सोमवार, 12 जून 2017

ब्रिटेन में त्रिशकू संसद



ब्रितानवी जनता ने  मध्यावधि चुनाव में प्रधानमंत्री टेरीजा मे को तगडा झटका दिया है। प्रधानमंत्री मे ने प्रचंड जनादेश  की उम्मीद में समय से पहले चुनाव कराए थे मगर उनका दांव उल्टा पड गया।  शुरुआती नतीजों से साफ है कि सत्तारूढ दल कंजरवेटिव पार्टी पूर्ण बहुमत से पिछड गई है और ब्रिटेन में त्रिशंकू संसद का गठन तय है। 650 सदस्यीय हाउस ऑफ कांमन्स में  स्पष्ट  बहुमत के लिए 326 सदस्यो की दरकार है मगर  प्रधानमंत्री टेरीजा मे की  कंजरवेटिव पार्टी को 319 सीटें ही मिल पाईं हैं।  पार्टी को 12 सीटों का नुकसान हुआ है। 2015 के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कमरून के नेतृत्व में  कंजरवेटिव पार्टी को  पूर्ण  बहुमत मिला था। इस चुनाव में  प्रमुख विपक्षी दल लेबर पार्टी को 265 मिलीं है मगर वह भी  स्पष्ट  बहुमत से काफी दूर है। लेबर पार्टी को 29 सीटों का फायदा मिला है।  सात साल पहले 2010 में भी ब्रिटेन में किसी भी पार्टी को  स्पष्ट  बहुमत नहीं मिला था और तब भी त्रिशंकू संसद का गठन हुआ था। इस बार स्कॉटिश  नेशनल पार्टी (एसएनपी) को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इसके पूर्व नेता और 2007 से 2014 तक स्कॉटलैंड के प्रधानमंत्री रहे एलेक्स सेलमंड स्कॉटिश  कंजरवेटिव पार्टी के प्रत्याशी  से हार गए हैं। स्कॉटिश  नेशनल पार्टी  का  प्रदर्शन  बेहतर रहा है।  इस  बार पार्टी ने 35 सीटें जीती हैं। 1983 के बाद  स्कॉटिश  नेशनल  पार्टी ने पहली बार इतनी सीटें जीती हैं। संसद में एसएनपी के नेता एंगल रॉबर्टसन  चुनाव हार गए हैं। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी निक क्लेग भी हार गए हैं। पहली बार संसद में सबसे ज्यादा 200 महिलाएं सांसद चुनी गईं है। 2015 में 196 महिलाएं सांसद चुनी गई थी। जालंधर से इंग्लैड गए तनमनजीत सिंह धेशी  पहली बार पगडीधारी सिख ब्रितानवी संसद पहुंचे हैं। बर्मिंघम के एजबेस्टन से प्रीति कौर गिल पहली सिख महिला सांसद बनी है। 1997 के बाद पहली बार सबसे ज्यादा 69 फीसदी मतदान हुआ था। इस चुनाव में भारतीय मूल के अब तक 12 सांसद जीते हैं, सात लेबर पार्टी से और पांच कंजावेटिव पार्टी से। पिछली बार भारतीय मूल के 10 सांसद थे। चुनाव परिणामों से साफ है कि ब्रितानवी अवाम को प्रधानमंत्री टेरीजा मे  द्धारा  देश  पर संसद के मध्यावधि चुनाव थोपना रास नहीं आया है। संसद की मियाद मई 2020 मई तक थी मगर यूरोपियन यूनियन से बाहर आने के फैसले पर चौतरफा घिरी टेरीजा मे मध्यावाधि चुनाव से  स्पष्ट  बहुमत हासिल कर आलोचकों का मुंह बंद कराने की फिराक में थी। और अब सरकार बनाने के लिए टेरीजा मे को छोटे-मोटे दलो का समर्थन लेना होगा। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि सरकार बनाने के लिए छोटे-मोटे दलों का समर्थन कितना महंगा पडता है़। ताजा सूचना है कि टेरीजा मे ने डेमोकेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) के साथ मिलकर सरकार बनाने के संकेत दिए हैं। इस पार्टी ने दस सीटें जीती हैं और कंजरवेटिव पार्टी को  स्पष्ट  बहुमत के लिए आठ सांसदों के समर्थन की दरकार है। अभी तक डीयूपी ने इस बारे कुछ नहीं कहा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मे डीयूपी से “ कॉन्फिडेंस एंड सप्लाई“ के फार्मूले वाले “वोट-टू-वोट“ आधार पर समर्थन लेंगी। अपने पिछले कार्यकाल की अपेक्षा इस बार टेरीजा मे का कार्यकाल ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है। उन्हें संसद के भीतर और बाहर और अधिक मुखर आलोचना का सामना करना पड सकता है। दस दिन बाद “बै्रक्सिट“ पर अहम बातचीत शुरु होनी है।  यूरोपियन यूनियन छोडने के लिए यूरोप के अधिकतर देश  ब्रिटेन से खासे खफा हैं। अमेरिका से उम्मीद थी मगर राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप काइंया निजनेसमैन हैं और मोल-तोल के लिए जाने जाते हैं।  “बै्रक्सिट“ पर ब्रिताबवी भी बंटे हुए हैं। इन हालात में प्रधानमंत्री टेरीजा मे का सफर वैसा आरामदायक नहीं होगा, जैसा मध्यावधि चुनाव कराकर वे चाहती थींा।