गुरुवार, 8 जून 2017

आग से खेलना बंद करें

मध्य प्रदेश  के मंदसौर में पुलिस फायरिंग में छह किसानों की मौत से तो अब केन्द्र और राज्यों को चेत जाना चाहिए। इस दुखद हादसे से यह  सबक भी मिलता है कि किसानों को कर्ज माफी के लोक-लुभावने वायदे किस कद्र भयानक साबित हो सकते हैं। देश  के कई हिस्सों में इन दिनों किसान ऋण माफी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश  के किसान  ऋण माफी और कृषि  उत्पादों के समर्थन मूल्य में वृद्धि की मागों को लेकर  एक जून से  आंदोलन कर रहे हैं। महाराष्ट्र  में भी किसान एक जून से हडताल पर हैं। इससे पहले तमिल नाडु के किसान हाथ में खोपडियां और मुंह में चूहा दबाकर देश  की राजधानी दिल्ली में अर्धनग्न  प्रदर्शन  कर चुके हैं। और यह सब राजनीतिक दलों के खोखले आश्वासनों   और लोक लुभावने वायदों का किया धरा है। देश  का प्रधानमंत्री अगर किसी राज्य विशेष  के चुनाव दौरान स्वंय ऋण माफी का वायदा करे तो किसानों की अपेक्षाएं सातवें आसमान पर चढना स्वभाविक है। इस साल के  शुरु में सपन्न उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने राज्य के किसानों के ऋण माफ की घोषणा की थी। और अब योगी आदित्यनाथ सरकार इस वायदे को पूरा करने के लिए वचनबद्ध है। उत्तर प्रेद्श  की देखा-देखी महाराष्ट्र  और मध्य प्रदेश  के किसान भी दोनों राज्यों की भाजपा सरकार से ऋण माफी की उम्मीद कर रहे हैं और इसीलिए आंदोलन भी कर रहे हैं। पंजाब में कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिए विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से ऋण माफी का पक्का वायदा किया था। अब इस वायदे को निभाने के लिए कैप्टन अमरेन्द्र सिंह सरकार अपने सभी वित्तीय स्त्रोत खंगाल रही है। राज्य सरकार की माली हालत इतनी दयनीय है कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन आयोग के संशोधित वेतनमान लागू करने के लिए भी पैसा नहीं है। इसी साल हिमाचल प्रदेश  और गुजरात में विधानसभा  चुनाव होने हैं। इन राज्यों के किसान भी राजनीतिक दलों से ऋण माफी की उम्मीद लगाए बैठे हैं और अगर चुनाव जीतना है तो सभी दलों को यह वायदा करना ही होगा। दो साल बाद 2019 में लोकसभा चुनाव होने है और इस चुनाव में भी किसान राजनीतिक दलों से ऋण माफी के पक्के वायदे की उम्मीद रखेंगें। किसानों की ऋण माफी का यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो 2019 तक  विभिन्न राज्यों द्वारा किसानों के 2,57,000 करोड रु के ऋण माफ कर दिए जाएंगे मगर इसके बावजूद किसानों की आर्थिक दशा  में कोई सुधार आने की उम्मीद नही है। सच यह है कि ऋण माफी महज चुनाव जीतने का राजनीतिक हथकंडा है जिसका  सत्ता पाने के लिए  समय-समय पर राजनीतिक दल बखूबी इस्तेमाल करते रहे हैं। 1990 में  विश्व  प्रताप सिंह की सरकार ने अपना चुनावी वायदा पूरा करने के लिए किसानों के दस हजार रु तक के ऋण माफ करने की घोषणा की थी। तब चौधरी देवी लाल वीपी सिंह सरकार में उप-प्रधान मंत्री थे। इससे पहले देवी लाल बतौर मुख्यमंत्री  हरियाणा में किसानों के 227.5 करोड् रु के कर्ज माफ कर वुके थे। इसमें 162 करोड रु  कमर्शियल  बैंकों के थे। 2008 में संप्रग सरकार ने  31मार्च, 2007 तक देश  के सभी तीन करोड सीमांत और लघु किसानों के लगभग 50,000 करोड रु के ऋण माफ कर दिए थे। इसके अलावा और भी कई राज्य अब तक ऐसा कर चुके हैं मगर किसान आज भी बदहाल है। वन टाइम ऋण माफी से  किसान  का कोई भला नहीं होने जा रहा है। आजादी के बाद से सबसे ज्यादा बदहाल किसान है। देश  के 68.8 फीसदी किसानों के पास मात्र 8 फीसदी संपदा है। किसानों की  उपज को समुचित दाम और माकूल विपणन व्यवस्था  सुनिश्चित  करने  से ही उनकी वातविक आर्थिक उन्नति की जा सकती है। जिस तरह उधोग और व्यापार साल-दर-साल खुशाहल हो रहा है, उसी तरह किसान को भी माला-माल किया जाना चहिए। यही वास्तविक प्रगति है।