शुक्रवार, 30 जून 2017

चीन को मिर्ची क्यों लगी?

अमेरिकी  राष्ट्रपति  और भारतीय प्रधानमंत्री की मुलाकात हमेशा  पूरी दुनिया  मेँ चर्चा का विषय रही है, वह चाहे ओबामा-मोदी का गर्मजोशी  से हाथ मिलाना हो या मौजूदा राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप का प्रधानमंत्री मोदी से गले मिलना। इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति  ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी इतनी आत्मीयता से गले मिले कि चीन को इस पर खासी मिर्ची लग गई। अमेरिका के एक अग्रणी अखबार ने टिप्पणी की है कि दोनों नेताओं की यह आत्मीयता चीन के राष्ट्रपति  शी जिनपिंग को दिखाने के लिए थी। इतना ही नहीं ट्रंप-मोदी मुलाकात से ठीक पहले अमेरिका ने भारत को 22 ड्रोन बेचने की डील को भी हाथों-हाथ मंजूरी दे दी।  हिंद महासागर में चीनी नौसेना की जासूसी के लिए  इन ड्रोन का इस्तेमाल किया जा सकता है।  अमेरिका चीन से इस बात से खफा है कि चीन उत्तरी कोरिया को बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढाने से रोकने में विफल रहा है। भारत को चीन से कई गिले-शिकवे हैं। सिद्धांत की दुहाई देकर चीन भारत की न्यूक्लियर सप्लाई गु्रप में एंट्री को रोकने की हरचंद कोशिश  कर रहा है।  आतंकी संगठन जैश  के मुखिया मसूद अजहर और  हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन को संयुक्त राष्ट्र  संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय  आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव पर चीन हमेशा  अडंगा अडाता रहा है। 2014 से अब तक भारत छह से भी ज्यादा बार संयुक्त राष्ट्र  संघ में मसूद अजहर और  सैयद सलाहद्दीन को आतंकी घोषित कराने का प्रस्ताव पेश  कर चुका है पर चीन हर बार इसे रुकवाने में सफल रहा है। चीन अपनी वीटो पावर का बेजा इस्तेमाल कर भारत को नीचा दिखाने पर आमादा है।  सैयद सलाहद्दीन  को अमेरिका द्वारा  अंतरराष्ट्रीय  आतंकी घोषित किया जाना और 22 ड्रोन खरीद डील प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिकी यात्रा की सबसे बडी उपलब्धि है। मोदी-ट्रंप की ताजा मुलाकात से चीन बौखला गया है। मंगलवार को चीन ने स्थानीय मीडिया के माध्यम से भारत को चेताया भी है कि  अमेरिका के साथ मिलकर चीन को घेरने की कोशिश भारत को भारी पड सकती है। चीन ने भारत से सीमा विवाद को भी उछाला है। मंगलवार को चीन ने नाथुला पास से सेना हटाने को कहा है। इसके एक दिन पहले चीनी सैनिक सिक्किम में भारतीय सीमा में घुसपैठ भी कर चुका है। बहरहाल, हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया  सैयद सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय  आतंकी करार दिए जाने का सीधा असर कश्मीर  के मौजूदा हालात पर पड सकता है।  हिजबुल मुजाहिदीन को  कश्मीरियों  का सशस्त्र आतंकी संगठन माना जाता है और इसकी स्थानीय लोगों, खाासकर युवाओं पर पकड भी है। इस आतंकी संगठन का कश्मीर  की आजादी के अलावा कोई  वैश्विक  एजेंडा भी नहीं है।   हिजबुल अब तक संयुक्त  राष्ट्र  संघ के प्रस्ताव अनुसार जनमत संग्रह का पक्षधर रहा है।  सलाहुद्दीन  ने अल कायदा और इस्लामिक स्टेट (आईएस) दोनों से दूरी बनाए रखी है। इतना ही नहीं  सलाहुद्दीन ने  कश्मीरी  युवाओं से आईएस से दूरी बनाए रखने की अपील भी की थी जिस पर हिजबुल के कुछ स्थानीय कमांडर  सलाहुद्दीन  से खफा हो गए थे। इन सब बातों के मद्देनजर   सलाहुद्दीन को अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय  आतंकी घोषित किए जाने से स्थानीय चरमपंथियों में उनकी पकड ढीली पड सकती है। जाकिर मूसा जैसे चरमपंथी पहले ही सलाहुद्दीन का विरोध कर रहे हैं। पाकिस्तान को भी अब  सलाहुद्दीन को खुला समर्थन देना  मुश्किल  हो जाएगा।  सलाहुद्दीन अभी  पाकिस्तान अधिकृत  कश्मीर  से ऑपरेट कर रहा है। भारत को अब आतकियों के खिलाफ अंतरंराष्ट्रीय  समर्थन भी मिल सकता है।   अमेरिका के इस कदम के बाद भारत अब सलाहुद्दीन के खिलाफ सर्जिक्ल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई भी कर सकता है।  हुर्रियत कॉन्फ्रेस के नेताओं को भी फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।   हुर्रियत नेता सार्वजनिक तौर पर तो  कश्मीर  समस्या के  शांतिपूर्ण  हल की बातें करते है मगर अंदरखाते आतंकियों की भरपूर मदद करते हैं।  हुर्रियत नेताओं को अंतरराष्ट्रीय  आतंकी सलाहुद्दीन पर अब और ज्यादा सतर्क रवैया अपनाना पडेगा।