हालात बेहद खराब है। निजी निवेश  गिर रहा है। कंस्ट्रक्शन  और सर्विस सेक्टर में सुस्ती व्याप्त है। फैक्टरी उत्पादन सिकुड रहा है। कृषि  में भारी संकट है। पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने अर्थव्यवस्था को डूबो दिया है़। नव गठित आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य एवं नामचीन अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने भी माना है कि अर्थव्यवस्था में अविलंब सुधार की जरुरत है और अर्थव्यवस्था की सुस्ती के लिए ढांचागत समस्याएं जिम्मेदार हैं। भल्ला का सुझाव है कि अगर ग्रोथ को तेज करना है तो आरबीआई को ब्याज दरों में कम-से-कम एक फीसदी घटानी होगी। अधिकांश  तटस्थ  अर्थषास्त्री भी नोटबंदी को सुस्ती के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार मानते हैं । पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने भी नोटबंदी को अनावश्यक  बताया है। मगर मोदी सरकार इस सच्चाई को मानने को तैयार नहीं है। सिन्हा की आलोचना के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार का बचाव करते हुए कहा है कि चिंता की कोई बात नही है। पूरी दुनिया मानती है कि भारत तेजी से बढती अर्थव्यवस्था है मगर आंकडे इसकी गवाही नहीं देते हैं। मोदी सरकार  को अपनी गलतियों को मानकर बेरोजगारी और सुस्ती हटाने  को उच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।