बुधवार, 7 जून 2017

भारत का बाहुबली

भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में एक और लंबी छलांग लगाई है। सोमवार को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने दो सौ हाथियों के वजन (640 टन) बराबर   जीएसएलवी मार्क-3  रॉकेट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया। इस विशालकाय रॉकेट के साथ विशाल उपग्रह  भी भेजा गया है।  जीएसएलवी मार्क-3 के सफल प्रक्षेपण से अंतरिक्ष में मानव यात्रियों को भेजने का मार्ग प्रशस्त भी हो जाएगा। तीस साल के सघन अनुसंधान के बाद भारत को यह सफलता मिली है। लॉन्चिंग के 16 मिनट बाद रॉकेट ने अपने साथ भेजे संचार उपग्रह जी सैट-19 को भी अपने कक्ष में स्थापित कर दिया। 3136 किलोग्राम वजन वाला जी-सैट-19 अब तक का सबसे वजनी उपग्रह है। इस उपग्रह को बनाने में ही इसरो को 15 साल लग गए।  अब तक  2.3 टन से ज्यादा के उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजने के लिए भारत को विदेशों  पर निर्भर रहना पडता था। जीएसएलवी मार्क-3  तीन स्तरीय इंजन वाला रॉकेट है। इसकी सबसे बडी खूबी  भी यही है कि यह पूरी तरह से स्वदेशी  निर्मित है। इसके सबसे बडे क्रायोजेनिक इंजन भारत में ही बनाए गए हैं। इसमें ईंधन के तौर पर “लिक्विड ऑक्सीजन“ और “हाइड्रोजन“ इस्तेमाल किया गया है। पहले स्तर का दो मोटर वाला इंजन ठोस  ईंधन से चलता है, तो दूसरे स्तर का इंजन तरल ईंधन से काम करता है। तीसरे स्तर पर क्रायोजेनिक इंजन लगा हुआ है। विदेशों  की तुलना में इस रॉकेट का निर्माण काफी किफायती रहा है। इस पर लगभग 160 करोड रु का खर्च  आया है। अमेरिका में इतने बजट में एक फिल्म तक नहीं बन पाती है।  रॉकेट के साथ भेजे गए  जी-सैट-19 के सफल प्रक्षेपण से भारत में इंटरनेट की स्पीड में खासी वृद्धि होगी। 15 साल तक काम करते रहने वाले  जी-सैट-19 में प्रति सेकेंड चार जीबी डेटा देने की क्षमता है। पहली बार किसी उपग्रह  में स्वदेशी   निर्मित लीथियम आयन बैटरियों का इस्तेमाल किया गया है।ं  जीएसएलवी मार्क-3 की लॉन्चिग से डिजिटल इंडिया भी सशक्त होगा। इससे भारत के स्पेस मिशन को भी गति मिलेगी। पिछले कुछ समय से इसरो ने स्पेस विज्ञान में अभूतपूर्व  उपलब्धियां हासिल करके पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। तथापि, भारत के पास हैवी सेटेलाइट लांच व्हीक्ल का न होना  इसकी स्पेस क्षमताओं को प्रभावित कर रहा था।   जीएसएलवी मार्क-3 के लॉन्चिग से भारत को अब हैवी उपग्रह के कमर्षियल प्रक्षेपण के लिए बाहरी, खासकर  फ्रांस की कंपनी एरियन स्पेस पर निर्भर नहीं रहना पडेगा। इससे भारत को लागत में काफी बचत हो सकती है और इस धन को अन्य कामों पर खर्च किया जा सकता है। बाहरी देशों  से उपग्रहों का प्रक्षेपण काफी महंगा सौदा साबित हो रहा था। वैसे भी इसरो को  किफायती स्पेस टकनॉलॉजी तैयार करने के लिए जाना जाता है। इसरो ने “मंगल“ पर भेजे “मंगलायन“ को बेहद किफायती कीमत पर प्रक्षेपित करके नासा समेत समूचे विज्ञान जगत को आश्चर्यचकित  कर दिया था। इसरो की ताजा उपलब्धि के बाद अब मंगल ग्रह और मून  मिशन को और ज्यादा व्यापक बनाया जा सकता है। अब तक इसरो मंगल और मून पर टकनॉलॉजी डेमो मिशन ही चला पाया था। जीएसएलवी मार्क-3 की सफल लॉन्चिग के बाद से इसरो भारतीय थल और वायु सेना के लिए भी स्वदेशी  निर्मित उपग्रह लॉच करने में सक्षम होगा। पूरी दुनिया में बमुश्किल  11 मुल्कों के पास स्वदेशी  निर्मित तकनीकी से हैवी रॉकेट लॉच करने की क्षमता है। भारत अब इनमें  शामिल हो गया है और आसानी से हैवी सैटेलाइट की कमर्शियल  लाँचिंग करके पैसा कमा सकता है। इसरो का यह बाहुबली मिशन भारत के स्पेस विज्ञान की बहुत बडी उपलब्धि है।