अमेरिका दुनिया को अपनी दादागिरी दिखाने का कोई मौका नहीं छोडता है। और जब से डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, दुनिया को डराने-धमकाने का सिलसिला और तेज हो गया है। पेरिस जलवायु करार से हाथ खींचकर अमेरिकी ने फिर अपनी दादागिरी दिखाई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पेरिस जलवायु करार से यह कहकर पीछे हट गए हैं कि इससे चीन और भारत जैसे तेजी से बढते देशों को ज्यादा फायदा होगा और अमेरिका के हाथ कुछ नहं लगेगा। दिसंबर 2015 में अमेरिका, चीन, भारत समेत दुनिया के 195 मुल्कों ने धरती पर बढते तापमान को रोकने के लिए मिल-जुल कर हर संभव प्रयास करने का संकल्प लिया था। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि अत्याधिक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के कारण धरती का तापमान निरंतर बढ रहा है और अगर इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो सूखे, बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाओं और अप्रत्याशित जलवायु परिवर्तन से धरती पर तबाही मच सकती है। इससे सी लेवल (समुद्री लहरें) भी अप्रत्साहित रुप से बढ सकता है और यह भयंकर तबाही मचा सकता है। इसी से चिंतित दुनिया के हर छोटे-बडे मुल्क ने पेरिस में धरती को बचाने का संकल्प लिया था। पेरिस जलवायु करार पर विभिन्न देशों में सहमति बनाने के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अहम भूमिका निभाई थी। मगर अब अमेरिका के इस करार से पीछे हटने से निर्धारित लक्ष्यों को हासिल कर पाना काफी मुश्किल हो जाएगा। वैश्विक तापमान में वृद्धि को दो फीसदी से नीचे रखना पेरिस जलवायु करार का प्रनुख लक्ष्य है और इसे दुनिया के सभी देश मिलकर ही हासिल कर सकते हैं। कार्बन उत्सर्जन में अकेले अमेरिका का 15 फीसदी योगदान है। बढते तापमान को रोकने के लिए अमेरिका विकासशील देशों को वित्तीय एवं तकनीकी मदद मुहैया कराने वाला सबसे प्रमुख स्त्रोत भी है। सुखद स्थिति यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प के पीछे हट जाने के बावजूद अमेरिका का कॉपरेट जगत अभी भी पेरिस जलवायु समझौते के साथ मजबूती से खडा है। गूगल, एपल और एक्षन मोबिल जैसी सैंकडों बडी कंपनियों ने ट्रंप से आग्रह किया है कि वे पेरिस जलवायु समझौते के साथ बने रहे। बहरहाल, ट्रंप की “वायदाखिलाफी“ के बावजूद अमेरिका में कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी आ सकती है। 2015 में पेरिस जलवायु करार के बाद से अमेरिका में कोयले की बजाए गैस से उर्जा का उत्पादन हो रहा है। कोयले को कार्बन उत्सर्जन का सबसे बडा कारण माना जाता है। ब्रिटेन 2025 तक कोयले से उर्जा उत्पादन पूरी तरह से बंद कर देगा। पेरिस जलवायु करार के तहत भारत को भी कोयले पर आश्रित उर्जा उत्पादन को कम करना होगा। भारत इस करार के तहत अपनी 40 फीसदी उर्जा उत्पादन नवीनीकरण उर्जा (रेन्युएबल एनर्जी) के तहत लाने को प्रतिबद्ध है। बहरहाल, अमेरिका का पेरिस जलवातु करार से बैक आउट कर जाना वैश्विक जलवायु प्रयासों के लिए तगडा झटका है। इस करार की शर्तों के अनुसार अमेरिका नवबंर, 2020 से पहले पीछे नहीं हट सकता। नवबंर, 2020 में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने है। दुनिया के लिए यह राहत की बात है। ट्रंप इस बात पर अडे हुए है कि पेरिस जलवायु करार उनके “ अमेरिका फर्स्ट“ दर्शन के एकदम खिलाफ है और इस करार के लागू किए जाने से बेरोजगारी बढ सकती है। दुनिया में केवल सीरिया और निकारागुआ एकमात्र ऐसे देश हैं जो पेरिस जलवायु करार से बाहर हैं और अब अमेरिका इन देशों में शुमार हो जाएगा। अधिकतर अमेरिकी पेरिस जलवायु करार पर राष्ट्रपति ट्रंप के स्टैंड से सहमत नहीं है। अब तक अमेरिका अपने हर वैश्विक उत्तरदायित्व को बखूबी निभाता रहा है। ट्रंप प्रशासन में पहली बार अमेरिका अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटा है। ट्रंप के इस स्टैंड का खामियाजा आने वाली पीढी को भुगतना पड सकता है।
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