लोगों को चौबीस घंटे निर्बाध बिजली मुहैया कराना पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रमुख वायदों मेंसे एक था। तब भाजपा ने वायदा किया था कि सत्ता में आते ही सौ दिन के भीतर हर गांव और मोहल्ले को 24 घंटे नियमित बिजली सप्लाई मुहैया कराई जाएगी। सत्ता में आने के बाद अब मोदी सरकार ने 2022 तक हर गांव को 24 घंटे नियमित बिजली सप्लाई का लक्ष्य रखा है। सोमवार को प्रधानमंत्री ने हर घर को बिजली देने का वायदा करते हुए “सौभाग्य“ योजना का ऐलान किया। इस योजना के तहत गरीबों को मुफ्त में बिजली के कनेक्शन दिए जाएंगे। “प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना“ के तहत 2019 तक देश के हर घर में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना पर 16,000 करोड रु खर्च होंगे। बिजली का आविष्कार हुए सवा सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं और देश को आजाद हुए सात दशक मगर दुर्भाग्यवश भारत में चार करोड से अधिक लोगों के घरों में अभी भी बिजली नहीं है। दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना पहले से ही गांवों में चल रही है। दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में 18,500 गांवों को तत्काल बिजली मुहैया कराने का वायदा किया था। मई 2017 तक 13,469 गांवों का विद्युतीकरण हो चुका था। 5000 से ज्यादा गांव अभी भी बचे हैं। बहरहाल, वायदे करना एक बात है मगर उन्हें पूरा करना दूसरी बात। देश में हर घर को बिजली के अलावा इसकी अबाधित सप्लाई ज्यादा जरुरी है। बिजली के उस बल्ब का क्या फायदा जो जले ही नहीं। बिजली का कनेक्शन मिलने के बाद भी नियमित सप्लाई मिले, भारत में इसकी कोई गारंटी नहीं है। 2015 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सहयोग से सेंटर ऑन एनर्जी, इन्वायरमेंट एंड वॉटर ने भारत में एनर्जी असेस पर पहली बार अध्ययन किया था। इसमें पाया गया कि उत्तर प्रदेश , बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश , ओडीशा और पश्चिम बंगाल के बिद्युतीकृत गांवों में 12 घंटे भी बिजली सप्लाई नहीं की जाती है। अध्ययन के अनुसार बिजली कनेक्शन के बावजूद भारत में बिजली की कोई गारंटी नहीं है। वैसे बिजली उत्पादन क्षमता के लिहाज से भारत दुनिया में पांचवा सबसे बडा देश है। बिजली उत्पादन में तीसरा बडा देश और खपत में दुनिया का चौथा। सितंबर, 2016 तक देश में 584,22 अरब यूनिट (बीयू) का उत्पादन किया जा रहा था। 2017 में 88. 5 जीडब्ल्यू (गीगा वाट) अथवा 85,500 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है। सरकार का दावा था कि 2015 तक देश में बिजली का कोई संकट नहीं रहेगा और भारत पॉवर सरप्लस हो जाएगा। मगर इसके बावजूद लोगों को गर्मियों में भारी पॉवर कटस का सामना करना पडता है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि सरकार की कथनी और करनी में बहुत बडा अंतर रहता है। कागजों में 99.5 फीसदी गांवों का बिजलीकरण हो चुका है मगर सरकार के अपने ही आंकडों कहते हैं कि 20 फीसदी आबादी अभी भी बिजली से महरुम है। वातानुकूलित कमरो में बाबुओं द्वारा योजनाओं का प्रारुप और कार्यवन्यन का खाका तैयार किया जाता है मगर योजना से लाभान्वित होने वाले जन तक इसका पूरा लाभ पहुंचता ही नहीं है। मोदी सरकार के समक्ष भी यही बडी चुनौती है। सियासत के चेहरे-मोहरे बेशक बदल गए हों मगर योजना को अमली जामा देने वाली वही “भ्रष्ट “ नौकरशाही । मुखौटा बदलने से शरीर के विकार नहीं बदलते । सरकार ने 2022 तक सभी गांवों में शत-प्रतिशत बिजलीकरण और 24 घंटे नियमित बिजली सप्लाई की महत्वाकंाक्षी योजना तैयार की है। मगर जिस गति से अभी गांवों का बिजलीकरण हो रहा है, उससे लगता नहीं है कि मोदी सरकार अगले बीस साल में भी इस वायदे को पूरा कर पाएगी। सरकार देश में हर महीने लगभग दो लाख अथवा साल में 24 लाख गांवों का बिजलीकरण ही कर पा रही है जबकि अभी चार करोड से ज्यादा गांवों में बिजली नहीं है। वायदों को संजीदगी से पूरा करने के लिए जमीनी हकीकत की ठोंक-पीट कर परख भी जरुरी है।
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