बुजुर्गों का कहना है,“ कष्ट के बगैर कोई सुख नहीं (नो गेन विदआउट पैन )“। देश में एक समान कर व्यवस्था- गुडस एंड सर्विसेज टैक्स के लागू होने के बाद से यही कुछ हो रहा है। अब तक इससे कष्ट (पैन) ज्यादा गेन कम हो रहा है। आम उपभोक्ता को कीमतों में कोई राहत मिली हो, इसके कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। व्यापारियों को नई कर व्यवस्था से अलग से जूझना पड रहा है। अर्थव्यवस्था में सुस्ती व्याप्त है और फिलहाल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीएसटी से वृद्धि के भी कोई संकेत नहीं है। शराब और तंबाकू कर-दर-कर लगाने का सबसे बडा जरिया है। सरकार जितना मर्जी कर का बोझ डाल दे, शराब पीने और तबाकू का सेवन करने वालों पर इसका कोई असर नहीं पडता है और न ही कभी महंगी शराब, तबांकू उत्पाद को लेकर जनता सडक पर उतरती है। और अब कार उधोग को भी टैक्स रुपी दूध देने वाली गाय में शा मिल कर लिया गया है। जीएसटी परिषद ने शनिवार को मिड साइज कारों पर दो फीसदी, बडी कारों पर 5 फीसदी और एसयूवी पर 7 फीसदी सेस बढा दिया है। कम कीमतों वाली कारों को बख्श दिया गया है। लक्जरी कारों पर 28 फीसदी जीएसटी के अलावा 15 फीसदी सेस पहले से लागू है। ताजा कर वृद्धि से ऑडी क्यू7 अब 3.5 लाख महंगी हो जाएगी। टाटा इनोवा भी 65,000 हजार रु महंगी हो जाएगी। जीएसटी परिषद कारों पर अधिकतम दस फीसदी सेस लगाने के लिए अधिकृत है। यानी अभी आठ फीसदी सेस और लगाया जा सकता है और इसे चरणबद्ध तरीके से बढाया जाएगा। कराधान सिंद्धात का तकाजा है कि दुधारु गाय से ज्यादा से ज्यादा दूहने में कोई हर्ज नही होता है। कराधान सिद्धांत का यह भी तकाजा है कि अमीरों और धनाढ्य वर्ग पर अधिकाधिक कर लगाकर इस धन को गरीबों के कल्याण पर खर्च किया जाए। इसे आर्थिक असमानता कम होगी। मगर कराधान सिद्धांत यह भी कहता है कि कर व्यवस्था प्रगतिशील होनी चाहिए और इससे बचत और उत्पादन दोनों को ही भरपूर प्रोत्साहन मिलना चाहिए। कार उत्पादकों ने ताजा वृद्धि पर अपना असंतोष जताया है। ऑटोमोबाइल उधोग पहले ही संकट से जूझ रहा है। खासकर कमर्शियल वाहन मंदी से पीडित है। इस साल मई माह में कमर्शियल वाहनों की बिक्री में 33 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। कारों की बिक्री में हालाँकि अभी भी 10 से 12 की वृद्धि जारी है मगर कार उत्पादकों का कहना है कि अगर सरकार की उधोग के प्रति तदर्थ नीति जारी रही तो कमर्शियल वाहनो की तरह कार उधोग भी मंदी की चपेट में आ सकता है। भारत में कार उत्पादन दुनिया का सबसे तेजी से आगे बढता उधोग है। अग्रणी कार उत्पादक पिछले 18 माह में बार-बार बदलते नियमों और करों से परेशा न है। इससे भारत में नए निवेश लाने में विलंब हो सकता है। छोटा और मझौला व्यापारी वर्ग भी जीएसटी से खासा परेशान है। रिटर्न फाइल करने की जटिल प्रकिया और करों के अलग-अलग स्लैब छोटे व्यापारियों के पल्ले नहीं पड रहे हैं। व्यापारी भारतीय जनता पार्टी के साथ लंबे समय से जुडे हुए हैं और वे पार्टी का सबसे पक्का जनाधार माना जाते हैं। मगर पहले नोटबंदी और उसके फौरन बाद जीएसटी के कारण व्यापारियों को पार्टी से ही खासी नाराजगी है। नोटबंदी ने व्यापारियों की कमर तोड दी थी और अब जीएसटी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। कनाडा, आस्ट्रेªलिया, जापान, मलेशिया और सिंगापुर को भी शुरु-शुरु में जीएसटी जैसी व्यवस्था लागू करने पर तरह-तरह की दिक्क्तों का सामना करना पडा था। भारत आबादी के लिहाज से इन मुल्कों से कई बडा है। इसलिए देश में जीएसटी को लेकर समस्याएं भी ज्यादा है। जीएसटी से अगर जनता को तकलीफ हो रही है, तो सरकार को इन्हें अविलंब दूर करना चाहिए। ऐसी व्यवस्था किस काम की, जिससे लोगों को हलकान होना पडे।
यह ब्लॉग खोजें
ब्लॉग आर्काइव
- अप्रैल (2)
- मार्च (1)
- सितंबर (2)
- अगस्त (2)
- जुलाई (3)
- जून (2)
- मई (2)
- अप्रैल (4)
- मार्च (9)
- फ़रवरी (7)
- जनवरी (6)
- दिसंबर (11)
- नवंबर (7)
- अक्टूबर (4)
- सितंबर (10)
- अगस्त (22)
- जुलाई (2)
- जून (11)
- मई (12)
- अप्रैल (7)
- मार्च (6)
- फ़रवरी (1)
- दिसंबर (5)
- नवंबर (4)
- अक्टूबर (5)
- सितंबर (17)
- अगस्त (33)
- जुलाई (28)
- जून (21)
- मई (30)
- अप्रैल (20)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (23)
- जनवरी (23)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (22)
- अक्टूबर (22)
- सितंबर (19)
- अगस्त (22)
- जुलाई (21)
- जून (19)
- मई (20)
- अप्रैल (19)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (20)
- जनवरी (19)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (21)
- अक्टूबर (21)
- सितंबर (21)
- अगस्त (16)
- जुलाई (15)
- जून (20)
- मई (18)
- अप्रैल (21)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (21)
- जनवरी (24)
- दिसंबर (25)
- नवंबर (27)
- अक्टूबर (23)
- सितंबर (27)
- अगस्त (35)
- जुलाई (22)
Copyright 2015 | Chander M Sharma . Blogger द्वारा संचालित.






