बेंकों के नौ हजार करोड रु से ज्यादा की रकम डकार कर इंग्लैंड में सर उठाकर ऐश -परस्ती कर रहे शराब कारोबारी विजय माल्या भारतीय कानून को खूब ठेंका दिखा रहे हैं। विदेशी कायदे-कानून की शरण में गए माल्या को मंगलवार को लंदन की एक अदालत से चार दिसंबर तक जमानत मिल गई। यानी अब इस साल माल्या को भारत में प्रत्यर्पण किए जाने की कोई ंसंभावना नही है हालांकि मामले की अगली सुनवाई छह जुलाई को होनी है। भारत में प्रत्यर्पण की कार्रवाई के सिलसिले में माल्या लंदन की अदालत में पेश हुए थे। अदालत के बाहर माल्या ने तंज भी कसा “ करोडों की रिकवरी के सपने देखते रहिए“। बहरहाल, इंग्लैंड हो या यूरोप भारत में संगीन अपराध करके इन देशों में शरण लेने वालों का वापस लाना खासा जटिल काम है। सच कहा जाए तो लगभग नामुमकिन सा है। आज तक भारत सरकार विदशों से मात्र 62 अरोपियों का प्रत्यर्पण कर पाई है और इनमें अधिकांश यूएई से ही प्रत्यर्पित हो पाए हैं़। अभी तक इंग्लैंड से केवल एक आरोपी का प्रत्यर्पण हो पाया है। बैंकों के लगभग 9000 करोड रु के कर्जदार माल्या को भारत लाने के अब तक तमाम प्रयास विफल रहे हैं। 2016 में भारत सरकार ने ब्रितानवी सरकार से विजय माल्या के प्रत्यर्पण का आग्रह किया था मगर इसे इस बिला पर अस्वीकार कर लिया गया था कि सरकार माल्या के खिलाफ पुख्ता चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई। भारत सरकार ने माल्या के खिलाफ बैंकों का कर्जा न लौटाने का चार्ज लगाया था मगर ब्रितानवी कानून के तहत प्रत्यर्पण के लिए यह कोई पुख्ता चार्ज नहीं है। इस साल जनवरी में सीबीआई ने माल्या के खिलाफ लंदन में चार्जशीट पेश की थी और अब मामला अदालत में चल रहा है। इंग्लैंड में प्रत्यर्पण की प्रकिया खासी लंबी है और इसमें कम-से-कम दो साल भी लग सकते हैं। विजय माल्या के खिलाफ भारत की विभिन्न अदालतों ने नौ से भी ज्यादा गैर जमानती वारंट जारी कर रखे हैं। इसके बावजूद भी माल्या को आरोपी साबित करने के लिए सीबीआई को खूब पसीना बहाना पड रहा है। इंग्लैंड के कायदे-कानून का ख्याल करते हुए लगता नहीं है माल्या का प्रत्यर्पण जल्द हो पाएगा। इससे पहले नब्बे के दशक में भारत इंग्लैंड से गुलशन कुमार की हत्या के प्रमुख आरोपी नदीम अख्तर सैफी का प्रत्यर्पण करवाने में न केवल विफल रहा था , अलबता नई दिल्ली को जुर्माना भी भरना पडा था। बहरहाल, कायदे-कानून के कायल ब्रितानवी जनमानस भी शायद ऐसे कानून की ताकीद करेगा जो विदेशी अपराधियों का मददगार हो। भला यह भी कोई कानून हुआ कि कोई बैंकों का करोडों का डकार जाए और उसे सर उठाकर ऐश -परस्ती करने का हक दिया जाए। तथापि, इंग्लैंड तो दीगर रहा, भारत में कानून को तोडना-मरोडना तो और भी आसान है। सालों से देश को बताया जा रहा है कि भारत में मुठ्ठी भर लोग बैंकों का करोडों डकार कर कानून को ठेंगा दिखा रहे है़। ताजा आंकडे बताते हैं कि मात्र 12 बडे कर्जदार बैंकों का दो लाख करोड रु दबा बैठे हैं और अभी तक इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नही की गई है। हैरानी इस बात की है कि आम आदमी अगर चंद हजार रु का कर्ज न लौटाए तो उसकी संपत्ति फौरन नीलामी की जाती है, पर जब रसूखदारों पर बन आती है तो कानून भी आंखें मूंद लेता है। देश जानना चाहता है कि अगर कानून सबके लिए बराबर है तो दो लाख करोड रु दबाने वालों के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नही हुई और बेंकों का कर्जदार होते हुए विजय माल्या विदेश कैसे भाग गए? कानून भले ही रसूखदारों से नरमी दिखाए, जनमानस माल्या को “चोर“ ही मानता है। ओवल में चैंपियन ट्राफी मैच देखने आए दर्शकों ने माल्या को “ चोर चोर“ कहकर खासा जलील किया।
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