चुनाव समीप आते ही सियासी दलों को मतदाताओं के हितों की गंभीर चिंता होने लगती है। लोकसभा चुनाव को अभी डेढ साल से ज्यादा का वक्त है मगर चुनावी बिसात अभी से बिछाई जा रही है। वीरवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महिला आरक्षण बिल को पारित करवाने का आग्रह किया । चिठ्ठी मे कहा गया है, “आपके पास लोकसभा में बहुमत है, महिला आरक्षण बिल आसानी से पारित हो सकता है। राज्यसभा में इस बिल पर कांगेस आपका समर्थन करेगी“। भाजपा ने इस पर तंज कसते हुए कहा,“ पहले आप अपने सहयोगी दलों से तो पूछ ले“। दरअसल, संप्रग में षामिल लालू प्रसाद यादव का राश्ट्रीय जनता दल और संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने के सख्त खिलाफ है। देष के सियासी दलों के दोहरे आचरण की विडबंना है कि राजनीतिक दलों को पंचायतों और स्वायत निकाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने में कोई समस्या नहीं है मगर संसद और विधानसभाओ में आरक्षण पर सख्त ऐतराज है। महिला आरक्षण बिल को संसद में लटके इस 12 सितंबर को पूरे 20 साल हो गए हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो इस बिल की जीएसटी बिल से भी कहीं ज्यादा दुर्गति हो रही है। 1996 में एचडी देवगौडा सरकार ने महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए बिल लाया था। यह बिल लोकसभा में आज तक पारित नही हो पाया मगर 2010 में राज्यसभा ने इस बिल को अपनी स्वीकृति दे रखी है। बिल के निरस्त होने पर अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने इसे 1998 में फिर से लोकसभा में पेष किया था मगर तब लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने बिल को छीन कर इसके टुकडे-टुकडे करके फाड डाला था। 1999, 2002 और 2003 में वाजपेयी सरकार ने महिला आरक्षण बिल को संसद में पेष किया मगर तीनों बार बिल पारित नहीं हो सका। 2008 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने इस बिल को राज्यसभा में पेष किया और मार्च, 2010 में राज्यसभा ने इसे पारित भी कर दिया। मगर लोकसभा ने इस बिल को आज तक पारित नहीं किया है। और अब जब लोकसभा चुनाव समीप आ रहे हैं, सतारूढ भाजपा के साथ कांग्रेस को भी महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण की याद आ रही है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि कांग्रेस अब लग रहा है, मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल को जल्द ही संसद में पेष कर सकती है। महिलाओं पर मोदी सरकार विषेश ध्यान दे रही है। उज्जवला स्कीम के अलावा तीन तलाक पर सरकार के मुस्लिम महिला फ्रेंडली स्टैंड से अल्पसंख्यक महिलाओं की सहानुभूति मोदी सरकार के प्रति बढी है। कांग्रेस के लिए यह और भी बडी चिंता का विशय है। कांग्रेस की राश्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी पार्टी महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पारित नहीं करवा पाई हालांकि सोनिया गांधी, सुशमा स्वराज और माकपा की वृंदा कारत ने हाथ में हाथ डालकर बिल के समर्थन में महिलाओं की एकता का प्रदर्षन भी किया था। सोनिया गांधी द्वारा इस मुद्दे को प्रकाष में लाने का मूल मकसद यही है कि अगर लोकसभा में बिल पारित हो जाता है, तो इसका कुछ श्रेय कंाग्रेस भी ले सक्ती है। मोदी सरकार को महिला आरक्षण बिल को संसद से पारित करवाने में कोई दिक्क्त नही आएगी। बिल के कट्टर विरोधी राजद का विरोध अब अप्रासंगिक हो गया है। समाजवादी पार्टी दो फाड हो चुकी है और अखिलेष यादव इस बिल के पक्ष में कांग्रेस के साथ जाएंगे। राजग में हाल में षामिल हुई जनता दल (यू) ने भी बिल का विरोध वापस ले लिया है। इस स्थिति में मोदी सरकार अगर संसद से बिल पारित करवा लेती है, तो यह उसकी बहुुत बडी उपलब्धि होगी।
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