लोकसभा चुनाव से पौने दो साल पहले रविवार को किए गए केन्द्रीय मंत्रिमंडल विस्तार ने भाजपा की समकालीन राजनीति के कुछ संवेदनशील पहलुओं को उजागर किया है। इस विस्तार ने केन्द्र में सत्तारूढ राजग की प्रासंगिकता पर भी सवाल खडा कर दिया है। ताजा विस्तार में राजग में शामिल सहयोगी दलों का दरकिनार किया जाना काबिलेगौर है। राजग में नए-नए शामिल हुए नीतिश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) को नुमाइंदगी न मिलना सामरिक विवशता माना जा सकता है मगर शिवसेना की उपेक्षा के साफ-साफ संकेत हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अकेले ही लडना चाहती है। गठबंधन की राजनीति भाजपा को खासा नुकसान कर रही है। सहयोगी दलों की खडमस्तियां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता पर भी भारी पड रही है। पंजाब विधानसभा चुनाव इसका प्रमाण है। शिरोमणी अकाली दल के साथ मिलकर लडने का नतीजा पार्टी को भारी कीमत देकर चुकाना पडी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के बावजूद इस चुनाव में भाजपा पंजाब में मात्र तीन सीटें जीत पाई हैं। ताजा मंत्रिमंडल विस्तार में अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध शिवसेना नेता संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया है कि एनडीए तो अब लगभग मर चुका है। मोदी मंत्रिमंडल में अभी भी कुछ जगह बची है और सहयोगी दलों को अभी भी उम्मीद है कि अगला विस्तार उनके लिए किया जा सकता है। विस्तार का सबसे अहम पहलू है भाजपा की फायरब्रंाड नेता उमा भारती का मंत्रिमंडल में बने रहना। पहले माना जा रहा था कि राजीव प्रताप रूडी की तरह असंतोषजनक परफॉरमेंस के लिए उमा भारती की भी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी जाएगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। उमा भारती का विभाग जरुर बदला गया है। मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल न होकर उमा भारती ने अपने तरीके से विभाग बदलने के प्रति नाराजगी भी जताई है। साध्वी उमा भारती का मंत्रिमंडल में बने रहना “सर्व शक्तिमान“ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीमाओं को भी उजागर करता है। धारा प्रवाह “गीता प्रवचन“ के लिए ख्यातिप्राप्त उमा भारती राष्ट्रीय स्वंय सेवक की बेहद लाडली है। भाजपा के सीनियर नेताओं में उमा भारती को हिन्दुत्व का दमकता मुखौटा माना जाता है। वे बाबरी मस्जिद को ढहाने के मामले भी नामजद है। रामजन्म भूमि आंदोलन में भी उन्होंने बढ-चढ कर भाग लिया था। 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा को मध्य प्रदेष विधानसभा में प्रचंड तीन-चौथाई बहुमत मिला था और वे राज्य की मुख्यंमंत्री बनी थीं। अगस्त 2004 में हुबली दंगे मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट निकलने पर उहें पद छोडना पडा था। तुनकमिजाजी उनकी कमजोरी है। इसी वजह 2004 में पार्टी के लाल कृष्ण आडवानी की मौजूदगी में उमा भारती ने वरिष्ठ नेताओं को खरी-खोटी सुनाई और बैठक छोडकर चली गईं। इस पर अनुशासनहीनता के लिए उन्हें 2005 में पार्टी से ही निकाल दिया गया। सुश्री भारती ने अपनी अलग पार्टी बनाई और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा नेताओं की जमकर छीछालेदारी की। मोदी को तब उन्हें “विनाश पुरुष “ तक कहा था। छह साल बाद 2011 में उमा भारती भाजपा में लौट आईं। प्रधानमंत्री मोदी के बारे यह बात जगजाहिर है कि वे अपने विरोधियों को कभी नहीं भूलते हैं मगर प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें उमा भारती को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करना पडा और इस बार उन्हें ना चाहते हुए भी साध्वी का मंत्री पद यथावत रखना पडा। इस प्रकरण से पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी भाजपा में उतने भी सर्व शक्तिमान नहीं हैं जितने माने जाते हैं। तथापि निर्मला सीतारमन को रक्षा मंत्री बनाना और 9 मेंसे 4 अनुभवी पूर्व नौकरशाहों को मंत्रिमंडल में शामिल करना प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक है। पहली बार देश को फुल टाइम महिला रक्षा ंमंत्री मिली है। रविवार के मंत्रिमंडल विस्तार का एक ही संदेश है“ परफॉरम और पेरिश “। नए मंत्रियों को भी प्रधानमंत्री ने यही संदेश दिया है। देश के लिए यह बहुत अच्छी बात है कि मंत्रियों का आकलन उनके कामकाज से किया जा रहा है।
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