मंगलवार, 27 जून 2017

रमजान में भी खून-खराबा

सोमवार को ईद के पवित्र अवसर पर  पूरी दुनियाा में खुषाहली और अमन-चैन के लिए दुआएं मांगी जा रही थी, कश्मीर  आतंकी और उपद्रवी अपनी  नापाक हरकतों का तांडव मचाए हुए थे।  ईद के दिन  कई जगह पथराव हुआ और इसमें तीस से ज्यादा जवान जख्मी हो गए। उपद्रवियों ने  प्रदर्शन  के दौरान पाकिस्तान और आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) के झंडे भी लहराए। सरकार ने एतिहातन अलवाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुख को नजरबंद रखा। एक और अलगाववादी नेता जेकेएलएफ चीफ यासीन मलिक को हिरासत में लिया गया ताकि वे लोगों को भडका न सकें। पूरे रमजान माह कश्मीर  घाटी में हिंसा का तांडव होता रहा। दुनिया भर में मुसलमान पहली बार कुरान के उतरने पर अल्लाह की नैमत पाने के लिए  रमजान के पूरे महीने रोजे रखते हैं। रमजान  माह  मेँ दान करके सबाब (पुण्य) कमाना और आपसी भाईचारा निभाना इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों में शामिल है।  इस्लामिक कैलेंडर में शब-ए-कदर की रात को सबसे पवित्र रात माना जाता है। मुसलमानों का मानना है कि इसी रात पैगंबर मुहम्मद को कुरान की आयतें नजीर हुईं थीं। इसी कारण  गत शुक्रवार को श्रीनगर के नौहटा स्थित जामा मस्जिद में प्राथना सभा का आयोजन किया गया था। मस्जिद के मौलवी और हुर्रियत कॉन्फ्रेस के चेयरमैन मीरवाइज  उमर फारुख जब प्राथना सभा में बार-बार अल्लाल की मेहर और इंसानियत की नसीहत दे रह थे, बाहर लगभग दो सौ युवक एक इंसान को लाठियों और लोहे की छडों से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर रहे थे। इस इंसान के प्राण पखेरु उडते ही उसके शव को पास के नाले में फेंक दिया गया । और यह इंसान और कोई नहीं राज्य पुलिस के डीएसपी अयूब पंडित थे जो लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी ड्यूटी निभा रहे थे।  वहां मौजूद सैंकडों लोगों ने यह खूनी नजारा देखा मगर किसी ने कुछ नहीं किया।  शब-ए-कदर की पवित्र रात को आतंक के पैरवीकारों द्वारा एक इंसान की बेहरमी से हत्या कर देना कौनसा बहादुरी का काम है? इस दिन  शैतान भी ऐसा पाप नहीं करेगा। दुनिया का कोई भी महजब इस तरह के जघन्य अपराध की अनुमति नहीं देता। तथापि, सच्चाई यह है कि आतंकी  शैतान से भी गए-गुजरे होते हैं।  उनका कोई महजब नहीं होता और न ही उनमें इसांनियत नाम की कोई चीज होती है। बहरहाल, अब वक्त आ गया  है कि  कश्मीरी  अवाम को इसानियत और महजब के दुश्मन आतंकियों और उपद्रवियों को माकूल जवाब  देना ही पडेगा।  शहीद  अयूब पंडित कश्मीर  में हिंदू और मुसलमान के बीच सदियों से व्याप्त सांप्रदायिक सौहाद्र के प्रतीक थे। कश्मीर  में  पंडित हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। जो लोग ब्राह्मण से मुसलमान बने, वे आज भी अपने नाम के आगे पंडित लगाकर अपनी  विरासत को बरकरार रखे हुए हैं। कहते हैं आदि कल में कश्मीर  में सभी हिंदू थे। इसी विरासत ने  कश्मीर  घाटी को आज भी  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जोडे रखा है। आतंकी और पाकिस्तान के पिठ्ठुओं को लंबे समय से यह बात अखर रही है।  कश्मीरी  अवाम आतंकियों और अलगाववादियों की नापाक हरकतों से आजिज आ चुका है और दबी जुबान इसकी भर्त्सना भी करता है। और अब डीएसपी अयूब पंडित की निर्मम हत्या ने अवाम को झकझोर कर रख दिया है। शहीद अयूब की पत्नी की ये पंक्तियो् “  अब अपने पति की किस कब्र में तलाश  कंरू“ और  उनकी भाभी का यह कथन “इसी आजादी के लिए लड रहे हैं हम“,  कष्मीरी अवाम की व्यथा बयां करता है। हिंसा और आतंक के बेमियादी  दौर ने आम कश्मीरी  को कहीं का नहीं छोडा है। आम कश्मीरीअलगाववादियों की तरह  भारत की रोटियां खाकर पाकिस्तान के गुण नहीं गाता। आतंक और अलगाववाद ने  मेहनतकश   एवं “शिल्पकार“ कश्मीरी को बर्बाद करके रख दिया है। अवाम को इससे मुक्ति चाहिए।