चालीस साल से आतंक की भीषण आग में झुलसे रहे जम्मू-कष्मीर में चेनानी-नाषरी सुरंग के लोकार्पण से न केवल उन लोगों को सुविधा होगी जो जम्मू संभाग से सडक के रास्ते कष्मीर घाटी में प्रवेश करते हैं, बल्कि कश्मीर घाटी के पर्यटन को भी गति मिलने की आशा की जा सकती है। इस सुरंग का निर्माण संप्रग सरकार के समय में शुरु हुआ था मगर मोदी सरकार ने इस पर तेजी से काम करके इसे रिकार्ड समय पर पूरा किया है। 9.2 किलोमीटर लंबी इस सुरंग के निर्माण पर 2500 करोड रु खर्च हुए हैं। जम्मू से श्रीनगर की दूरी 30 किमी कम हो गई है। खास बात यह है कि भारी बर्फबारी के दौरान भी घाटी का सडक मार्ग बंद नहीं होगा। हर रोज करीब 27 लाख और हर साल लगभग 90 करोड रु के फ्यूल की बचत होगी। सुरंग में दुनिया के बेहतरीन सेफ्टी इंतजाम किए गए हैं। सुरंग में किसी तरह की दिक्कत आने पर बगल में एक और सुरंग का निर्माण किया गया है। सुरंग में फायर कंट्रोल, सिंग्नल्स, ऑटोमैटिक इलेक्ट्रिकल एवं कम्युनिकेषन सिस्टम लगाए गए हैं। सुरंग में हर 75 मीटर पर सीसीटीवी लगाए गए हैं। मोबाइल नेटवर्क की सुविधा भी है और पूरी सुरंग को कंट्रोल रुम से मॉनिटर किया जाएगा। यह सुरंग दुनिया की छठी और भारत की पहली ऐसी टनल है जिसमें “ट्रांसवर्स वेटिलेशन सिस्टम“ लगाया गया है। इससे यात्रियों को टनल में ताजा हवा मिलेगी। लंबी सुरगों में वाहनों के फ्यूल उत्सर्जन से निकलने वाली गैस और कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर काफी ज्यादा होता है, इसलिए टनल के भीतर ताजी हवा जरुरी है। इतना सब होने के बावजूद जनमानस के मन-मस्तिष्क में एक सवाल बार-बार कौंध रहा है कि “आतंकियों से इस सुरंग को बचाने के क्या पुख्ता इंतजाम हैं? घाटी के अलगाववादियों ने इस सुरंग को यह कहकर खारिज कर दिया है कि कश्मीर “राजनीतिक मुददा“ है और इसे आर्थिक पैकेज अथवा सुरंग खोलकर हल नहीं किया जा सकता। अलगाववादियों ने रविवार को कश्मीर में बंद का आहवान किया था और घाटी में इसका काफी असर भी हुआ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेवाएं भी बंद के कारण प्रभावित हुई। इस बात में दो राय नहीं है कि कश्मीर की आर्थिकी को उभारने के लिए घाटी में अमन-चैन की सख्त दरकार है। चालीस साल के आतंक ने कश्मीर घाटी में बिजली, पानी, षिक्षा, यातायात, दूर संचार और सडक जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी धराशायी कर रखा है। केन्द्र से मिल रही मदद का अधिकांश हिस्सा सुरक्षा पर खर्च किया जा रहा है। शिक्षा संस्थान लंबे समय तक बंद रहती हैं और दूर-संचार सुविधाएं अक्सर ठप्प हो जाती हैं या कर दी जाती हैं। पर्यटन जम्मू-कश्मीर की रीढ की हड्डी माना जाता है और आतंक ने सबसे ज्यादा इसे प्रभावित किया है। कश्मीर में सेना की लंबे समय से तैनाती का सबसे बुरा असर भी पर्यटन पर पडा है। करप्शन पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार राज्य में एक अदद यूनिट सेना की तैनाती से कश्मीर में 232 पर्यटन यूनिट की कमी आई है। चालीस साल में पर्यटन को कितना नुकसान उठाना पडा है, इसका सहज में अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कश्मीर की सबसे बडी त्रासदी है। किसी भी राज्य अथवा परिवार की आर्थिकी तहस-नहस करने से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। पिछले चालीस साल में सियासी नेताओं की खुशाहली में कोई कमी नहीं आई है। सांसद अथवा विधायक चुने जाने पर उन्हें सुरक्षा के साथ-साथ मोटी तनख्वाह और भत्ते मिलते हैं और हार जाने के बाद पेंशन। मगर चालीस साल से लगातार तबाह हो रहे पर्यटन उधोग पर निर्भर आम आदमी को क्या मिला? वह अलगाववाद और कुशासन के बीच पीस रहा है। चेनानी-नाशरी सुरंग आशा की किरण तो है पर मौजूदा हालात में एकदम धुंधली सी लगती है।
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