चीन के शियामेन में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा पत्र में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों का नाम लिया जाना भारत की बहुत बडी कूटनीतिज्ञ सफलता है। चीन की ना-नुकर के बावजूद सोमवार को जारी ब्रिक्स घोषणा पत्र में पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठन लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए, मोहम्मद समेत दुनिया के दस आतंकी संगठनों का मानवता के लिए सबसे बडा खतरा बताया है। गोवा में भारत को भले ही यह सफलता नहीं मिली थी, अब शियामेन में मिल गई है। घोषणा पत्र में जिन दस आतंकी संगठनों का जिक्र है, उन मेंसे चार पाकिस्तान में हैं। घोषणा पत्र पर भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ चीन, भारत, रुस और दक्षिण अफ्रीका के र राष्ट्रपति हस्ताक्षर हैं। पांचों देश ब्रिक्स के सदस्य हैं। यह संगठन दुनिया की तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्थाओं का ताकतवर संगठन है। चीन ने ब्रिक्स में पाकिस्तान और आतंकवाद को न लाने की भरसक कोशिश भी की। चीन कतई नहीं चाहता था कि भारत चीन की धरती पर आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद का मुद्दा उठाए। सम्मेलन से पहले चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था, “पाकिस्तान में आतंक-निरोधी मुद्दों पर भारत की भारत की कुछ चिंताएं हैं मगर यह ब्रिक्स सम्मेलन में उठाने का विषय नहीं है“। पिछले साल उडी हमले के बाद गोवा में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में चीन पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों के नाम घोषणा पत्र से बाहर रखने में कामयाब रहा था। मगर इस बार चीन में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भारत पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को शामिल करवाने में सफल रहा है। घोषणा पत्र में 17 जगह आतंकवाद का उल्लेख है और ब्रिक्स ने इससे लडने के लिए सहयोग तंत्र विकसित करने पर जोर दिया है। ब्रिक्स के घोषणा पत्र में आतंकी संगठनों का नाम लिए जाने से पाकिस्तान के असली चेहरे का भी दुनिया के सामने भंाडाफोड हुआ है। इससे इन आतंकी संगठनों के खिलाफ साझी कार्रवाई करने में भी मदद मिलेगी। मंगलवार को राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच डोकलाम विवाद के बाद पहली बार सकारात्मक बातचीत भी हुई। एक घंटे से ज्यादा समय तक चली इस बातचीत में दोनों नेताओं ने द्धिपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने का संकल्प दोहराया है। डोकलाम सीमा विवाद के कारण भारत और चीन के संबंध तल्ख हो गए थे मगर इस विवाद को भी कूटनीति प्रयासों से सुलझा किया गया। भारत और चीन के बीच इस बात पर पहले से ही सहमति है कि दोनों पडोसी अपने मतभेदों को किसी भी सूरत में तनाव मं नहीं बदलने देंगे। डोकलाम विवाद का हल इस बात का प्रमाण है कि सीमा विवाद पर तल्खी के बावजूद एशिया के दोनों ताकतवर देश द्धिपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। इस साल जून में अस्ताना में जिनपिंग और मोदी के बीच हुई बातचीत में इस बात पर सहमति बनी थी कि भारत और चीन के बीच मतभेद हो सकते हैं मगर दोनों इसे तनाव का रुप नहीं लेने देंगे। मंगलवार को शियामेन में भी जिनपिंग और मोदी के बीच फिर से इस बात पर सहमति बनी। भारत और चीन इस जमीनी सच्चाई को जानते हैं कि पडोसी होने के साथ-साथ दोनों के बीच मतभेद होना स्वभाविक है मगर शान्ति के लिए यह लाजिमी है कि मतभेदों को आपसी संवाद और बातचीत से सम्मानजनक तरीके से सुलझा जाए। जिनपिंग-मोदी इस बात पर भी सहमत हैं कि सोहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए सीमा पर शांति बनी रहनी चाहिए और इसके लिए दोनों देशो के बीच लगातार संवाद की जरुरत है। इसे बढाना होगा। भारत और चीन के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को प्रगाढ करने के लिए ब्रिक्स और संयुक्त आर्थिक मंचों पर लगातार बातचीत की जरुरत है। उतर कोरिया और दक्षिण चीन सागर को लेकर व्याप्त मौजूदा तनाव में चीन को भारत के साथ की जरुरत है। चीन-पाकिस्तान की दोस्ती भारत और बीजिंग के बीच संबंधों के आडे नहीं आनी चाहिए।
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