बुधवार, 26 अप्रैल 2017

कानून -व्यवस्था की समस्या नहीं है नक्सली

 छतीसगढ के सुकमा जिले में सोमवार को नक्सलियों ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के 25 जवानों को मार डाला। लगभग तीन सौ नक्सलियों ने घात लगाकर सीआरपीएफ के   जवानों पर हमला बोल दिया। हमलावरों में महिला नक्सली भी  शामिल थीं।  सीआरपीएफ के लगभग 100 जवान सडक निर्माण कर रहे श्रमिकों की सुरक्षा के लिए तैनात थे। दुर्भाग्यवश , जवान अपनी ही रक्षा नहीं कर पाए।  इस साल नक्सलियों का सुरक्षा बलों पर यह दूसरा बडा हमला है। इसी मार्च में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के गश्त   लगा रहे 11 जवानों को मार डाला था । छतीसगढ राज्य में  सुकमा जिला माओवादियों का गढ माना जाता है और लंबे समय से यह जिला नक्सल समस्या से पीडित है। सुकमा को जाने वाली हर सडक खूनी मानी जाती है और कहीं से भी इस जिले का सफर पूरी तरह से जोखिम भरा होता है। इस सच्चाई को सरकार भी जानती है और नक्सलियों से लडने वाले सुरक्षाकर्मी भी। और यह बात भी सभी जानते हैं कि नक्सली घात लगाकर हमला करते हैं। इसके बावजूद सीआरपीएफ के जवान फिर  शहीद हो गए। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को माना कि नकसलियों ने जवानों की निर्मम हत्या की है और सरकार इसका माकूल जवाब देगी। गूह  मंत्री  ने अब नक्सल समस्या से पीडित राज्यों की बैठक 8 मई को बुलाई है। पर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या  बैठक से नक्सल जैसी गंभीर समस्या का हल निकल पाएगा ? आज तक सरकार  बैठक-दर- बैठक ही तो करती आई है। सुरक्षा   विशेषज्ञ  भी मानते हैं कि वातानुकुलित बंद कमरों में चाय-पानी पीकर देश  की अखंडता से जुडी गंभीर समस्याओं का हल नहीं निकाला जा सकता। कश्मीर  हो या छतीसगढ अथवा पूर्वोतर राज्य, जवानों पर हर हमले के बाद यही बात कही जाती है मगर सरकार न तो नक्सली समस्या का कोई संतोषजनक हल निकाल पाई है और न ही  कश्मीर  समस्या का।  आखिर यह सिलसिला कब तक जारी रहेगा? नक्सल मूलतः व्यवस्था से जुडी संवेदनशील समस्या है। नक्सली वामपंथी आंदोलन की उपज है और साम्यवादी व्यवस्था के पैरवीकर। पश्चिम   बंगाल से  शुरु होकर नक्सलवाद अब छतीसगढ, आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र , तेलंगाना और ओडीशा तक फैल चुका है। देश  के लगभग सौ जिले नक्सली समस्या से पीडित हैं। इन राज्यों के कबालियों में नक्सलियों  की गहरी पैठ है। नक्सली भारतीय संविधान को  फिरंगी उपनिवेशवाद का प्रतीक मानते हैं जिसमें वन उपज और अधिकारों को कबायलियों से छीनकर सरकार के सुपुर्द  कर दिया गया है। नक्सलियों का मानना है कि स्वदेशी  सरकार के इस कदम से वन उपज और वन खेती पर आश्रित लगभग चार लाख कबायली बेरोजगार और बेघर हो गए हैं।  इसी सोच के कारण नक्सली कबायली क्षेत्रों में सडक जैसे विकास कार्य  का भी मुखर विरोध करते हैं और इस क्रम में जवानों पर हमले किए जातेे हैं। इंटेलीजेंस एजेंसियों का आकलन है कि  लगभग बीस हजार हथियारबंद नक्सली नक्सल-पीडित राज्यों में सक्रिय हैं। इसके अलावा नक्सलियों के लगभग 50,000 सक्रिय मेंबर हैं। धनाढ्य तबकों को लूटकर उन्हें गरीबों और कबायलियों में बांटना नकसलियों की रणनीति है। टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार देश  का 58 फीसदी जनमानस नक्सलियों के प्रति सकारात्मक राय रखता है। केवल 19 फीसदी सरकार की तरह नक्सलियों को देशद्रोही और विध्वंसक मानते है। देश  में नक्सलवाद और अलगाववाद दिन-ब-दिन बढता जा रहा है। नक्सल समस्या भी कानून और व्यवस्था से जुडी समस्या नहीं है। जब तक सामाजिक अन्याय और आर्थिक असमानता रहेगी, नक्सलवाद अथवा अलगाववाद की समस्या पैदा होती ही रहेगी। आजादी के तक तक कोई अर्थ  नहीं है, जब तक देश  के हर नागरिक की  विकास में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित   न हो। बहरहाल, नक्सल समस्या का हल भी राजनीतिक ही है और इसके लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।