मोदी सरकार की नोट्बंदी से आखिर देश को क्या मिला? नोटबंदी पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल नवंबर में बंद किए गए पांच सौ और एक हजार के 99 फीसदी नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 15.44 लाख करोड मेंसे 15.28 लाख करोड रुपए बैंकों के पास जमा किए जा चुके हैं। मात्र 16,000 करोड रु वापस नहीं आए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 1000 रु के 8.9 करोड रु वापस नहीं लौटे हैं। इन आंकडों से यह निष्कर्ष निकलता है कि काले धन को बाहर निकालने का नोटबंदी का मूल मकसद पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सका है। 15.44 लाख करोड रु मेंसे जो 16,000 करोड वापस नहीं किए गए, उसे काला धन माना जा सकता है। सरकार ने वीरवार को सफाई दी कि नोटबंदी के बाद 10 लाख लोगों ने जो 2.89 लाख करोड रु जमा किए हैं, उसकी जांच की जा रही है। इन आंकडों के बलबूते सरकार यह जताने का प्रयास कर रही है कि 10 लाख लोगों द्वारा जमा लिए गए 2.89 लाख करोड रु काला धन हो सकता है। आरबीआई की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि नोटबंदी “खोदा पहाड, निकली चुहिया“ साबित हुई है। आरबीआई और एसबीआई (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) रिसर्च रिपोर्ट का ही आकलन है कि नोटबंदी से आरबीआई और सरकार को जबरदस्त नुकसान हुआ है। आरबीआई को दो हजार और पांच सौ के नए नोट छापने के लिए ही 8000 करोड रु खर्च करने पडे हैं। एसबीबी के अनुसार आरबीआई को सीजनोरेज (मुद्रा स्फीति कर) का भी खासा नुकसान उठाना पडा है। सरकार भले ही कहे कि 15.44 लाख करोड रु बाहर निकालने के लिए 8000 करोड रु बहुत बडी लागत नहीं है, पर सवाल यह है कि अगर इन नोटों को सिस्टम में वापस ही लाना था, फिर नोटबंदी का क्या फायदा? और उस नुकसान का क्या जो नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को उठाना पडा। आम आदमी को अपना ही पैसा बैंकों से निकालने के लिए सात सप्ताह से ज्यादा समय तक दिन भर कतार में खडे रहने पडा। इस दौरान 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। लगभग तीन महीने तक छोटे-बडे कारोबार बंद पडे रहे। नोटबंदी के तुरंत बाद नवंबर-दिसंबर में एफएमसीजी (फॉस्ट मूविंग कंज्युमर गुडस) की ग्रोथ में 1 से 1.5 फीसदी की गिरावट आई । अमूमन, इस सेक्टर की ग्रोथ को सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। पिछले साल दिसंबर में सबसे बडे दो-पहिया वाहन उत्पादक हीरो मोटरकॉर्प का उत्पादन एक तिहाई ही रह गया था। परचेजिंग मैनेजर सर्वे के मुताबिक मैन्युफेक्चरिंग उत्पादन में अप्रत्याशित गिरावट देखी गई । कंपनियों का इन्वेस्टमेंट प्रपोजल 2.4 खरब रु से गिरकर 1,25 खरब ही रह गया । इससे कॉर्पोरेट क्रेडिट ग्रोथ 30 साल के न्यूनतम स्तर पर था। नतीजतन, जनवरी-मार्च 2017 तिमाही में भारत की विकास दर 6.1 फीसदी ही रह गई थी जबकि एक साल पहले इसी तिमाही में यह 7.1 फीसदी थी। इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में विकास दर 5.7 फीसदी ही रह गई थी जबकि एक साल पहले इसी तिमाही में यह 7.9 फीसदी थी। विकास दर में यह अप्रत्याशित गिरावट नोटबंदी के कारण आई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी का आकलन था कि 50 दिन की नोटबंदी से देश को 1.28 लाख करोड रु और कंपनियों को 61500 करोड रु का नुकसान हुआ है। मगर सियासतदानों को क्या फर्क पडता है। नोटबंदी से सौ से ज्यादा लोग मारे गए, तो क्या हुआ! जिस देश में सर्पदंश से हर साल 4,000 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं, खसरे से हर दूसरे सेंकेड एक बच्चे की मौत हो जाती है, दिमागी बुखार से हर साल साठ हजार से ज्यादा बच्चे कालग्रस्त हो जाते हैं, हर सेकेंड एक बालक भूख से बिलख-बिलख कर मर जाता है, वहंा नोटबंदी से चंद लोग मारे जाएं तो क्या हुआ। धन्य है सरकार !
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