एक और निर्भीक आवाज को दबा दिया गया। कन्नड भाषा की अग्रणी लेखक एव “लंकेश ” पत्रिका की संपादक गौरी लंकेश की मंगलवार को उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गई। गौरी की हत्या समृद्ध भारतीय भाषा और बेबाकी की ह्त्या है। इससे भाषा और गरीब हो गई है। समकालीन समाज एक और साहसी और निर्भीक आवाज को सुरक्षित नहीं रख पाया। गौरी की नृशंस हत्या पर किसी ने सटीक प्रतिक्रिया व्यक्त की है, “एक और सनसनीखेज हत्या। सनसनी अब इन हत्याओं से नहीं होती है क्योंकि हम इन हत्याओं का इंतजार कर रहे होते हैं“। गौरी का तो हर दिन ही सनसनी होता था । “ मौत जो कत्ल की श क्ल में आई एक लंबी प्रतीक्षा थी। आश्चर्य इस बात का है कि वे अब तक कैसे बच रही?“? इस बात पर वाकई ही हैरानी होती है है कि समकालीन असहिष्णुता के माहौल में निर्भीक और सच्ची आवाजें कैसे खुद को सुरक्षित रख पा रहे हैं। कन्नड भाषा के पारखी एम एम कलबुर्गी की निर्मम ह्त्या के बाद से ही गौरी लंकेश का अब तक बचे रहना ही बडी बात है। 30 अगस्त, 2015 को कर्नाटक राज्य के धारवाड जिले में अग्रणी लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद से नरेन्द्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे की जमात के लोगों का सुरक्षित रहना वाकई हैरानी की बात है। इस पर किसी ने प्रतिक्रिया की है कि इससे हर वह लेखक खुद से सवाल कर रहा होगा,“क्या मेरी लेखनी का कोई असर नही“ं़? यह तल्ख प्रतिक्रिया देश में व्याप्त मौजूदा माहौल को बया करती है। गौरी लंकेश की नहीं अलबता अभिव्यक्ति, असमहमति और रचनात्मक आलोचना की हत्या हुई है। हर पत्रकार और लेखक की हत्या से देश , समाज और भाषा गरीब हो जाती है। गौरी लंबे समय से कन्नड भाषा के पाठकों को सचेत कर रही थी कि कर्नाटक भी दूसरा गुजरात बनने की राह पर है। गौरी यह भी कर रही थी भारतीय समाज को अन्याय और ह्त्याओं की आदत सी पड गई है। उसकी आत्मा ही बीमार हो गई हैं। धर्म और समाज के ठेकेदारों को यह सब रास नहीं आ रहा था। सच यह है कि धर्म के ठेकेदारो को तो प्रगतिशील विचारधारा और सकारात्मक आलोचना कभी रास नहीं आई है। गौरी अल्पसंख्यकों, रोहिंग्या मुसलमानों और नक्सली कहे जाने वाले आम आदमी की आवाज बलुंद कर रही थी। वे इन सभी को इज्जत की जिंदगी की पक्षधर थी। गौरी उस व्यक्ति की पैरवी कर रही थी, जिसके खून का प्यासा हर “ राष्ट्रवादी “ है। अपने बारे नकारात्मक न सुनने का आदी “राष्ट्रवादी “ अगर “निर्भीक“ आवाज को गोली से मारे डाले, इसमें आश्चर्य की क्या बात है? एक-न-एक दिन यह तो होना ही था। कलबुर्गी के साथ भी यही हुआ और दाभोलकर और पानसरे के साथ भी। सत्ता के मठाधीशों को इस तरह की निर्भीक आवाज न तो समझ में आती हे और न ही भाती है। गौरी को लगातार धमकियां मिल रही थी मगर लेखक और अभिव्यक्ति का प्रतीक पत्रकार भला धमकियों से कहां डरता है। गौरी जैसे=जैसे निर्भीक आवाज को बुलंद करती गईं, राश्ट्रवादियों का हाथ जेब में रखी पिस्तौल पर बरबस चला जाता। अतंतः, मंगलवार को गोली पिस्तौल बाहर निकल ही गई। गौरी अगर “विकास पुरुष “, जलवायु परिवर्तन अथवा नोटबंदी के पक्ष में लिखती तो कुछ दिन और जी सकती थी। उन्हें खुद अपना ख्याल रखना चाहिए था मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और सच्चाई के उस रास्ते को चुना जिस के हर कदम पर मौत का सामना होता है। गौरी अपने पीछे एक बहुत बडा शून्य छोड गई हैं। उनकी ह्त्या पर देश भर में आक्रोश जाहिर करना, न्यूज चैन्ल्स और मीडिया में चर्चा करना उनके प्रति सच्ची श्रदांजलि नही है। इन सब में कोई न कोई स्वार्थ नजर आ रहा है। अगर गौरी को सच्ची श्रदांजलि देनी ही है तो उनके अधूरे काम को पूरा करें और निर्भीक और स्वतंत्र आवाज को बुलंद करें।
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