पुरानी कहावत है, न्याय देर से मिले तो वह न्याय नहीं (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड)। भारत में न्याय प्रकिया इतनी जटिल और समय खपाऊ वाली है कि न्याय मिलने तक वादी की सारी उम्मीदें ही मर जाती हैं। 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट मामले में 24 साल बाद टाडा अदालत का दूसरा फैसला आया है। अदालत ने 257 निर्दोश लोगों के संहार के प्रमुख आरोपी अबु सलेम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दो दोशियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। मामले के प्रमुख साजिषकर्ता दाउद इब्राहिम, छोटा षकील और टाइगर मेमन समेत 33 आरोपी अभी भी फरार हैं। इसी मामले में टाइगर मेमन के भाई याकूब मेमन को 30 जुलाई, 2015 को फांसी दी गई थी। टाडा की अदालत ने याकूब मेमन को मुंबई बम ब्लास्ट के प्रमुख साजिषकर्ताओं को धन और हथियार मुहैया कराने का दोशी पाया था और उसे फांसी की सजा सुनाई थी। अबु सलेम चालाक निकला और कानून की जद से बचने के नरसंहार को अंजाम देने के बाद अपनी गर्लफ्रेंड के साथ विदेष भाग गया था। दाउद इब्राहिम के दाहिने हाथ छोटा षकील को अबु सलेम का मेंटर माना जाता है। भारत से विदेष भगाने के लिए भी छोटा षकील ने ही अबु सलेम की मदद की थी। माफिया सरगना छोटा षकील इतना धूर्त और काइंया है कि उसी ने अपने जानी दुष्मन छोटा राजन को पुलिस से इंडोनेषिया में पकडवाया था। मगर पुलिस आज तक उसे पकड नहीं पाई है। भारत सरकार को पुर्तगाल से भगौडे अबु सलेम का प्रत्यर्पण करने के लिए भी खासी मषक्कत करनी पडी थी। 2006 में अबु सलेम का प्रत्यर्पण करने के लिए भारत को पुर्तगाल को इस बात का आष्वासन देना पडा था कि उसे फांसी नहीं दी जाएगी। पुर्तगाल दुनिया के उन देषों में षुमार है जहां फांसी की सजा अमानवीय मानी जाती है और इस पर प्रतिबंध है। टाडा अदालत ने सरकार की इस अंडरटेकिंग का सम्मान रखा है हालांकि पुर्तगाल के सुप्रीम कोर्ट ने अबु सलेम की करार तोडने की अर्जी पर व्यवस्था दी थी कि भारत क्योंकि संप्रभु राश्ट्र है, इसलिए उसके कानून में दखल नहीं दिया जा सकता। अबु सलेम को प्रदीप जैन हत्याकांड में भी आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। आजीवन कारावास याफ्ता मुजरिम को जीवन के अंत (मृत्यु) तक कारावास में ही रहना पडता है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही व्यवस्था दे चुका है कि आजीवन कारावास की स्थिति में मुजरिम को जिंदा रहने तक जेल में ही रहना पडेगा। भारत की न्याय प्रकिया के अनुसार अबु सलेम और अन्य दोशी सजा के खिलाफ पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं। इस स्थिति में यह मामला और लंबा खींच सकता है। 257 लोगों के हत्यारों की सजा का मामला जितना लंबा चलेगा, नर संहार से पीडित परिवारों के जख्म उतने ही हरे होते जाएंगे। लंबी अदालती सुनवाई और मीडिया की सुर्खियां प्रभावित परिवारों को अपने प्रियजनों के खोने का दुख भुलाए नहीं भूलने देती और उन्हें चैन की नींद सोने नहीं देती। और अगर समय पर न्याय नहीं मिले तो जख्म नासूर बन जाते हैं। बहरहाल, 26/11 मुंबई नर संहार के पाकिस्तानी साजिषकर्ताओं को पकडना तो दीगर रहा, पुलिस आज तक 1993 में श्रृंखलाबद्ध 13 बम विस्फोट करवाने वाले दाउद इब्राहिम एंड कंपनी को पकड नहीं पाई है। इन्हें भी छोडिए, भारत सरकार आज तक टी सीरीज के मालिक गुलषन कुमार के प्रमुख ह्त्यारों को आज तक नहीं पकड पाई है। सरकार आईपीएल स्कैम के आरोपी ललित मोदी और बैकों के नौ ह्जार करोड रु से ज्यादा का कर्जा डकार गए विजय माल्या तक को भी पकड नहीं पाई है। यह कैसा कानून है कि अपराध करके विदेष भाग जाओं ओर मजे करो और अगर पकडे भी गए तो कडे दंड से बच जाओ़। इस तरह की कानूनी खामियों से अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं।
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