गुरुवार, 1 जून 2017

धार्मिक स्थल ढहाना “अपराध“

 क्या किसी धार्मिक स्थल को गिराना अपराध है ?, पिछले पचीस साल से देश   न्यायपालिका से इस मामले पर फैसले की प्रतीक्षा कर रहा है। देश  की न्याय प्रकिया इतनी जटिल और समय खपाऊ है कि अनिश्चितकाल  तक चलने वाली सुनवाई के दौरान कई आरोपी तो दुनिया से ही रुखस्त कर जाते हैं। अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद ढहाने के आरोप में फंसे भाजपाई नेताओं को लगभग पच्चीस साल बाद आरोपों का तय होना भारतीय में न्याय प्रकिया की “कछुआ चाल“ का प्रतीक है। इस दौरान आरोपी बाल ठाकरे, गिरिराज किशोर , अषोक सिंघल, मोरेष्वर सावे, महंत अवैद्यनाथ और परमहंस रामचंद्र भगवान को प्यारे हो गए हैं। लगभग अढाई दशक पहले 6 दिसंबर 1992 को  बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए  भगवा संगठनों से जुडे हजारों कार सेवकों ने अयोध्या पर धावा बोला था। तब उत्तर प्रदेश  में भाजपा की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री। राज्य की भगवा सरकार ने अपना “राज धर्म“ नहीं निभाया। इसी बिला  पर तब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार ने चार राज्यों में  सतारूढ भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया था। कल्याण सिंह भी इस मामले मे आरोपी हैं मगर राज्यपाल पद पर आसीन होने के कारण उन पर मुकदमा नहीं चल सकता। दिसंबर,  1992  को दो एफआईआर दर्ज हुई थी। एक एफआईआर बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए अज्ञात कार सेवकों के खिलाफ और दूसरी भडकाउ भाषण देने के लिए आडवाणी, जोशी , उमा भारती और अन्य कई नेताओं के खिलाफ। इनमें  शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे भी  शामिल थे। अक्टूबर, 1993 में सीबीआई ने अदालत में आडवानी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। 2001 में सीबीआई कोर्ट  ने आडवानी, जोशी , उमा भारती और बाल ठाकरे और अन्य आरोपियों को तकनीकी आधार पर आरोप मुक्त कर दिया। तीन साल बाद 2004 सीबीआई ने सीबीआई अदालत के फैसले को हाई कोर्टं में चुनौती दी और  2010 में हाई कोर्ट  ने भी  सीबीआई की अपील खारिज कर दी । 2011 में सीबीआई सुप्रीम कोर्ट  पहुंची और 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट  ने आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत  13 नेताओं पर आपराधिक मामला चलने के आदेश  दिए। सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद ढहाने से जुडे दो अलग-अलग मामलों को भी एक करके, इसकी सुनवाई राय बरेली की बजाए  लखनउ निर्धारित कर दी । सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को दो साल में पूरी करने और सुनवाई करने वाले जज की तब तक ट्रांसफर न करने के भी आदेश  दे रखे हैं। मामले की सुनवाई  19 अप्रैल के चार सप्ताह के भीतर  शुरु करने के आदेश  भी दिए गए थे। और अब करीब 25 साल बाद लखनउ स्थित सीबीआई की विशेष  अदालत ने भाजपा के वयोवृद्ध नेता लाल  कृष्ण  आडवानी, मुरली मनोहर जोशी , सुश्री उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा और विश्व   हिंदू परिषद के  विष्णु  हरि डालमिया समेत 13 नेताओं के खिलाफ आरोप तय किए हैं। न्यायपालिका को व्यवस्था देनी है कि किसी धार्मिक ढांचे को इस बिला पर नहीं गिराया जा सकता है कि वहा पहले कुछ और था। अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाने जाने की दुखद घटना देश  को आज भी साल रही है। किसी भी सभ्य समाज में असभ्याचार के लिए कोई जगह नहीं है मगर भगवा संगठन आज भी यह मानने को तैयार नही है। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना और 1984 के सिख विरोधी दंगे देश  की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक छवि पर ऐसे बदनुमा दाग हैं जिन्हें मिटाया जाना आसान नहीं है। माना धार्मिक उन्माद को नियंत्रित नहीं किया जा सकता मगर कानून-व्यवस्था को तोड कर किसी की आस्था पर प्रहार करने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। यह जिम्मेवारी सरकार और प्रशासन की है। अगर मंदिर तोडना आस्था पर चोट है तो मस्जिद ढहाना क्यों नहीं?  कानून सब के लिए बराबर है और इसे अपना काम बखूबी करना चाहिए।