मंगलवार, 19 सितंबर 2017

बांधों का अर्थषास्त्र

पर्यावरण  प्रेमियों के मुखर विरोध और तकनीकी अडचनों के बावजूद अततः सरदार सरोवर परियोजना ने मूर्त  रुप ले ही लिया। रविवार को सरदार सरोवर बांध का लोकार्पण कर  प्रधानमंत्री ने  गुजरात को  पानी की बडी सौगात दी है। 1946 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सूखाग्रस्त दक्षिण गुजरात को  निश्चित  सिंचाई सुविधा मुहैया कराने के लिए नर्मदा नदी पर  बांध की परिकल्पना की थी। 5 अप्रैल, 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने इस बांध की आधारशिला रखी थी। 1979 में इस परियोजना पर काम  शुरु हुआ और 17 अप्रैल, 2017 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस परियोजना का लोकार्पण करके नेहरु-पटेल के सपने को साकार किया है। मूलतः गुजरात के नयागांव में नर्मदा नदी पर  सरदार सरोवर ग्रेवटी बांध बनाया गया है। नर्मदा नदी पर कुल मिलाकर तीस बांध बनने हैं और सरदार सरोवर इनमें सबसे बडा है। गुजरात के अलावा मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र  और राजस्थान भी इस परियोजना से बिजली और पानी से लाभान्वित हो रहे हैं। पिछले सात दशक से ज्यादा समय में सरदार सरोवर बांध परियोजना की राह में तरह-तरह के अवरोधक खडे किए गए। प्रधानमंत्री ने रविवार को इन अवरोधकों का उल्लेख भी किया। उन्होंने यह कहकर इस बांध के विरोधियों पर तंज भी कसा,“ मेरे पास उन सब का कच्चा चिठ्ठा है, जो आज तक इस परियोजना के खिलाफ साजिश रच रहे थे“। नर्मदा परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे विवादस्पद परियोजना रही है। तकनीकी और कानूनी पेचदगियों के कारण यह परियोजना लंबे समय तक लटकी रही।   सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई को लेकर लंबी अदालती लडाई लडी गई। अततः,   2014 को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण़ (नर्मदा कंट्रोल ऑथॉरिटी) ने बांध की ऊंचाई
121.92 मीटर (400 फीट) से बढाकर 138.68 (455 फीट) और फिर 17 जून 2017 को बांध की ऊंचाई इसकी पूरी क्षमता तक बढा दी। इस परियोजना से गुजरात के सूखागग्रस्त कच्छा और सौराष्ट्र  की 18,000 वर्ग  किलोमीटर से ज्यादा की खेती को  निश्चित  सिंचाई की सुविधा मुहैया होगी। तथापि, इस परियोजना के आलोचकों का कहना है कि इस परियोजना की लागत की तुलना में उतना फायदा नहीं हो रहा है, जितना होना चाहिए था। अब तक इस परियोजना पर अनुमानन पचास हजार करोड रु के करीब खर्चा हो चुका है और इतना ही पैसा अभी इसे पूरा करने में और लगेगा। इस परियोजना से जिन सूखाग्रस्त क्षेत्रों को पानी मिलना चाहिए था, उन्हें  मिला ही नहीं। जिन इलाकों को सिंचाई की सुविधा मिल रही है, वहां पहले से ही माकूल पानी है। इस परियोजना से 50,000 से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं। लगभग दस हजार मछुआरों की आजीविका चली गई है। परियोजना के लागत-लाभ (कॉस्ट-बेनेफिट्स) के आकलन बाद ही सबसे पहले जापान ने सरदार सरोवर बांध से अपने हाथ खींच लिए थे। जापान को जैसे ही पता चला कि परियोजना से पचास हजार से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं, वह इसे वित्तीय मदद देने से पीछे  हट गया।  1992 में  वर्ल्ड  बैंक के आकलन में भी यही पाया गया था कि इस परियोजना से नुकसान अधिक, फायदे कम हो रहे हैं। इसलिए वर्ल्ड  बैंक ने भी नर्मदा परियोजना पर निवेश  करने से मना कर दिया। 1993-94 में केन्द्र सरकार ने भी इस परियोजना का स्वतंत्र आकलन करवाया था। तब भी यही पाया गया था कि इस परियोजना पर जितना निवेश  किया जा रहा है, उसकी तुलना में बहुत कम परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। इस आकलन में भी परियोजना को विफल बताया गया था। परियोजना से कच्छ और सौराष्ट्र  को उतना फायदा नहीं हो रहा है, जितना बताया जा रहा है। नर्मदा नदी करीब-करीब खत्म हो गई है। काफी विस्थापित परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। देश  का सबसे बडा दुर्भाग्य यही है कि अधिकतर मामलों में समग्र जनहित अथवा  राष्ट्रहित  की बजाए राजनीतिक  हित ज्यादा मायने रखते हैं।