सोमवार, 26 जून 2017

Weak Opposition is not Good For Vibrant Democracy

 मजबूत विपक्ष स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य है मगर दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र भारत में कभी भी विपक्ष सुदृढ नही रहा है। न तो तब जब देष में ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का एकछत्र राज था और  न ही अब जब भगवा पार्टी नीत गठबंधन का षासन है। भारत में छुआछूत कुप्रथा की तरह राजनीतिक दलों को भी  “वैैचारिक छुआछूत“ की बुरी लत है। आजादी के बाद एक जमाने में भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज जनसंघ और अस्सी के बाद भाजपा को अधिकतर राजनीतिक दल  “अछूुत“ मानते थे। खासकर समाजवादी और वामपंथी दक्षिणपंथी भाजपा को लंबे समय तक “संाप्रदायिकता“ के लिए अछूत मानते रहे हैं। इसी सोच के कारण विपक्ष में कभी एकता नहीं बन पाई। नब्बे के दषक के बाद भाजपा के बढते जनाधार के कारण समाजवादियों ने तो समय के साथ-साथ समझौता कर लिया और नीतिष कुमार, जार्ज  फर्डानिन्स जैसे उदार समाजवादी केन्द्र में सत्ता का सुख भोगने के लिए भगवा पार्टी के साथ हो लिए। पर वामपंथी अपनी वैचारिक सोच पर बरकरार हैं और आज भी भगवा पार्टी को “अछूतः मानते हैं और इसका मुखर विरोध करने पर आमादा हैं। भाजपा का विरोध करना कांग्रेस की सामरिक विवषता है। भारत की जीओपी खुद को भाजपा का विकल्प मानती है और इसी खुषफहमी के कारण अपना जनाधार भाजपा को लुटा भी चुकी है। उसके पास भाजपा का विरोध करने के सिवा कोई चारा नहीं है हालंाकि कांग्रेस भी उसी तरह की राजनीति करती रही है जो आज भगवा पार्टी कर रही है। दरअसल, अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए देष की राजनीतिक पार्टियां सत्तारुढ दल का कम एक-दूुसरे का ज्यादा नुकसान करती रही हैं।  दल-बदल, छल-कपट,  और अवसरवादिता भारतीय सियासत का अंतरंग हिस्सा रहा है।  समकालीन सियासत के “अर्जुन“ एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिष कुमार का ताजा पैंतरा इसका ताजा प्रमाण है। राश्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खडा करने की पहल करने वाले नीतिष कुमार ऐन वक्त पर पैंतरा बदल कर विपक्ष को डंप करते हुए भाजपा के साथ हो गए हैं। राजनीतिक बयार किस ओर बह रही है, यह भांपने में नीतिष का जवाब नहीं है। नीतिष कुमार भली-भांति जानते हैं कि विपक्ष लाख कोषिष कर लें, न तो उनमें एकता हो पाएगी और न ही उनका प्रत्याषी राश्ट्रपति चुनाव जीत पाएगा। इस  बार राश्ट्रपति चुनाव का गणित राजग उम्मीदवार के पक्ष में , ठीक 2012 की तरह।   2012 में बयार भाजपा के विरोध में बह रही थी, इसीलिए राजग गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी नीतिष और उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने तब संप्रग उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के पक्ष में वोट डाले। इस बार चुनावी बयार भाजपा के पक्ष में है, इसलिए बिहार में लालू प्रसाद और कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी नीतिष कुमार ने ”उगते सूरज“ को प्राणायाम किया है। सत्ता की यही सबसे बडी खूबी है। बयार के साथ बहना ही समझदारी है। सत्ता पाना भारतीय राजनीतिक दलों का प्रमुख लक्ष्य होता है। सत्ता के माध्यम से देष और जनसेवा करने का संकल्प अब काफी पीछे छूट गया है। इसी सत्ता लोलुपता के कारण लालू प्रसाद एंड सन्स बिहार में नीतिष कुमार से चिपके हुए है जबकि बिहार के मुख्यमंत्री पिछले कुछ समय से भाजपा के काफी करीब जा चुके हैं। लालू भाजपा के घुर विरोधी हैं। राजनीतिक समीकरणों को अपने फायदे के लिए भुनाना सियासत का हिस्सा है मगर इससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है क्योंकि इसमें मजबूत विपक्ष के लिए स्पेस नहीं बच पा रहा है। अवसरवादी विपक्ष के कोई मायने नहीं है। मजबूत विपक्ष नहीं होने से भारत जैसे विषाल और बहु-जातीय समाज में सभी तबकों को माकूल प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। इसी कारण आजादी के सात दषक बाद भी गरीब और अमीर के बीच खाई और चौडी होती जा रही है। भारत की तुलना में अमेरिका और ब्रिटेन का द्धि-पार्टी आधारित लोकतंत्र ज्यादा सफल है।