गुरुवार, 22 जून 2017

भाजपा का मास्टर स्ट्रोक

बिहार के राज्यपाल राम नाथ कोविंद को अपना  राष्ट्रपति  उम्मीदवार चुनकर भाजपा नीत राजग ने विपक्ष दलों की कथित एकता को  छिन्न-भिन्न कर दिया है।  कोविंद दलित समुदाय से हैं।  राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष दलों को भी अब मजबूरन दलित उम्मीदवार ही उतारना पडेगा।  बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने स्पष्ट  कह दिया  है कि उनकी पार्टी  दलित उम्मीदवार का ही समर्थन करेगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश  कुमार भी कोविंद के समर्थक बताए जा रहे है़ं। नीतिश  इन दिनों विपक्ष की अपेक्षा भाजपा के ज्यादा करीब है। कोविंद को लेकर नीतिश  और सहयोगी पार्टी राजद प्रमुख लालू यादव के बीच गंभीर मदभेद हैं। बहरहाल, कोविंद  अगर चुन  लिए जाते हैं, तो आजादी के बाद वे दूसरे दलित राष्ट्रपति होंगे और देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  से पहली बार देश  का प्रथम नागरिक चुना जाएगा।  इससे पहले 1997 में दलित समुदाय से संबंधित के आर  नारायणन (कोच्चेरील रामन नारायणन) देश  के दसवें राष्ट्रपति चुने गए थे। राम नाथ  कोविंद 1991 से भारतीय जनता पार्टी में हैं और  लगातार 12 साल तक राज्यसभा सदस्य रहे हैं। कोविंद भाजपा दलित मोर्चा के राष्ट्रीय   अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 8 अगस्त 2015 को उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। देश  में पिछले कुछ समय से अगडों और पिछडों में तनाव बढा है। भाजपा  शासित राज्यों में कुछ ज्यादा ही। गो-रक्षा की आड में दलितों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। मई में उत्तर प्रदेश  के सहारनपुर जिले के एक गांव में दलितों और ठाकुरों में जमकर जातीय टकराव हुआ। राज्य मे योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आते ही ठाकुरों का दबदबा बढ गया है और दलितों से टकराव भी बढा है । योगी आदित्यनाथ खुद  ठाकुर है। कहा जाता है जब सुश्री मायावती सत्ता में थी,  ठाकुर दलितों से दबे-दबे रहते थे। समाजवादी पार्टी के राज में भी जातीय टकराव दबा रहा। मगर भाजपा सरकार के आते ही पूरे राज्य में जातीय तनाव बढा है। पूरे देश  में दलितों की यही सही शिकायत है कि आजादी के बाद से अब तक सात दशकों में भी  देश  के दलित  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जुड नहीं पाए हैं हालांकि समकालीन केन्द्र और राज्य सरकारें दलितों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों के दाखिले में आरक्षण समेत तरह-तरह की सुविधाएं दे रही है। इसके वावजूद दलितों का अपेक्षित सामाजिक उत्थान नहीं हो पाया है। देहातों में छुआछूत और ऊंच-नीच वाली सोच  अभी भी बरकरार है। दलितों को कुंओं से पानी भरने तक से रोका जाता है। मंदिरों में भी उन्हे आसानी से प्रवेश  नहीं दिया जाता। दलित महिलाओं की अस्मत सरेआम लूटी जाती है।  यह हमारी सामाजिक व्यवस्था की सबसे बडी विफलता है। दलितों को मुख्यधारा से जोडने और उनसे हो रहे अन्याय को रोकने का पूरा उत्तरदायित्व सरकार पर है। इन सब बातों को सामने रखते हुए प्रधानमंत्री ने दलित को राजग का राष्ट्रपति  उम्मीदवार बनाया है। भाजपा को लगता है के देश  का प्रथम नागरिक दलित समुदाय से होगा तो दलितों में सरकार के प्रति भरोसा बढेगा। दो साल बाद लोकसभा चुनाव होने हैं।  विपक्ष ने अभी अपना उम्मीदवार तय नहीं किया है। वीरवार को विपक्ष दलों की प्रस्तावित बैठक में उम्मीदवार तह हो सकता है। तथापि,  सत्ताधारी दल के उम्मीदवार का चुना जाना तय माना जा रहा है।  जीत के लिए राजग उम्मीदवार को  5,49, 452 वोटों की दरकार है जबकि राजग को बीजू जनता दल, नीतिश  कुमार की पार्टी जनता दल (यू) समेत राष्ट्रपति को चुनने वाले कुल 10,98,903 वोटों मेंसे 6,09, 433 का समर्थन  है। इसके अलावा एआईएडीएमके के 58,224 और  शिवसेना के  25, 893 वोट भी राजग उम्मीदवार के पक्ष में जा सकते है़। मुलायम सिंह यादव भी राजग को समर्थन का ऐलान कर चुके है। राजग की तुलना में विपक्ष के पास बमुश्किल  3,81, 295 वोटस हैं। इस स्थिति में विपक्ष के उम्मीदवार के चुने जाने की कोई सभावना नजर नहीं आ  रही है।