संत कबीर ने बहुत पहले कहा था, “ गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष; गुरु बिन लिखे न सत्य, गुरु बिन मिटे न दोश“। संक्षेप में आप चाहे कितने ही प्रतिभाषाली क्यों न हों मगर गुरु के बगैर न तो प्रतिभा तराषी जा सकती है और न ही निखरती है। टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली के दुनिया भर में फैले फैंस चाहेंगे कि वे अपने कोच का सम्मान करें और अपने दंपपूर्ण आचरण को छोड दें। फलदार वृक्ष हमेषा झुकता है। महान खिलाडी की भी यही विषेशता होनी चाहिए। अनिल कुंबले को टीम इंडिया के पद से जिन हालात में इस्तीफा देना पडा, भारतीय क्रिकेट और टीम इंडिया के लिए इन्हें कतई सुखद नही माना जा सकता। क्रिकेट को भी खेल की भावनाओं से खेला जाना चाहिए। मगर यह कैसी खेल भावना है कि अपने कोच को जलील करते रहो और सच सामने आने तक इसे झुठलाते रहो। पिछले मंगलवार तक कप्तान विराट कोहली और कोच अनिल कुंबले के बीच कभी न खत्म होने वाले वाले झगडे से बीसीसीआई साफ मुकरता रहा और फिर अचानक अनिल कुबले ने इस्तीफा दे दिया। इस पर न तो बीसीसीआई और न ही कुंबले ने कुछ कहा है। माना कि ड्रैसिंग रूम की बातों को बाहर नहीं लाया जाना चाहिए मगर इन्हें बीसीसीआई के ध्यान में तो लाया जा सकता है। बहरहाल, टवीटर पर कुंबले ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवी लक्ष्मण की तीन सदस्यीय वाली क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) चाहती थी कि वे कोच बने रहें। कुबले कोच पद पर नहीं बने रहना चाहते थे पर सीएसी ने उन्हें मना लिया। मगर कप्तान विराट कोहली को इस पर कडा ऐतराज था और अन्तोगत्वा कुंबले को इस्तीफा देना पडा। इसके यह मायने लगाए जा सकते हैं कि विराट का कद सीएसी से भी बडा है और कोच किसे बनाए जाए, इस पर तीन सदस्यीय समिति की बजाए कप्तान की पसंद को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। इस पर सुनील गावस्कर ने तंज भी कसा है “ कप्तान जिसे भी पसंद करते हैं, टीम इंडिया का कप्तान उसे ही क्यों नहीं बना देते“। कुंबले टीम इंडिया में अनुषासन, पेषेवर दक्षता, प्रतिबद्धता और प्रतिभा को निखारने वाली सोच रखते थे और उन्होंने टीम इंडिया को इस सांचे में ढालने की कोषिष भी की। विराट कोहली को कुंबले की यही अप्रोच अखरी और ताजा सूचना के मुताबिक कोच और भारतीय कप्तान में पिछले छह माह से बोलचाल तक बंद थी। यह काफी गंभीर बात थी और बीसीसीआई को तुरंत इसे गंभीरता से लेना चाहिए था। कोहली और कुंबले के बीच जारी षीत युद्ध के दृश्टिगत इस बात की पूरी संभावना है कि चैंपियन ट्राफी के दौरान विराट कोच कुंबले की पेषेवर सलाह से महरूम रहे। इसी वजह विराट ने फाइनल में पहले गेंदबाजी की जबकि कुबल पहले बैटिंग करना चाहते थे। खेल भी युद्ध के मैदान की तरह होता है और इसमें षीर्श जनरलों के बीच मतभेद बहुत भारी पडते हैं। महाभारत में युद्ध का कौषल भी यही संदेष देता है कि दुर्योधन का घमंड कौरवों की हार का सबसे बडा कारण बना था। बहरहाल, टीम इंडिया के कोच और कप्तान के बीच जंग का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2005 और 2006 में कप्तान सौरव गांगुली और कोच ग्रेग चैप्पल में लंबे समय तक झगडा चलता रहा। नतीजतन, सौरव गांगुली को कप्तानी से हाथ धोना पडा और वे अपनी उम्दा फार्म भी खो बैठे। खेल हो या युद्ध का मैदान, इसमें विवाद, अहम और व्यक्तिगत कुंठाओं के लिए कोई जगह नहीं होती हे और जो भी टीम इन सब नकारात्मक पहलुओं से पीडित होती है, उसका हारना तय है। पाकिस्तान की टीम इसकी मिसाल है। पहली बार टीम नकारात्मक बातों से मुक्त रही और पहली बार चैंपियन ट्राफी जीत गई।
सोमवार, 26 जून 2017
गुरु बिन ज्ञान नही
