देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। फिलहाल, इतना तय है कि राष्ट्रपति वही बनेगा जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी बनाना चाहेगी। जिस पार्टी अथवा गठबंधन के पास ज्यादा वोट होते हैं, उसी का उम्मीदवार चुना जाता है। राष्ट्रपति को देश की जनता की तरफ से सांसद और विधायक चुनते हैं। अमूमन, केन्द्र और अधिकतर राज्यों में सतारूढ दल के पास विपक्षी दलों की तुलना में ज्यादा वोट होते हैं। इसलिए सत्तारूढ दल द्वारा प्रायोजित उम्मीदवार ही राष्ट्रपति चुना जाता है। केवल एक बारगी को छोडकर अब तक यही परंपरा रही है। 1969 में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी को निर्दलीय प्रत्याशी वीवी गिरा ने हराया दिया था। पहली बार सतारूढ दल कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव हारा था जबकि तक कांग्रेस के पास 431 सांसदों और 17 मेंसे 12 राज्य विधानसभाओं में भारी बहुमत प्राप्त था। निर्दलीय प्रत्याशी वीवी गिरी तब उप-राष्ट्रपति थे और उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लडा था। दरअसल, यह वह जमाना था जब कांग्रेस में वयोवृद्ध नेताओं (सिंडीकेट) और इंदिरा गांधी की अगुवाई में युवाओं (यंग टकर्स) में जबरदस्त वैचारिक और राजनीतिक टकराच चल रहा था। इसी दौरान बैकों का राष्ट्रीयकरण करके इंदिरा गांधी वामपंथी दलों की “प्रियदर्शनी भी बन गई थी। पहली बार राष्ट्रपति चुनाव में “विवेक अथवा अंर्त्यात्मा की आवाज“ पर वोट का आहवान किया गया था और इस आहवान को करने वाली और कोई नहीं खुद इंदिरा गांधी थीं। नतीजतन, भारी संख्या में कांग्रेस सांसदों और विधायकों ने अधिकृत पार्टी उम्मीदवार की बजाय वीवी गिरी के पक्ष में मतदान किया और वे राष्ट्रपति चुन लिए गए। बहरहाल, इसके बाद फिर से ऐसी नौबत नहीं आई और सत्तारूढ पार्टी उम्मीदवार ही राष्ट्रपति चुना जाता रहा है। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी संप्रग की पसंद हैं। वे लंबे समय से कांग्रेस पार्टी से जुडे रहे हैं। इस बात के दृष्टिगत उनका भाजपा नीति राजग गठबंधन द्वारा फिर से उम्मीदवार बनाने की कोई संभावना नहीं है हालांकि भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने पिछले चुनाव में प्रणब मुखर्जी के पक्ष में वोट डाले थे। उससे पहले प्रतिभा पाटिल को भी शिवसेना ने अपना समर्थन दिया था क्योंकि वे महाराष्ट्र से संबंधित थीं। 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में भी शिवसेना ने राजग के उम्मीदवार एपीजे अब्दुल कलाम को समर्थन नहीं दिया था। शिवसेना के पास 20-25 वोट हैं और इस बार शिवसेना के ये वोट भाजप नीत राजग के लिए बहुत मायने रखते है। भाजपा के उम्मीदवार चयन में राष्ट्रीय स्वंय सेवक भी अहम भूमिका मानी जा रही है। शिवसेना अगर राजग उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करती है, तो भी सत्तारूढ दल के प्रत्याशी को जीत के लिए बाहर से बीस हजार वोटों की जरुरत पडेगी। इसीलिए भाजपा को कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की मिन्नतें करनी पड रही है। भाजपा को अंदर ही अंदर ही इस बात का भी डर है कि प्रधानमंत्री की कार्यशैली से नाराज कुछ सांसद पार्टी से बगावत भी कर सकते हैं। विपक्ष भी इस स्थिति को भुनाने और एकजुट होने की कोशिश कर रहा है। पिछले सप्ताह विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर बैठक भी की। विपक्ष शिवसेना और तमिल नाडु में सत्तारूढ दल एआईएडीएमके के बागियों को भी साथ लेने की कोशिश कर रहा है। वामपंथी दल महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गाँधी को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में है। उनके नाम पर सहमति बन सकती है। बहरहाल, राश्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक के साथ-साथ तीन सेनाओं के कमांडर भी हैं और संसद भी उनके बगैर अधूरी है। उनका चुनाव सर्वसम्मति से ही होना चाहिए। टोकन फाइट की कोई उपयोगिता नहीं है।
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