सोमवार, 19 जून 2017

वीवीआईपी गरुर

देश  मे सियासी नेताओं पर वीवीआईपी कल्चर का गरुर सिर चढ कर बोल रहा है। सियासी नेता वीवीआईपी रुतबा दिखाने में  न केवल अपनी  शान समझते हैं, अलबत्ता कायदे-कानून को भी सरेआम ठेंगा दिखाते हैं। आंध्र प्रदेश  के तेलगू देशम पार्टी सांसद एक एयरलाइंस पर अपने वीवीआईपी होने की धौंस जमाने के लिए इन दिनों चर्चा  में है। विशाखापटनम  (विज़ाग ) से हैदराबाद की यात्रा के लिए समय पर नहीं पहुंचने के कारण सांसद दिवाकर रेड्डी को आसानी से बोर्डिंग पास नहीं मिला। इस पर उन्होंने एयरपोर्ट पर खूब हंगामा किया। एयरपोर्ट पर ही एक प्रिंटर तोड डाला और एक कर्मचारी को धक्का दिया। हालांकि जैसे-तैसे एयरलाइन ने उन्हें यात्रा करने दी मगर बाद में उन्हें एयरलाइन से यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया। अब तक छह घरेलू एयरलाइंस दिवाकर रेड्डी को  उनकी उडानों से हवाई यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा चुकी है। रेडडी से पहले इस साल अप्रैल में  शिवसेना सांसद रवीन्द्र गायकवाड इस बात की सार्वजनिक  शेघी  बघार  चुके हैं कि उन्होंने सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया के एक कर्मचारी को 25 बार अपनी चप्पलों से पीटा। इस घटना के बाद एयर इंडिया ने उन्हे अपनी फ्लाइटस से सफर करने पर रोक लगा दी थी। बाद में एयर इंडिया द्वारा  इस प्रतिबंध को हटा तो  दिया गया मगर एयरलाइंस के पायलटों मे उन्हें सफर नहीं करने दिया। केन्द्र नागरिक उडडयन मंत्री के हस्तक्षेप के बाद जैसे-तैसे इस मसले को हल किया गया। सांसद ही नही विधायक से लेकर स्थानीय नेता तक अपना रुतबा झाडने का कोई मौका नहीं चूकते। सात जून को मध्य प्रदेश  के मऊ के भाजपा विधायक श्रीराम सोनकर ने अपनी डयूटी निभा रहे ट्रैफिक होम गार्ड को तमाचा जड दिया और उसका मोबाइल तोड दिया। इस  ट्रैफिककर्मी का कसूर यह था कि उसने गलत साइट से चलाई जा रही विधायक की गाडी को रोका और ट्रैफिक नियमों का पालन करने को कहा। वीवीआईपी कल्चर के नशे  में चूर विधायक को यह गवारा नहीं लगा। अप्रैल माह में नशे  में धूत भाजपा विधायक राकेश  राठौर ने टोल प्लाजाकर्मी  की पिटाई कर दी। इसी साल फरवरी में राजस्थान के एक महिला विधायक के पति ने पत्नी की गाडी का चालान काटे जाने पर ट्रैफिक पुलिसकर्मी को तमाचा जड दिया था। मई में उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले के भाजपा विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल द्वारा  आईपीएस महिला अधिकारी से बदसलूकी का मामला समाचार पत्रों की सुर्खियों में थां। इन सब घटनाओं का निचोड़  यह है कि सांसद अथवा विधायक बनते ही नेताओं को वीवीआईपी कल्चर का इतना नशा  हो जाता है कि वे कानून तोडना अपना अधिकार मानने लग जाते हैं़। मऊ के भाजपा विधायक श्रीराम सोनकर इसकी बानगी है। ट्रैफिक नियम तोडने को अपना विधायकी अधिकारी बताते हुए सोनकर सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि बतौर विधायक नियमों को तोडना उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि देश  के सियासी नेता किस मिट्टी के बने हुए हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी तब वीवीआईपी कल्चर में रमे होने के लिए  कांग्रेस को जमकर कोसा करती थी। सत्ता में आते ही भाजपाई वीवीआईपी कल्चर को गले लगाने में कांग्रेसियों से भी आगे निकल गए हैं। और यह सब उस समय हो रहा है जब देश  का सर्वोच्च न्यायालय और प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि असली वीवीआईपी जनता है और आम आदमी से भी वही सलूक किया जाना चाहिए जैसा उसके प्रतिनिधि सांसद अथवा विधायक से किया जाता है। मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने “लाल बत्ती“ का प्रचलन भी बंद कर दिया है। मगर इस देश  में कायदे-कानून का पालन होता ही कहां है? जिस देश  के लॉमेकर्स खुद ही नियमों को धडल्ले से तोडें और फिर इसकी  शेखी बघारना , वहां  आम आदमी से क्या उम्मीद की जा सकती है?