गुरुवार, 14 सितंबर 2017

Crisi Of Ideal Leadership

 ऋषि -मुनियों और तपस्वियों की पावन धरती पर समकालीन मायावी बाबाओं के आश्रमों और डेरों के  भ्रमजाल से भोले-भाले लोगों को बचाना समाज की जिम्मेदारी है। हर बार की तरह इस बार भी देश  का राजनीतिक नेतृत्व इस मामले में सबसे पीछे है। राजनीतिक दलों को जनकल्याण की बजाए वोट की राजनीति कहीं ज्यादा प्रिय है।  महंतों की संस्था अखिल भारतीय अखाडा परिषद ने चौदह स्वयंभू  बाबाओं की काली सूची जारी करके नेक काम किया है। इस काली सूची में बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आसाराम बापू और सिरसा डेरा सच्चा सौदा के संचालक गुरमीत राम रहीम इंसा के अलावा राधे मां भी  शामिल है। भारतीय अखाडा परिषद ने जनता का भी आहवान किया है कि लोगों को मायावी बाबाओं के कारनामों से सतर्क रहना चाहिए। अखाडा परिषद ने सरकार से स्वंयभू बाबाओं के काले कारनामों को रोकने के लिए माकूल कानून बनाने का भी अनुरोध किया है। तथापि, इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि करोडों लोगों की धार्मिक भावनाओं को कायदे-कानून में बांध  कर नहीं रखा जा सकता। देश   में पहले से  विश्वसनीय  न्याय प्रकिया मौजूद है। बाबाओं के मायावी जाल को तोडने के लिए सामाजिक सजगता और आत्म-नियंत्रण की जरुरत होती है। महज कानून बनाए जाने  से  अपराध रुकते नहीं है। भारत का अवाम इंटरनेट के युग में भी धर भीरु है और छोटी से समस्या को स्वंय ढूंढने की बजाए तत्काल इसका फौरी हल चाहता है। बुरे समय के लिए अपनी गलतियों की जगह ग्रहों को जिम्मेदार ठहराता है। स्वास्थय संबंधी समस्यायों का हल पूजा-पाठ और झाड-फूंक में तलाशता  है। विशुद्ध व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कष्टों  के निवारण के लिए  “दिव्य शक्ति“ की पनाह ली जाती है। और  अलौकिक शक्तियों का  स्वांग  रचाने वाले ढोंगी बाबा इन सब मान्यताओं और विवशताओं का भरपृर फायदा उठाते हैं। भारत में आज भी भेड चाल की रीत है। गंभीर से गंभीर मसले पर तत्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है और थोडे समय बाद इसे पूरी तरह से भुला दिया जाता है। अब सिरसा डेरे के संचालक गुरमीत राम रहीम का मामला ही ले लीजिए। सीबीआई कोर्ट  द्वारा राम रहीम को बलात्कार के अपराध में जेल की सजा सुनाने के बाद से मीडिया ने उसकी बखिया उधेड कर रख दी है। जबकि सिरसा का एक स्थानीय अखबार लंबे समय से डेरे के काले कारनामों का भंाडाफोड कर रहा था। 15  साल पहले जब डेरे के गुंडों ने  दिन-दहाडे अखबार के संचालक और संपादक की हत्या कर दी, तब कोई कुछ नहीं बोला। 2002 में सिरसा डेरे की एक साध्वी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष को चिठ्ठी लिखकर डेरा के संचालक गुरमीत राम रहीम पर यौन शोषण  का आरोप लगाया था। तब भी इन आरोपों की गहनता से जांच नही की गई। इसी  चिठ्ठी पर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने  प्रथम  दृष्टया  गुरमीत राम रहीम को यौन शोषण  का  दोषी  माना था। इसके बावजूद सिरसा डेरे के भक्तों की आस्था नहीं डोली और पांच करोड से ज्यादा भक्त उसके पीछे भागते रहे। इससे ज्यादा सामाजिक त्रासदी क्या हो सकती है कि करोडों लोगों की आस्था का स्थल मां-बेटियों के यौन शोषण  का अडडा बना रहे और भक्तजनों को इसके भनक तक न लगे। और सबसे बडी त्रासदी यह है कि यौन शोषण  और ह्त्याओं के आरोपों से घिरे रहने के बावजूद गुरमीत राम रहीम को सियासी नेताओं ने सिर-आंखों पर बिठाए रखा और उसके आशीर्वाद के लिए कतार में खडे रहते । इससे पहले “बलात्कार“ के आरोपी  आसाराम और उसके पुत्र नारायण साईं के मामले में भी यही हुआ है। तो क्या हम मान लें कि हमारी आत्मा की आवाज मर चुकी है़़? समय रहते  हम क्यों  सजग और सचेत नहीं हो पाते? यह स्थिति यही  दर्शाती  है कि देश   में आदर्शवादी  नेतृत्व का भारी संकट  है़।

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