पर्यावरण से अत्याधिक छेडछाड कर ग्लोबल वार्मिंग की ओर तेजी से बढ रही धरती पर उसके बाशिंदों ने अभी भी कोई सबक नही सीखा है। हर मुकाम पर दुनिया का नेतृत्व करने वाला अमेरिका ही पेरिस क्लाइमेट करार से पीछे हट गया है। चीन और भारत समेत दुनिया के 195 मुल्क हालांकि एक सुर में कह रहे हैं,“ अमेरिका नहीं है तो क्या हुआ“, मगर जमीनी सच्चाई यह है कि अधिकतर मुल्क वित्तीय और तकनीकी मदद के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर आश्रित है। और अमेरिकी मदद के बगैर पेरिस जलवायु करार के लक्ष्यों को पाना आसान नहीं होगा। महाशय ट्रम्प इसी कारण भाव दिखा रहे हैं। बहरहाल, ग्लोबल वार्मिंग का असर पूरी दुनिया मे स्पष्ट दिखाई दे रहा है। मौसम का मिजाज बुरी तरह से बिगड चुका है। सर्दियों में अत्याधिक कडाके की ठंड और लंबे ड्राई जलवायु से जहां यूरोप के लोग परेशान है वहीं अफ्रीका और एशिया भीषण गर्मी का प्रकोप झेल रहा है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका हाड कंपाकंपाते ठंडे मौसम और लंबी सर्दी से जूझ रहा है तो एशिया , अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और खाडी के देश के कई क्षेत्र तापपान में बेताहाशा वृद्धि से लुप्त होने की कगार पर हैं। भारत में तीन माह की भीषण गर्मी का सीजन इस बार आंख-मिचौली खेल रहा है। एक रोज बदन झुलसाने वाला तापमान है तो अगले रोज इसमें अप्रत्याशित गिरावट। बुधवार को समूचे उत्तर भारत को भीषण गर्मी का प्रकोप झेलना पडा और कई जगह अधिकतम तापमान 45 डिग्री से 48 डिग्री रिकार्ड किया गया। वीरवार को तापपान में काफी गिरावट आई और अधिकतर स्थानों पर अधिकतम 40 डिग्री से नीचे लुढ्क गया। दिल्ली, चंडीगढ समेत ज्यादातर शहरों में अधिकतम तापमाान 36 डिग्री के आसपास रहा। उत्तर भारत में मई-जून खासा तपता है और औसतन तापमान 40 डिग्री से अधिक रहता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से तपती गर्मी के सीजन में भी तापमान में खासा उतार-चढाव देखा गया है। इससे मौसमी फसलों और फल-सब्जियों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा खमियाजा पहाडों को भुगतान पड रहा है। गैर मौसमी बारिश , ओलावृष्टि और तूफानी हवाओं ने इस बार हिमाचल के किसानों के नाकों दम कर रखा है। ओलावृष्टि और तूफानी हवाओं ने सेब, आम और आडू-पलम की फसलों को करीब-करीब तबाह कर दिया है। पूरे मई माह में बेमौसमी बारिश , ओलावृष्टि होती रही और तेज हवाएं चलती रहीं। इससे मौसमी सब्जी उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। और यह सब पर्यावरण को असंतुलित करने का नतीजा है। ताजा अमेरिका अनुसंधान में बताया गया है कि भारत में पिछले पचास सालों में तापमान में औसत दशमलव पांच डिग्री वृद्धि के कारण गर्मी का प्रकोप बढा है। इससे गर्म हवाओं (हीट वेव्ज) में 150 फीसदी का इजाफा होने से औसतन सौ लोग कालग्रस्त हो रहे हैं। इस अनुसंधान का यह भी निष्कर्ष है कि इस सदी के अंत तक भारत और अन्य एषियाई देशों में औसत तापमान में 2.2से 5.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। तापमान में अत्याधिक वृद्धि के कारण एशिया उप-महाद्धीप (सब-कॉटिनेंट) मध्य-पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका गर्मियों में वाकई ही रहने लायक ही नहीं रह जाएगा। खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आएगी, पीने के पानी की गंभीर समस्या खडी हो जाएगी और अत्याधिक गर्मी के कारण विकासशील देशों में बीमारियां बढेगी। सबसे ज्यादा असर गरीब पर पडेगा। गरीब के पास न तो शुद्ध पेय जल सुविधा है और न ही गर्मी से बचने के माकूल साधन। मलिन बस्तियों और झोपड-पट्टी में साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था नहीं होने से इन जगहों में गर्मियों में बीमारियां फैलती हैं। मौसम में बदलाव बीमारियों को बढाता है। दुनिया को अगर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बचाना है तो फौरन सतत प्रयास करने होंगे।
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