Posted on 6:54 pm by mnfaindia.blogspot.com/
संत कबीर ने बहुत पहले कहा था, “ गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष; गुरु बिन लिखे न सत्य, गुरु बिन मिटे न दोश“। संक्षेप में आप चाहे कितने ही प्रतिभाषाली क्यों न हों मगर गुरु के बगैर न तो प्रतिभा तराषी जा सकती है और न ही निखरती है। टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली के दुनिया भर में फैले फैंस चाहेंगे कि वे अपने कोच का सम्मान करें और अपने दंपपूर्ण आचरण को छोड दें। फलदार वृक्ष हमेषा झुकता है। महान खिलाडी की भी यही विषेशता होनी चाहिए। अनिल कुंबले को टीम इंडिया के पद से जिन हालात में इस्तीफा देना पडा, भारतीय क्रिकेट और टीम इंडिया के लिए इन्हें कतई सुखद नही माना जा सकता। क्रिकेट को भी खेल की भावनाओं से खेला जाना चाहिए। मगर यह कैसी खेल भावना है कि अपने कोच को जलील करते रहो और सच सामने आने तक इसे झुठलाते रहो। पिछले मंगलवार तक कप्तान विराट कोहली और कोच अनिल कुंबले के बीच कभी न खत्म होने वाले वाले झगडे से बीसीसीआई साफ मुकरता रहा और फिर अचानक अनिल कुबले ने इस्तीफा दे दिया। इस पर न तो बीसीसीआई और न ही कुंबले ने कुछ कहा है। माना कि ड्रैसिंग रूम की बातों को बाहर नहीं लाया जाना चाहिए मगर इन्हें बीसीसीआई के ध्यान में तो लाया जा सकता है। बहरहाल, टवीटर पर कुंबले ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवी लक्ष्मण की तीन सदस्यीय वाली क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) चाहती थी कि वे कोच बने रहें। कुबले कोच पद पर नहीं बने रहना चाहते थे पर सीएसी ने उन्हें मना लिया। मगर कप्तान विराट कोहली को इस पर कडा ऐतराज था और अन्तोगत्वा कुंबले को इस्तीफा देना पडा। इसके यह मायने लगाए जा सकते हैं कि विराट का कद सीएसी से भी बडा है और कोच किसे बनाए जाए, इस पर तीन सदस्यीय समिति की बजाए कप्तान की पसंद को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। इस पर सुनील गावस्कर ने तंज भी कसा है “ कप्तान जिसे भी पसंद करते हैं, टीम इंडिया का कप्तान उसे ही क्यों नहीं बना देते“। कुंबले टीम इंडिया में अनुषासन, पेषेवर दक्षता, प्रतिबद्धता और प्रतिभा को निखारने वाली सोच रखते थे और उन्होंने टीम इंडिया को इस सांचे में ढालने की कोषिष भी की। विराट कोहली को कुंबले की यही अप्रोच अखरी और ताजा सूचना के मुताबिक कोच और भारतीय कप्तान में पिछले छह माह से बोलचाल तक बंद थी। यह काफी गंभीर बात थी और बीसीसीआई को तुरंत इसे गंभीरता से लेना चाहिए था। कोहली और कुंबले के बीच जारी षीत युद्ध के दृश्टिगत इस बात की पूरी संभावना है कि चैंपियन ट्राफी के दौरान विराट कोच कुंबले की पेषेवर सलाह से महरूम रहे। इसी वजह विराट ने फाइनल में पहले गेंदबाजी की जबकि कुबल पहले बैटिंग करना चाहते थे। खेल भी युद्ध के मैदान की तरह होता है और इसमें षीर्श जनरलों के बीच मतभेद बहुत भारी पडते हैं। महाभारत में युद्ध का कौषल भी यही संदेष देता है कि दुर्योधन का घमंड कौरवों की हार का सबसे बडा कारण बना था। बहरहाल, टीम इंडिया के कोच और कप्तान के बीच जंग का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2005 और 2006 में कप्तान सौरव गांगुली और कोच ग्रेग चैप्पल में लंबे समय तक झगडा चलता रहा। नतीजतन, सौरव गांगुली को कप्तानी से हाथ धोना पडा और वे अपनी उम्दा फार्म भी खो बैठे। खेल हो या युद्ध का मैदान, इसमें विवाद, अहम और व्यक्तिगत कुंठाओं के लिए कोई जगह नहीं होती हे और जो भी टीम इन सब नकारात्मक पहलुओं से पीडित होती है, उसका हारना तय है। पाकिस्तान की टीम इसकी मिसाल है। पहली बार टीम नकारात्मक बातों से मुक्त रही और पहली बार चैंपियन ट्राफी जीत गई।






